Naresh Singh Yogi

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11/08/2026

बचपन की पुरानी यादें ताजा हो गई आज आप भी याद कर लो

10/08/2026

राम नाम से मोक्ष कैसे होगा? कलयुग में सबसे सरल उपाय श्री राम नाम का जाप 🌸🙏
कलयुग में धर्म, कर्म और साधना के मार्ग पर चलना कठिन हो गया है। मन की चंचलता और भागदौड़ भरी जिंदगी में बड़े-बड़े अनुष्ठान, यज्ञ और कठिन तपस्या करना हर किसी के लिए संभव नहीं है। ऐसे में हमारे संतों और शास्त्रों ने एक ही महामंत्र दिया है—श्री राम नाम का जाप।
तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में स्पष्ट लिखा है:
> "कलिजुग केवल नाम अधारा, सुमिर सुमिर नर उतरहिं पारा।"
>
आइए, एक छोटी सी कथा के माध्यम से समझते हैं कि कैसे केवल राम नाम के स्मरण मात्र से बड़े-बड़े संकट और भवसागर से पार पाया जा सकता है।
📖 कथा: एक साधारण भक्त और राम नाम की सच्ची महिमा
प्राचीन समय की बात है, एक नगर में एक अत्यंत साधारण व्यक्ति रहता था, जिसका नाम रत्नाकर था (डाकू रत्नाकर नहीं, एक सरल ग्रामीण)। वह अनपढ़ था और उसे पूजा-पाठ, वेद-पुराण का ज्ञान नहीं था। उसके जीवन में बस एक ही नियम था—वह दिनभर काम करते हुए हर सांस के साथ धीमी आवाज में "राम-राम" रटता रहता था। लोग उसे पागल या नासमझ समझते थे, क्योंकि वह दुनियादारी की चालाकी नहीं जानता था।
एक बार उस नगर से एक महान ज्ञानी और संन्यासी संत गुजरे। संतों की मंडली जब नगर के चौराहे पर रुकी, तो ज्ञानी संतों ने अहंकारवश कहा, "इस नगर में कोई ऐसा है जो वेदों का मर्म जानता हो या जिसने कठिन तप किया हो?"
नगर के लोगों ने उस साधारण राम-भक्त रत्नाकर की ओर इशारा करते हुए कहा, "महाराज, वेदों का ज्ञान तो हमें नहीं पता, लेकिन यह व्यक्ति हर समय बस 'राम-राम' बड़बड़ाता रहता है।"
संतों ने उस साधारण भक्त को अपने पास बुलाया और परीक्षा लेने के लिए पूछा, "अरे भाई! तुम दिनभर बस राम-राम जपते हो, क्या तुम्हें पता है कि मोक्ष क्या है? क्या तुमने कोई साधना या योग किया है?"
भक्त ने हाथ जोड़कर अत्यंत विनम्रता से उत्तर दिया, "महाराज! मैं अनपढ़ हूँ। न मैं साधना जानता हूँ, न योग। मैं तो बस इतना जानता हूँ कि जब मैं 'राम' कहता हूँ, तो मेरा मन शांत हो जाता है। मुझे और कुछ नहीं चाहिए।"
संतों ने उसे समझाने की कोशिश की कि मोक्ष इतनी आसानी से नहीं मिलता, इसके लिए कठिन मार्ग अपनाना पड़ता है। तभी एक चमत्कार हुआ। आकाशवाणी हुई—"हे संतों! ज्ञान और अहंकार एक साथ नहीं रह सकते। इस साधारण भक्त ने कभी वेदों को नहीं पढ़ा, लेकिन इसके भीतर का हर एक श्वास राम को समर्पित है। राम नाम की महिमा किसी कर्मकांड की मोहताज नहीं है। जिस नाम को जपते-जपते बड़े-बड़े ऋषि तर गए, वही नाम इस भक्त को सहज ही मोक्ष का अधिकारी बना रहा है।"
संतों का अहंकार टूट गया। उन्होंने उस साधारण भक्त के चरण छू लिए और समझ गए कि कलयुग में भगवान का नाम ही सबसे बड़ा तारक मंत्र है।
✨ कलयुग में राम नाम ही क्यों है सबसे सरल उपाय?
* न नियम, न बंधन: राम नाम के जाप के लिए न तो किसी विशेष स्थान की आवश्यकता है, न ही समय या शुद्धि के कड़े नियमों की। आप उठते-बैठते, सोते-जागते, काम करते हुए कभी भी इसका स्मरण कर सकते हैं।
* पापों का नाश: जिस प्रकार अग्नि तिनकों के ढेर को पलभर में राख कर देती है, उसी प्रकार सच्ची श्रद्धा से लिया गया एक बार का राम नाम मनुष्य के जन्म-जन्म के पापों को नष्ट कर देता है।
* मन को शांति: आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में मानसिक तनाव आम बात है। राम नाम का जाप मानसिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करता है।
🌟 निष्कर्ष
मोक्ष का अर्थ जीवन के बंधनों से मुक्ति और परमात्मा में विलीन हो जाना है। कलयुग में बड़े-बड़े साधन कठिन हैं, लेकिन "श्री राम" का नाम एक ऐसा अचूक साधन है, जिसे बालक, वृद्ध, युवा—हर कोई आसानी से अपना सकता है।
आइए, आज ही से अपने व्यस्त जीवन से कुछ पल निकालकर अपने आराध्य श्री राम के नाम का स्मरण करें और अपने जीवन को धन्य बनाएं।
👉 बोलो सियावर रामचंद्र की जय! 🚩जय श्री राम!

09/08/2026

यहां आपके दिए गए विषय और विचारों पर आधारित एक विस्तृत, प्रभावी और विचारोत्तेजक फेसबुक पोस्ट दी गई है, जिसमें एक छोटी कथा (स्टोरी) का भी समावेश है:
शीर्षक: शाश्वत सत्य और हमारी सीमित दृष्टि — भगवान कोई नश्वर जीव नहीं!
अक्सर हम समाज में ऐसे लोगों को देखते हैं जो भगवान (ब्रह्मा, विष्णु, महेश, कृष्ण, राम, शिव, शंकर) को भी आम इंसानों की तरह जन्म लेने और मरने वाला (नश्वर) समझ बैठते हैं। वे सोचते हैं कि जैसे हमारा जन्म और अंत होता है, वैसे ही इनका भी होता है।
लेकिन शास्त्र और सनातन सत्य इसके बिल्कुल विपरीत हैं। जो व्यक्ति इन आराध्यों को जन्म और मृत्यु के चक्र में बंधा हुआ समझता है, वह वास्तव में आध्यात्मिक रूप से मंदबुद्धि और बुद्धिहीन ही कहा गया है। क्यों? आइए एक छोटी सी पौराणिक कथा से इसे समझें:
📖 एक छोटी कथा: जब देवर्षि नारद ने यमराज से पूछा
एक बार देवर्षि नारद लोक कल्याण के लिए यमराज (मृत्यु के देवता) के लोक में पहुँचे। वहाँ उन्होंने यमराज के पास एक बहुत ही विशाल और रहस्यमयी रजिस्टर देखा, जिसमें ब्रह्मांड के हर जीव के जन्म, कर्म और मृत्यु का लेखा-जोखा था।
नारद जी ने जिज्ञासावश पूछा, "हे यमराज! इस संसार में जितने भी जीव उत्पन्न होते हैं, उन सबकी मृत्यु का विधान तो इस बही-खाते में है। क्या इसमें कभी उन देवताओं या महापुरुषों का नाम भी आता है जो इस सृष्टि का संचालन करते हैं या समय-समय पर पृथ्वी पर अवतार लेते हैं?"
यमराज ने मुस्कुराते हुए हाथ जोड़े और कहा, "हे देवर्षि! आप जिस रजिस्टर को देख रहे हैं, यह केवल 'नश्वर' प्राणियों और भौतिक शरीरों के लिए है—यानि जिनका जन्म कर्मों के अधीन होता है और अंत निश्चित है।"
यमराज ने आगे स्पष्ट किया, "जहाँ तक ब्रह्मा, विष्णु, महेश, श्री राम, श्री कृष्ण, शिव और शंकर का प्रश्न है, वे प्रकृति के इन नियमों से परे (अतीत) हैं। वे महाकाल के भी काल हैं। भगवान जब मानव रूप में पृथ्वी पर आते हैं (जैसे राम या कृष्ण के रूप में), तो वह उनकी योगमाया का प्रभाव होता है—वे अपनी इच्छा से प्रकट होते हैं और अपनी इच्छा से अंतर्ध्यान होते हैं। उनका शरीर पांच भौतिक तत्वों से बना सामान्य शरीर नहीं, बल्कि सच्चिदानंद विग्रह होता है। जो मनुष्य भगवान को साधारण जीव या मरने वाला समझता है, वह उनकी दिव्यता से अनजान, अज्ञानी और बुद्धिहीन ही है।"
नारद जी यमराज की बात सुनकर संतुष्ट हो गए और समझ गए कि भगवान का अवतरण और उनका स्वरूप अलौकिक व शाश्वत है, मृत्युशील नहीं।
🌟 निष्कर्ष:
गीता में भी भगवान श्रीकृष्ण ने स्पष्ट कहा है—
> “अजन्तो मम दिव्यां जन्म कर्म च मे दिव्यम्।”
> अर्थात, मेरे जन्म और कर्म दोनों दिव्य और अलौकिक हैं।
>
जो लोग अपनी संकुचित बुद्धि से भगवान को भी अपने ही स्तर पर तौलते हैं, वे केवल अपनी अज्ञानता का प्रदर्शन करते हैं। भगवान न कभी पैदा होते हैं और न कभी मरते हैं; वे अनादि, अनंत, और सर्वव्यापी हैं।
🙏 ॐ नमो भगवते वासुदेवाय | हर हर महादेव | जय श्री राम | 🙏

09/08/2026

जो व्यक्ति भगवान को जन्म लेने वाला अर्थात मृत्यु होने वाला समझता है वह प्राणी वास्तव में बुद्धिहीन ही

08/08/2026

यहाँ श्रीमद् भागवत महापुराण के दशम स्कंध के अध्याय 84 (जो कि कुरुक्षेत्र सूर्यग्रहण के अवसर पर वासुदेव जी और नन्द बाबा के मिलन तथा ऋषियों के आगमन के प्रसंग से जुड़ा है) के आधार पर भगवान श्रीकृष्ण द्वारा संतों और तीर्थों के महात्म्य पर कहे गए वचनों की विस्तृत जानकारी दी गई है।
इस प्रसंग को आप ज्यों-का-त्यों फेसबुक पर पोस्ट के रूप में साझा कर सकते हैं:
🌿 श्रीमद् भागवत कथा सार: भगवान श्रीकृष्ण की वाणी में संतों और तीर्थों का महात्म्य 🌿
श्रीमद् भागवत महापुराण के दशम स्कंध में जब समस्त ब्रजवासी (नन्द बाबा, यशोदा मैया और गोप-गोपियाँ) तथा ऋषि-मुनि कुरुक्षेत्र में भगवान श्रीकृष्ण से मिलते हैं, तो भगवान श्रीकृष्ण संतों (महापुरुषों) और तीर्थों की महिमा का बहुत ही सुंदर और अद्भूत वर्णन करते हैं।
आइए जानते हैं कि हमारे इष्ट भगवान श्रीकृष्ण संतों और तीर्थों के संबंध में क्या उपदेश देते हैं:
🌟 1. भगवान श्रीकृष्ण की दृष्टि में संतों का महात्म्य
भगवान श्रीकृष्ण स्पष्ट रूप से कहते हैं कि संत जन साधारण मनुष्य नहीं हैं, बल्कि उनका प्रभाव और महिमा लोक-प्रसिद्ध तीर्थों से भी बढ़कर है।
* ईश्वर का जीवंत स्वरूप: भगवान श्रीकृष्ण संतों को अपना ही रूप मानते हैं। जो संत निष्काम भाव से केवल भगवान की भक्ति में लीन रहते हैं, उनके हृदय में स्वयं भगवान निवास करते हैं।
* तीर्थों और मूर्तियों से भी श्रेष्ठ: भगवान बताते हैं कि मिट्टी या पत्थर की मूर्तियां और जल के तीर्थ तो क्रमशः समय के साथ पवित्र करते हैं या विशेष विधि से शुद्ध होते हैं, परंतु संतों के दर्शन, उनके चरणों की धूलि, और उनके संग का प्रभाव तुरंत मनुष्य के पापों को नष्ट कर देता है।
* संतों के गुण: जो महान संत क्षमाशील, सभी जीवों पर दया करने वाले, सबके प्रति मित्र भाव रखने वाले और किसी से भी शत्रुता न रखने वाले होते हैं, वे तीनों लोकों को पवित्र करने की सामर्थ्य रखते हैं। उनके संग मात्र से भव-सागर पार हो जाता है।
🌊 2. तीर्थों के विषय में श्रीकृष्ण के अनमोल वचन
जब तीर्थों और जल की पवित्रता की बात आती है, तो श्रीकृष्ण समझाते हैं कि वास्तविक तीर्थ का अर्थ केवल नदियां या जल-कुण्ड नहीं हैं, बल्कि असली तीर्थ वे हैं जहाँ संत महात्माओं का निवास होता है।
* तीर्थों की सार्थकता संतों से है: जल के तीर्थ (जैसे गंगा, यमुना आदि) अपने पवित्र जल से मनुष्य के बाहरी मल और पापों को धोते हैं, परंतु संतों की वाणी और उनके दर्शन मनुष्य के अंतःकरण (मन और बुद्धि) के अज्ञान रूपी अंधकार को हमेशा के लिए मिटा देते हैं।
* तीर्थों का वास्तविक रूप: भगवान के अनुसार, जहाँ भगवान के भक्त और संतजन निवास करते हैं, वह भूमि स्वतः ही परम पवित्र तीर्थ बन जाती है। तीर्थों की शोभा वहां आने वाले संतों और महापुरुषों के चरणों की धूल से होती है।
🌸 सार रूप में भगवान का संदेश:
भगवान श्रीकृष्ण का यह पावन प्रसंग हमें सिखाता है कि जीवन में केवल बाहरी कर्मकांड या तीर्थाटन ही पर्याप्त नहीं है। यदि जीवन को वास्तव में सार्थक करना है, तो संतों का सत्संग, उनकी सेवा और उनके चरणों की धूल का आश्रय लेना सबसे बड़ा साधन है।
जो मनुष्य संतों का आदर करता है और उनके वचनों को अपने जीवन में उतारता है, उसे भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति सहज ही प्राप्त हो जाती है। 🙏✨
#श्रीमद्भागवत #श्रीकृष्ण #संतमहात्म्य #तीर्थमहिमा

08/08/2026

श्री मदभगवदपुराण सुधासागर अध्याय 84 श्लोक 10,11,12,13,14,

07/08/2026

पूर्ण मोक्ष कैसे होगा, पूर्ण मोक्ष कैसे प्राप्त करें, पूर्ण मोक्ष कहाँ जाने से होगा... इन सभी प्रश्नों के उत्तर और परम सत्य की खोज में, आइए जानते हैं कि जीवन का अंतिम लक्ष्य क्या है।
हर व्यक्ति के मन में यह जिज्ञासा जरूर होती है कि इस जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति कैसे मिले और पूर्ण मोक्ष की प्राप्ति कैसे संभव है? शास्त्रों और संतों के अनुसार, शिव ही मोक्ष हैं। भगवान शिव की शरण में जाने और उनकी सच्ची भक्ति करने से ही मनुष्य को इस भवसागर से पार उतरने का मार्ग मिलता है।
हर-हर महादेव! 🙏✨
#आध्यात्मिक #मोक्ष #भगवानशिव

07/08/2026

यहाँ इस सुंदर और दार्शनिक विषय पर एक आकर्षक फेसबुक पोस्ट दी गई है, जिसे आप सीधे कॉपी करके शेयर कर सकते हैं:
❓ इस कलयुग में इंसान यदि सवालों के घेरे में उलझा रहेगा, तो ईश्वर की प्राप्ति कब करेगा? ❓
आज की इस भागदौड़ भरी जिंदगी में हम हर बात पर सवाल खड़े करते हैं— "भगवान हैं या नहीं?", "अगर हैं, तो दुःख क्यों देते हैं?", "पूजा-पाठ का क्या लाभ?"
शक और तर्कों के इस चक्रव्यूह में उलझकर इंसान ने अपने भीतर बैठे उस परमपिता को लगभग भुला ही दिया है। हम यह भूल जाते हैं कि ईश्वर कोई ऐसी पहेली नहीं है जिसे केवल बुद्धि और तर्कों के तराजू में तौला जा सके। वह तो केवल अनुभव, समर्पण और विश्वास का विषय हैं।
✨ क्यों जरूरी है इन सवालों से बाहर निकलना?
* तर्क बुद्धि को बढ़ाते हैं, पर शांति नहीं: ज्यादा सवाल करने से मन में संशय और अहंकार पैदा होता है, जबकि ईश्वर को पाने के लिए सरल और निर्मल मन चाहिए।
* कर्म का मार्ग सबसे बड़ा है: कलयुग में ग्रंथों और जटिल दर्शनों में उलझने से ज्यादा जरूरी है— "परहित सरिस धर्म नहीं भाई" यानी निष्काम भाव से दूसरों की भलाई करना।
* भीतर झांकने का समय: बाहर की दुनिया के सवालों के जवाब तलाशने से बेहतर है कि हम अपने अंतःकरण में झांकें, जहाँ ईश्वर पहले से ही विराजमान हैं।
🌿 निष्कर्ष:
ईश्वर कोई ऐसी मंजिल नहीं है जो तर्कों के रास्ते पर चलकर मिलेगी। वह तो मार्ग का वह सुकून है जो सच्चे प्रेम, निःस्वार्थ सेवा और भक्ति से ही प्राप्त होता है। इसलिए, सवालों के अंतहीन घेरे से बाहर निकलिए और जीवन को सहज बनाकर उस प्रभु की कृपा का अनुभव कीजिए।
🙏 "जहाँ तर्क समाप्त होता है, वहीं से सच्ची आस्था और ईश्वर की प्राप्ति शुरू होती है।" 🙏

02/08/2026

🙏 **जय माता दी!** 🙏
क्या आप जानते हैं कि **देवी भागवत पुराण** में माँ दुर्गा ने स्वयं क्या कहा है?
"मैं ही ब्रह्मा हूँ, मैं ही विष्णु हूँ, और मैं ही महेश हूँ! इन तीनों देवों की शक्ति मुझमें ही निहित है और मुझसे ही संपूर्ण ब्रह्मांड की उत्पत्ति होती है।" — देवी दुर्गा (अष्टांगी) से ही तीनों देवों की उत्पत्ति हुई है।
इस रहस्य और सनातन सत्य को विस्तार से जानने के लिए हमारा नया वीडियो ज़रूर देखें!
🔗 **वीडियो लिंक:** [यहाँ अपना यूट्यूब लिंक डालें]

30/07/2026

कबीर दास जी के राम जो थे वो प्रभु श्री राम ही थे प्रमाण देखे रामचरितमानस में , कबीर कह रहे हैं
, साईं इतना दीजिए जा में कुटुंब समाय मैं भी भूखा न रहूं साधु भी भूखा ना जाए

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