Mr. Prem Kumar

Mr. Prem Kumar "जागो! जीयो! उत्सव मनाओ! 🌿✨"
"ध्यान में डूबो, जीवन में बहो 🕉️💫"
"हर सांस में ओशो, हर धड़कन में जागृति... हम हैं उस मस्ती के साक्षी 🌙🌀"

ओशो के ग्रीस (Greece) प्रवास ki photos.सत्य को किसी देश, सीमा या धर्म की दीवारों में नहीं बाँधा जा सकता। जहाँ विचार स्वत...
04/08/2026

ओशो के ग्रीस (Greece) प्रवास ki photos.

सत्य को किसी देश, सीमा या धर्म की दीवारों में नहीं बाँधा जा सकता। जहाँ विचार स्वतंत्र हैं, वहीं जीवन की असली सुंदरता है।

01/08/2026

S*X energy का ऊपर उठना ही महासुख की यात्रा है! Mr. Prem Kumar

रास्ते पर आप निकलते हैं,कुछ भी पढ़ते चले जाते हैं,बिना इसकी फिक्र किए कि आंखें भोजन ले रही हैं।कुछ भी पढ़ रहे हैं!रास्ते...
31/07/2026

रास्ते पर आप निकलते हैं,
कुछ भी पढ़ते चले जाते हैं,
बिना इसकी फिक्र किए कि आंखें भोजन ले रही हैं।कुछ भी पढ़ रहे हैं!

रास्ते भर के पोस्टर लोग पढ़ते चले जाते हैं। किसने आपको इसके लिए पैसा दिया है! काहे मेहनत कर रहे हैं? रास्ते भर के दीवाल-दरवाजे रंगे-पुते हैं; सब पढ़ते चले जा रहे हैं। यह कचरा भीतर चला जा रहा है। अब यह कचरा भीतर से उपद्रव खड़े करेगा।

अखबार उठाया, तो एक कोने से लेकर ठीक आखिरी कोने तक, कि किसने संपादित किया और किसने प्रकाशित किया, वहां तक पढ़ते चले जाते हैं! और एक दफे में भी मन नहीं भरता। फिर दुबारा देख रहे हैं, बड़ी छानबीन कर रहे हैं। बड़ा शास्त्रीय अध्ययन कर रहे हैं अखबार का!
कचरा दिमाग में भर रहे हैं। फिर वह कचरा भीतर बेचैनी करेगा। घास खाकर देखें, कंकड़-पत्थर खाकर देखें, तब पता चलेगा कि पेट में कैसी तकलीफ होती है। वैसी खोपड़ी में भी तकलीफ हो जाती है। लेकिन वह, हम सोचते हैं, आहार नहीं है; वह तो हम पढ़ रहे हैं; ऐसी ही, खाली बैठे हैं। खाली बैठे हैं, तब कंकड़-पत्थर नहीं खाते!

नहीं; हमें खयाल नहीं है कि वह भी आहार है। बहुत सूक्ष्म आहार है। कान कुछ भी सुन रहे हैं। बैठे हैं, तो रेडिओ खोला हुआ है! कुछ भी सुन रहे हैं! वह चला जा रहा है दिमाग के भीतर। दिमाग पूरे वक्त तरंगों को आत्मसात कर रहा है। वे तरंगें दिमाग के सेल्स में बैठती जा रही हैं। आहार हो रहा है।

और एक बार भोजन इतना नुकसान न पहुंचाए, क्योंकि भोजन के लिए परगेटिव्स उपलब्ध हैं। अभी तक मस्तिष्क के लिए परगेटिव्स उपलब्ध नहीं हैं। अभी तक मस्तिष्क में जब कचरा पैदा हो जाए, और अधिक मस्तिष्क में कांस्टिपेशन है–कांस्टिपेशन दिमागी–और उसके परगेटिव्स हैं नहीं कहीं। तो बस, खोपड़ी में सड़ता है। सड़ जाता है सब भीतर। और किसी को होश नहीं है।

🔥ओशो🔥

गीता दर्शन

एक बड़ी अनूठी कहानी है, अशोक के जीवन में घटी। कहना मुश्किल है कि कहा तक सच है। लेकिन बड़ी गहरी सचाई की खबर देती है।एक संध्...
31/07/2026

एक बड़ी अनूठी कहानी है, अशोक के जीवन में घटी। कहना मुश्किल है कि कहा तक सच है। लेकिन बड़ी गहरी सचाई की खबर देती है।

एक संध्या, वर्षा के दिन हैं, पाटलीपुत्र में, पटना में अशोक गंगा के किनारे खड़ा है। भयंकर बाढ़ आई है गंगा में। सीमाएं तोड़कर गंगा बह रही है। बड़ा विराट उसका रूप है; भयंकर तांडव करता उसका रूप है। न मालूम कितने गांव बहा ले गई। न मालूम कितने खेतों को विनष्ट कर दिया, कितने पशु—पक्षी बहते चले जा रहे हैं। अशोक खड़ा है अपने आमात्यों, अपने मंत्रियों के साथ। और उसने कहा कि क्या यह संभव है, क्या कोई ऐसा उपाय है कि गंगा उलटी बह सके? ऐसा अचानक उसको खयाल उठ आया कि क्या कोई रास्ता है कि गंगा उलटी बह सके स्रोत की तरफ? आमात्यों ने कहा, असंभव। और अगर चेष्टा भी की जाए तो अति कठिन है। एक वेश्या भी अशोक के साथ गंगा के किनारे आ गई है। वह नगर की सबसे बड़ी वेश्या है। उन दिनों में वेश्याएं भी बड़ी सम्मानित होती थीं। वह नगरवधू है। उस वेश्या का नाम था, बिंदुमति। वह हंसने लगी और उसने कहा कि अगर आप आज्ञा दें, तो मैं इसे उलटा बहा सकती हूं।

अशोक चौंका। उसने कहा कि क्या ढंग है? क्या मार्ग है इसको उलटा बहाने का? तेरे पास ऐसी कौन—सी कला है? तो उस वेश्या ने कहा, मेरी निजता का सत्य।

बड़ी अनूठी कहानी है। उसने कहा, मेरी निजता का सत्य, मेरे जीवन का सत्य मेरी सामर्थ्य है। मैंने उसका कभी उपयोग नहीं किया। बड़ी ऊर्जा मेरे जीवन के सत्य की मेरे भीतर पड़ी है। अगर आप कहें, तो यह गंगा उलटी बहेगी, मेरे कहने से बहेगी। इसका मुझे पक्का भरोसा है। क्योंकि मैं अपने सत्य से कभी भी नहीं डिगी। सम्राट को भरोसा न आया, पर उसने कहा, देखें। वेश्या ने आंखें बंद कीं; और कहानी कहती है कि गंगा उलटी बहने लगी। सम्राट तो चरणों पर गिर पड़ा वेश्या के। और उसने कहा, बिंदुमति, हमें तो कभी पता ही न चला कि तू वेश्या के अतिरिक्त भी कुछ और है। यह राज, यह रहस्य तूने कहां सीखा? यह तो बड़े सिद्ध पुरुष भी नहीं कर सकते हैं।

वेश्या ने कहा, मुझे सिद्ध पुरुषों का कोई पता नहीं। मैं तो सिर्फ एक सिद्ध वेश्या हूं। और वही मेरे जीवन का सत्य है।

क्या है तेरे जीवन का सत्य, तू खोलकर कह, अशोक ने कहा। उसने कहा, मेरे जीवन का सत्य इतना है कि मैं जानती हूं, वेश्या होना ही मेरे जीवन की शैली है, वही मेरी नियति है। अन्यथा मैंने कभी कुछ और होना नहीं चाहा। अन्यथा की चाह ही मैंने कभी अपने भीतर नहीं आने दी। मैं समग्र हूं मैं सिर से लेकर पैर तक वेश्या हूं। मेरा रोआं—रोआं वेश्या है। और मैंने वेश्या के धर्म से कभी अपने को च्युत नहीं किया।

अशोक ने पूछा, क्या है वेश्या का धर्म? पागल, मैंने कभी सुना नहीं कि वेश्या का भी कोई धर्म होता है। हम तो वेश्या को अधार्मिक समझते हैं। और यही मैं मानता था कि तू कितनी ही सुंदर हो, लेकिन तेरे भीतर एक गहरी कुरूपता है। क्योंकि तू शरीर को बेच रही है, सौंदर्य को बेच रही है। इससे क्षुद्र तो कोई व्यवसाय नहीं !

वेश्या ने कहा, व्यवसाय क्षुद्र और बड़े नहीं होते, व्यवसायी पर सब निर्भर करता है। मेरे जीवन का सत्य यह है कि मेरे गुरु ने, जिसने मुझे वेश्या होने की शिक्षा और दीक्षा दी, उसने मुझे कहा कि एक सूत्र भर को सम्हाले रखना, तो तेरा मोक्ष कभी तुझसे छिन नहीं सकता। और वह सूत्र यह है कि चाहे धनी आए चाहे गरीब आए; चाहे शूद्र आए, चाहे ब्राह्मणं आए; चाहे सुंदर पुरुष आए, चाहे कुरूप पुरुष आए; चाहे जवान, चाहे कोढ़ी आए, रुग्ण आए; जो भी तुझे पैसे दे, तू पैसे पर ध्यान रखना और व्यक्तियों के साथ समान व्यवहार करना। न तो तू कोढी को और रोगी को घृणा करना, न सुंदर को प्रेम करना। वह वेश्या का काम नहीं है। तू तटस्थ रहना। तेरा काम है पैसा ले लेना। बस, बात खतम हो गई। तेरा ध्यान पैसे पर रहे। ब्राह्मण आए, तो तू अतिशय भाव से उसके पैर मत छूना। और शूद्र आए, तो तू उसे इनकार मत करना। तेरा काम है पैसा। वेश्या का ध्यान पैसे पर। बाकी कोई भी आए, तू सम—भाव रखना। वही तेरा सम्यकत्व है, वही तेरा सत्य है।

और मैंने उसे सम्हाला है। मैंने न तो कभी किसी के प्रति प्रेम किया, लगांव दिखाया, आसक्ति बनाई, मोह किया, नहीं। न मैंने कभी किसी को घृणा की, जुगुप्सा की, नहीं। मैं दूर तटस्थ खड़ी रही हूं।

ओशो,
गीता दर्शन

जिस दिन मैंने विश्वविद्यालय की नौकरी छोड़ी, सबसे पहला काम मैंने यह किया कि अपने सभी प्रमाणपत्रों और डिग्रियों को, जिन्हे...
30/07/2026

जिस दिन मैंने विश्वविद्यालय की नौकरी छोड़ी, सबसे पहला काम मैंने यह किया कि अपने सभी प्रमाणपत्रों और डिग्रियों को, जिन्हें वर्षों से संभालकर रखा था, आग के हवाले कर दिया।

उन्हें जलते हुए देखकर मुझे इतनी खुशी हुई कि मेरा पूरा परिवार वहाँ इकट्ठा हो गया। उन्हें लगा कि अब मैं सचमुच पागल हो गया हूँ। वैसे भी वे हमेशा सोचते थे कि मैं थोड़ा-बहुत पागल तो हूँ ही।

उनके चेहरों को देखकर मैं और ज़ोर से हँसने लगा।

उन्होंने कहा, "आख़िर यह क्या कर डाला?"

मैंने कहा, "हाँ, आख़िरकार यह काम पूरा हो ही गया।"

उन्होंने पूछा, "क्या पूरा हो गया? तुम्हारा मतलब क्या है?"

मैंने कहा,

"जीवन भर मेरी इच्छा थी कि इन प्रमाणपत्रों को जला दूँ, लेकिन ऐसा कर नहीं सकता था, क्योंकि उनकी हमेशा ज़रूरत पड़ती थी। अब इनकी कोई आवश्यकता नहीं रही। अब मैं फिर से उतना ही अनपढ़ हो सकता हूँ, जितना जन्म के समय था।"

उन्होंने कहा,

"तुम बिल्कुल पागल हो गए हो! इतने कीमती प्रमाणपत्र जला दिए। तुमने तो अपना स्वर्ण पदक भी कुएँ में फेंक दिया था, और अब विश्वविद्यालय में प्रथम आने का प्रमाणपत्र भी जला दिया।"

मैंने कहा,

"अब कोई भी मुझसे इन सब बकवास बातों की चर्चा नहीं कर सकेगा।"

आज भी मेरे पास कोई विशेष योग्यता या उपाधि नहीं है। मैं हरिप्रसाद जी जैसा महान संगीतकार नहीं हूँ, न ही कोई नोबेल पुरस्कार विजेता हूँ। मैं तो कुछ भी नहीं हूँ—फिर भी हज़ारों लोग मुझसे बिना किसी अपेक्षा के प्रेम करते हैं।

— ओशो
स्वर्णिम बचपन (Golden Childhood), प्रवचन 32

.                   - गुरु पूर्णिमा की अनंत                           शुभकामनाऐं -         शिष्‍य सब तरह के जन्‍मों- जन्...
29/07/2026

. - गुरु पूर्णिमा की अनंत
शुभकामनाऐं -

शिष्‍य सब तरह के जन्‍मों- जन्‍मों के अंधेरे को लेकर आ गए। वे अंधेरे बादल हैं, आषाढ़ का मौसम हैं। उसमें भी गुरु चांद की तरह चमक सके, उस अंधेरे से घिरे वातावरण में भी रोशनी पैदा कर सके, तो ही गुरु है। इसलिए आषाढ़ की पूर्णिमा! वह गुरु की तरफ भी इशारा है उसमें और शिष्य की तरफ भी इशारा है। और स्वभावत: दोनों का मिलन जहां हो, वहीं कोई सार्थकता है।
ध्यान रखना, अगर तुम्हें यह समझ में आ जाए काव्य- प्रतीक, तो तुम आषाढ़ की तरह हो, अंधेरे बादल हो। न मालूम कितनी कामनाओं और वासनाओं का जल तुममें भरा है, और न मालूम कितने जन्मों- जन्मों के संस्कार लेकर तुम चल रहे हो, तुम बोझिल हो। तुम्हें तोड़ना है, तुम्हें चीरना है। तुम्हारे अंधेरे से घिरे हृदय में रोशनी पहुंचानी है; इसलिए पूर्णिमा!
चांद जब पूरा हो जाता है, तब उसकी एक शीतलता है। चांद को ही हमने गुरु के लिए चुना है। सूरज को चुन सकते थे, ज्यादा मौजूं होता, तथ्यगत होता। क्योंकि चांद के पास अपनी रोशनी नहीं है। इसे थोडा समझना। चांद की सब रोशनी उधार है। सूरज के पास अपनी रोशनी है। चांद पर तो सूरज की रोशनी का प्रतिफलन होता है। जैसे कि तुम दीए को आईने के पास रख दो, तो आईने में से भी रोशनी आने लगती है। वह दीए की रोशनी का प्रतिफलन है, वापस लौटती रोशनी है। चांद तो केवल दर्पण का काम करता है, रोशनी सूरज की है।
हमने गुरू को सूरज ही कहा होता, तो बात ज्यादा तथ्यपूर्ण होती। मिश्रित कर दे। चांद शून्य है; उसके पास कोई रोशनी नहीं है, लेता और सूरज के पास प्रकाश भी महान है, विराट है। चांद के पास कोई बहुत बड़ा प्रकाश थोड़े ही है, बड़ा सीमित है; इस पृथ्वी तक आता है, और कहीं तो जाता नहीं। पर हमने सोचा है बहुत, सदियों तक, और तब हमने चांद को चुना है दो कारणों से। एक, गुरु के पास भी रोशनी अपनी नहीं है, परमात्मा की है। वह केवल प्रतिफलन है। वह जो दे रहा है, अपना नहीं है; वह केवल निमित्तमात्र है, वह केवल दर्पण है।
तुम परमात्मा की तरफ सीधा नहीं देख पाते, सूरज की तरफ सीधा देखना बहुत मुश्किल है। देखो, तो अड़चन समझ में आ जाएगी। प्रकाश की जगह आंखें अंधकार से भर जाएंगी। परमात्मा की तरफ सीधा देखना असंभव है, आंखें फूट जाएंगी, अंधे हो जाओगे। रोशनी ज्यादा है, बहुत ज्यादा है, तुम सम्हाल न पाओगे, असह्य हो जाएगी। तुम उसमें टूट जाओगे, खंडित हो जाओगे, विकसित न हो पाओगे।
इसलिए हमने सूरज की बात छोड़ दी। वह थोड़ा ज्यादा है; शिष्य की सामर्थ्य के बिलकुल बाहर है। इसलिए हमने बीच में गुरु को लिया है। गुरु एक दर्पण है, पकड़ता है सूरज की रोशनी और तुम्हें दे देता है। लेकिन इस देने में रोशनी मधुर हो जाती है। इस देने में रोशनी की त्वरा और तीव्रता समाप्त हो जाती है। दर्पण को पार करने में रोशनी का गुणधर्म बदल जाता है। सूरज इतना प्रखर है, चांद इतना मधुर है!
इसलिए तो कबीर ने कहा है, गुरु गोविंद दोई खड़े, काके लागू पाय। किसके छुऊं पैर? वह घड़ी आ गई, जब दोनों सामने खड़े हैं। फिर कबीर ने गुरु के ही पैर छुए, क्योंकि बलिहारी गुरु आपकी, जो गोविंद दियो बताय।सीधे तो देखना संभव न होता। गुरु दर्पण बन गया। जो असंभवप्राय था, उसे गुरु ने संभव किया है, जो दूर आकाश की रोशनी थी, उसे जमीन पर उतारा है। गुरु माध्यम है। इसलिए हमने चांद को चुना।
गुरु के पास अपना कुछ भी नहीं है। कबीर कहते हैं, मेरा मुझमें कुछ नहीं। गुरु है ही वही जो शून्यवत हो गया है। अगर उसके पास कुछ है, तो वह परमात्मा का जो प्रतिफलन होगा, वह भी विकृत हो जाएगा, वह शुद्ध न होगा। चांद के पास अपनी रोशनी ही नहीं है जिसको वह मिला दे, है सूरज से, देता है तुम्हें। वह सिर्फ मध्य में है, माधुर्य को जन्मा देता है।
सूरज कहना ज्यादा तथ्यगत होता, लेकिन ज्यादा सार्थक न होता। इसलिए हमने चांद कहा है। फिर सूरज सदा सूरज है, घटता—बढ़ता नहीं। गुरु भी कल शिष्य था। सदा ऐसा ही नहीं था। बुद्ध से बुद्ध पुरुष भी कभी उतने ही तमस, अंधकार से भरे थे, जितने तुम भरे हो। सूरज तो सदा एक-सा है।
इसलिए वह प्रतीक जमता नहीं। गुरु भी कभी खोजता था, भटकता था, वैसे ही, उन्हीं रास्तों पर, जहां तुम भटकते हो, जहां तुम खोजते हो। वही भूलें गुरु ने की हैं, जो तुमने की हैं। तभी तो वह तुम्हें सहारा दे पाता है। जिसने भूलें ही न की हों, वह किसी को सहारा नहीं दे सकता। वह भूल को समझ ही नहीं सकता। जो उन्हीं रास्तों से गुजरा हो; उन्हीं अंधकारपूर्ण मार्गों में भटका हो, जहां तुम भटकते हो, उन्हीं गलत द्वारों पर जिसने दस्तक दी हो, जहां तुम देते हो; मधुशालाओं से और वेश्यागृहों से जो गुजरा हो; जिसने जीवन का सब विकृत और विकराल भी देखा हो, जिसने जीवन में शैतान से भी संबंध जोड़े हों—वही तुम्हारे भीतर की असली अवस्था को समझ सकेगा।
नहीं, सूरज तुम्हें न समझ सकेगा, चांद समझ सकेगा। चांद अंधेरे से गुजरा है; पंद्रह दिन, आधा जीवन तो अंधेरे में ही डूबा रहता है। अमावस भी जानी है चांद ने, सदा पूर्णिमा ही नहीं रही है। भयंकर अंधकार भी जाना है, शैतान से भी परिचित हुआ है, सदा से ही परमात्मा को नहीं जाना है। यात्री है चांद। सूरज तो यात्री नहीं है, सूरज तो वैसा का वैसा है। अपूर्णता से पूर्णता की तरफ आया है गुरु चांद की तरह- एकम आई, दूज आई, तीज आई धीरे-धीरे बढ़ा है एक- एक कदम। और वह घड़ी आई, जब वह पूर्ण हो गया है।
गुरु तुम्हारे ही मार्ग पर है; तुमसे आगे, पर मार्ग वही है। इसलिए तुम्हारी सहायता कर सकता है। परमात्मा तुम्हारी सहायता नहीं कर सकता। यह तुम्हें थोड़ा कठिन लगेगा सुनना। परमात्मा तुम्हारी सहायता नहीं कर सकता, क्योंकि वह उस यात्रा में कभी भटका नहीं है, जहां तुम भटक रहे हो। वह तुम्हें समझ ही न पाएगा। वह तुमसे बहुत दूर है। उसका फासला अनंत है। तुम्हारे और उसके बीच कोई भी सेतु नहीं बन सकते।
गुरु और तुम्हारे बीच सेतु बन सकते हैं। कितना ही अंतर पड़ गया हो पूर्णिमा के चांद में- कहां अमावस की रात, कहां पूर्णिमा की रात कितना ही अंतर पड़ गया हो, फिर भी एक सेतु है। अमावस की रात भी चांद की ही रात थी, अंधेरे में डूबे चांद की रात थी। चांद तब भी था, चांद अब भी है। रूपांतरण हुए हैं, क्रांतिया हुई हैं; लेकिन एक सिलसिला है।
तो गुरु तुम्हें समझ पाता है। और मैं तुमसे कहता हूं तुम उसी को गुरु जानना, जो तुम्हारी हर भूल को माफ कर सके। जो माफ न कर सके, समझना, उसने जीवन को ठीक से जीया ही नहीं। अभी वह पूर्ण तो हो गया होगा- जो मुझे संदिग्ध है। जो दूज का चांद ही नहीं बना, वह पूर्णिमा का चांद कैसे बनेगा–ओशो

जब दो परिपक्व और समझदार व्यक्तियों के बीच प्रेम होता है तो जीवन का सबसे बड़ा विरोधाभास घटता है, एक बहुत ही सुंदर घटना घटत...
29/07/2026

जब दो परिपक्व और समझदार व्यक्तियों के बीच प्रेम होता है तो जीवन का सबसे बड़ा विरोधाभास घटता है, एक बहुत ही सुंदर घटना घटती है -- दोनों साथ-साथ होते हैं, लेकिन अपरिसीम रूप से अकेले।

वे एक साथ होते हैं इतने गहरे जुड़े हुए कि वे लगभग एक हो जाते हैं। उनकी एकता से उनका निजी व्यक्तित्व ध्वस्त नहीं होता, बल्कि वास्तविक रूप से उनकी निजता बढ़ जाती है।

दो समझदार व्यक्तियों के प्रेम से एक-दूसरे को अधिक स्वतंत्र रहने में मदद मिलती है। इसमें कोई राजनीति नहीं होती, कोई कूटनीति नहीं होती, एक-दूसरे पर हावी हो जाने का कोई प्रयास नहीं होता। जिससे तुम प्रेम करते हो, उसके ऊपर तुम आधिपत्य कैसे जमा सकते हो?

अपरिपक्व और गैर-समझदार लोग जब प्रेम में होते हैं तो वे एक-दूसरे की स्वतंत्रता को ध्वस्त कर देते हैं, गुलामी उत्पन्न करते हैं, कैद बना देते हैं।

समझदार व्यक्ति प्रेम में एक-दूसरे को स्वतंत्र रहने में सहायक होते हैं। वे हर तरह से एक-दूसरे की गुलामी को समाप्त करने में एक-दूसरे की मदद करते हैं।

और जब स्वतंत्र रूप से प्रेम का प्रवाह होता है, तो इसमें सौंदर्य होता है। जब प्रेम का प्रवाह निर्भरता से होता है, तो इसमें कुरूपता होती है।

याद रखो, स्वतंत्रता का मूल्य प्रेम से अधिक है। यदि प्रेम स्वतंत्रता को नष्ट कर रहा है तो प्रेम को छोड़ा जा सकता है, स्वतंत्रता को बचाना होगा। स्वतंत्रता का मूल्य अधिक है, और स्वतंत्रता के बिना तुम कभी भी खुश नहीं रह सकते -- यह असंभव है।

स्वतंत्रता हर स्त्री-पुरूष की आंतरिक और मूलभूत इच्छा होती है, पूर्ण स्वतंत्रता -- और इसी स्वतंत्रता में प्रेम के फूल खिलते हैं!

☘️💞☘️ ओशो☘️💞☘️
"दि तंत्रा विज़न" पुस्तक के एक प्रवचन का हिंदी अनुवाद

.                 ज्ञानोपलब्ध सहजोबाई                        के जन्मदिन की                     अनन्य शुभकामनाऐं         ...
25/07/2026

. ज्ञानोपलब्ध सहजोबाई
के जन्मदिन की
अनन्य शुभकामनाऐं

जगत तरैयां भोर की,
सहजो ठहरत नाहिं~
जैसे मोती ओस की,
पानी अंजुली माहिं।।

अड़सठ तीरथ गुरु चरण,
परवी होत अखंड~
सहजो ऐसो धामना,
सकल अंड ब्रह्मंड।।

आत्मोपलब्ध सहजो बाई के जन्मदिन की सभी को बहुत - बहुत शुभकामनायें। २५ जुलाई १७२५ को दिल्ली में आपका जन्म हुआ। आप संत चरणदास की शिष्या थीं।

ओशो कहते हैं कि "सहजोबाई का मार्ग है प्रेम, शक्ति, समर्पण, गुरु-पूजा; फिर भी वह अंतर्मुखता, अंतर्यात्रा और वीतरागता पर क्यों जोर देने लगती है? क्योंकि कोई विरोध नहीं है। अगर प्रेम परिपूर्ण होगा तो वीतराग हो ही जाएगा। वीतरागता अगर परिपूर्ण होगी, उससे प्रेम को अहर्निश-धारा बहने ही लगेगी।
क्या है वीतराग का अर्थ? वीतराग का अर्थ है, जो राग के ऊपर उठ गया। और प्रेम का कथा अर्थ है? जो काम के ऊपर उठ गया। तुम शब्दों के आर-पार देखने में कब सफल हो पाओगे? शब्द तुम्हारी आंखों को इतना क्यों अटका लेते हैं? प्रेम का अर्थ है, रोग से मुक्ति। वीतराग का भी वही अर्थ है। वीतराग ध्यानियों का शब्द है; और भक्ति प्रेमियों का शब्द है। बस इतनी ही झंझट है, और कोई झंझट नहीं है। अगर तुम महावीर से पूछोगे, वे कहेंगे वीतराग। अगर तुम मीरा से, सहजो से, दया से पूछोगे, चैतन्य से पूछोगे, वे कहेंगे प्रेम, भक्ति।


Sahajo was a sanyasin, a celibate. She didn’t have a family. The world didn’t attract her. She left everything at the master’s feet. Those feet were her home, those feet were her family. Here is her total acceptance of God. And I would not ask of Sahajo that she should be in a family, should become a wife, a mother. If she had asked me, I would have said, “Do whatever you feel like. Don’t force anything on yourself.” Her celibacy was not forced… because nobody ever saw Sahajo in misery. She was always happy, ever-blossoming like a flower. Nobody could find a reason for there to be any other direction to her life than what she had chosen. That was her direction. It is said that the fruits are the proof of the tree; then the achievement of a life is proof of the life. If Sahajo attained the ultimate bliss in her life, it means she lived life as she should have. If she could be ecstatic, if her lotus could blossom, then it is the proof that the way she lived was right; otherwise the flower could not have blossomed~Osho


गुरुवचन हिय ले धरो,
ज्यों कृपणन के दाम~
भूमिगढ़े माथे दिये ,
सहजो लहै न राम।।

मन में तो आनंद है,
तनु बौरा सबअंग~
ना काहू के संग है,
सहजो ना कोई संग।।

पुस्तक समीक्षा :माय डायमंड डेज़ विद ओशो — शुन्यो******************************– स्वामी प्रतियान गिरि-- हिंदी रूपान्तरण :...
23/07/2026

पुस्तक समीक्षा :
माय डायमंड डेज़ विद ओशो — शुन्यो
******************************
– स्वामी प्रतियान गिरि
-- हिंदी रूपान्तरण : Mr. Prem Kumar

«"जिन लोगों के पास सत्ता है, वे मुझे जीवित नहीं देखना चाहते, क्योंकि जब तक मैं हूँ, कोई भी अपनी सत्ता का खेल नहीं खेल सकता।"
— ओशो»

यह वाक्य ओशो ने रजनीशपुरम में कहा था और उनकी शिष्या शुन्यो ने अपनी पुस्तक My Diamond Days with Osho में इसे दर्ज किया है।

यदि मा आनंद शीला की पुस्तक Don't Kill Him पुणे से रजनीशपुरम और फिर स्विट्ज़रलैंड तक की उनकी कहानी है, तो शुन्यो की यह पुस्तक उस कहानी का दूसरा पक्ष खोलती है। इसमें ओशो की गिरफ्तारी, रजनीशपुरम का पतन, दुनिया के 21 देशों द्वारा उनका प्रवेश निषिद्ध किया जाना, भारत वापसी और अंततः उनके शरीर छोड़ने तक की पूरी यात्रा दर्ज है।

क्या कोई व्यक्ति केवल अपने गुरु के कपड़े धोने के लिए पंद्रह वर्षों तक निस्वार्थ भाव से उनके साथ रह सकता है?

यदि इसका उत्तर "हाँ" है, तो उसका नाम है मा प्रेम चेतना, जिन्हें ओशो ने अपने अंतिम वर्षों में नया संन्यास नाम मा प्रेम शुन्यो दिया। उनका जन्म इंग्लैंड के कॉर्नवाल में सैंडी पेंगेली (Sandy Pengelly) के रूप में हुआ था। लंदन में संयोग से ओशो की एक पुस्तक उनके हाथ लगी और वही उनके जीवन का निर्णायक मोड़ बन गई। वे पुणे आईं, ओशो से मिलीं, फिर रजनीशपुरम, अमेरिका की जेल, अनेक देशों की भटकन और अंततः पुणे तक उनके साथ रहीं—यहाँ तक कि उनके अंतिम क्षणों की भी साक्षी बनीं।

ओशो के पास लोग अलग-अलग कारणों से आए, लेकिन पश्चिमी देशों, विशेषकर महिलाओं को, उनके भीतर का रहस्य, उनकी उपस्थिति और उनकी चेतना आकर्षित करती थी। शुन्यो भी उसी आकर्षण से खिंची चली आई थीं।

यह पुस्तक केवल घटनाओं का विवरण नहीं है; यह उस दौर की अंदरूनी तस्वीर भी सामने रखती है।

शुन्यो लिखती हैं कि कैसे शीला धीरे-धीरे इतनी शक्तिशाली हो गई थीं कि कई निर्णय ओशो से पूछे बिना लेने लगीं। वह ओशो के आसपास के प्रभावशाली लोगों को हटाना चाहती थीं। रजनीशपुरम में "कंजंक्टिवाइटिस" का बहाना बनाकर डॉक्टरों, दंत चिकित्सकों और निजी सहयोगियों तक को ओशो से दूर रखा गया। कहा गया—"वे सब गंदे लोग हैं, उन्हें ओशो की सेवा नहीं करनी चाहिए।"

स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि ओशो को स्वयं सभा बुलाकर कहना पड़ा—

«"यदि हम साथ मिलकर प्रेम और सामंजस्य से रहना नहीं सीख सकते, तो मैं 6 जुलाई को अपना शरीर छोड़ दूँगा।"»

रजनीशपुरम में कई ऐसी घटनाएँ हुईं जो आध्यात्मिक कम और सत्ता संघर्ष अधिक प्रतीत होती हैं। अचानक 21 "प्रबुद्ध" लोगों की सूची जारी होती है, फिर संबुद्धों, महासत्त्वों और बोधिसत्त्वों की सूची। आश्चर्य की बात यह कि शीला स्वयं इनमें कहीं नहीं थीं।

जहाँ शीला की पुस्तक उनकी दृष्टि से कहानी कहती है, वहीं शुन्यो दूसरी खिड़की खोलती हैं।

वह ऐसे कई चौंकाने वाले प्रसंग लिखती हैं—विवेक और शीला के बीच ईर्ष्या, विवेक को ज़हर मिली चाय, बुद्ध हॉल में देवराज को ज़हरीला इंजेक्शन लगाने का प्रयास, टेलीफोन टैपिंग, पानी के स्रोत में ज़हर मिलाने की योजना जिससे पहले हजारों मछलियाँ मर गईं। यह सब पढ़ते हुए कई बार लगता है जैसे किसी राजनीतिक थ्रिलर या अपराध कथा के पन्ने पलट रहे हों, किसी आध्यात्मिक आश्रम के नहीं।

पुस्तक पढ़ते हुए शुन्यो का पश्चिमी दृष्टिकोण भी सामने आता है। कहीं वह पुणे की गलियों को "गंदी और बदबूदार" कहती हैं, कहीं भारत की गरीबी का उल्लेख करती हैं, तो कहीं नेपाल के भोजन को गरीबी के कारण निम्न स्तर का बताती हैं। यह उनके सांस्कृतिक दृष्टिकोण की झलक भी है।

लेकिन अपने गुरु के प्रति उनका प्रेम और श्रद्धा कहीं भी कम नहीं होती।

वह लिखती हैं—

«"मैंने ओशो को कभी आनंद से अलग किसी अवस्था में नहीं देखा। जेल, कम्यून का विनाश, अपमान—इन सबके बीच भी वे भीतर से अछूते रहे। वे दुखी नहीं थे, केवल थके हुए और कभी-कभी क्रोधित।"»

अमेरिका से लौटने के बाद जब ओशो कुल्लू के स्पैन रिज़ॉर्ट में रहे, तब भी प्रशासन और पुलिस ने उन्हें चैन से नहीं रहने दिया। विदेशी शिष्यों को बार-बार देश छोड़ने के आदेश दिए गए। शुन्यो का आरोप है कि इसके पीछे मा लक्ष्मी की भूमिका थी और उस समय की भारतीय सरकार भी ओशो को कहीं टिकने नहीं देना चाहती थी।

यूनान से निष्कासित किए जाने पर ओशो ने कहा था—

«"यदि चार सप्ताह के पर्यटक वीज़ा पर आया एक व्यक्ति तुम्हारी दो हजार वर्ष पुरानी नैतिकता और धर्म को नष्ट कर सकता है, तो फिर उसे बचाने का कोई अर्थ नहीं है।"»

पुस्तक में कुछ बेहद निजी प्रसंग भी हैं।

शुन्यो अपने मातृत्व की तीव्र इच्छा का उल्लेख करती हैं। वह लिखती हैं कि यदि आर्थिक रूप से सक्षम हुईं तो पाँच बच्चों की माँ बनना चाहेंगी, चाहे विवाह हो या न हो।

एक अन्य प्रसंग में वह बताती हैं कि उनके साथी मिलारेपा विवेक की ओर आकर्षित हुए। ओशो ने उनसे कहा—

«"यदि हम अपने प्रेमी या प्रेमिका को दूसरे व्यक्ति के साथ प्रेम बाँटने की स्वतंत्रता भी नहीं दे सकते, तो फिर हम दुनिया से अलग कैसे हुए? यदि यह यहाँ भी संभव नहीं है, तो फिर कहाँ होगा?"»

शुन्यो ने इसकी अनुमति दी और अगले दिन दोनों अत्यंत प्रसन्न दिखाई दिए।

जुलाई 1986 में ओशो पुणे लौटे। लेकिन यहाँ भी पुलिस और सरकार उन्हें संदेह की दृष्टि से देखती रही। प्रशासन को डर था कि उनकी उपस्थिति से अशांति फैल सकती है।

एक दिन ओशो ने शुन्यो से कहा—

«"अमेरिका जाना मेरी सबसे बड़ी भूल थी। इसने मेरे काम को नष्ट कर दिया।"»

शायद यह स्वीकारोक्ति बहुत देर से आई।

थैलियम विषाक्तता थी या नहीं, इस पर आज भी बहस है। लेकिन शुन्यो लिखती हैं कि ओशो अक्सर असहनीय पीड़ा में कहते थे—

«"उन्होंने मुझे सीधे मार ही क्यों नहीं दिया?"»

उनकी बाँहों में दर्द रहता, शरीर कमजोर होता जाता। लेकिन हर बार जब वे प्रवचन देने बैठते, कुछ ही मिनटों में ऐसा लगता जैसे उनकी चेतना शरीर की सारी सीमाओं को पार कर गई हो।

पुस्तक का सबसे मार्मिक अध्याय है निरवानो (पूर्व नाम विवेक) की मृत्यु।

शुन्यो लिखती हैं—

«"मुझे नहीं पता वह क्यों मरी। मैं इतना जानती हूँ कि वह भीतर से बेहद दुखी थी और कई बार मरने की इच्छा व्यक्त कर चुकी थी।"»

यह प्रश्न पाठक के मन में अनायास उठता है कि यदि ओशो के सबसे निकट रहने वाला व्यक्ति भी भीतर से इतना टूट सकता है, तो ध्यान, आश्रम और आध्यात्मिक वातावरण की भूमिका को किस रूप में समझा जाए? इसका उत्तर शायद प्रत्येक साधक को स्वयं खोजना होगा।

अंतिम दिनों का दृश्य अत्यंत भावुक है।

शुन्यो लिखती हैं—

«"जब मैंने उन्हें मंच के उस पार खड़े देखा, तो भीतर से आवाज़ आई—यह आख़िरी बार है जब मैं ओशो को देख रही हूँ। यदि अभी भी अपने दुःख को नहीं छोड़ सकी, तो जीवन भर उसे ढोना पड़ेगा।"»

अपने अंतिम समय में ओशो ने जयेश से कहा—

«"मैं तुम्हें अपना सपना सौंपकर जा रहा हूँ।"»

उनकी इच्छा थी कि यह कार्य सदियों तक चलता रहे।

लेकिन आज, 2026 में, केवल लगभग पैंतीस वर्ष बाद ही हम देखते हैं कि विशेषकर पश्चिमी देशों में अनेक ओशो कम्यून बंद हो चुके हैं। यह स्थिति कई गंभीर प्रश्न खड़े करती है। क्या ओशो का सपना उसी विस्तार से आगे बढ़ पाया जिसकी उन्होंने कल्पना की थी? इसका उत्तर इतिहास आने वाले समय में देगा।

"माय डायमंड डेज़ विद ओशो" केवल एक संस्मरण नहीं है। यह प्रेम, समर्पण, सत्ता संघर्ष, मानवीय कमजोरियों, आध्यात्मिक ऊँचाइयों और इतिहास के एक महत्वपूर्ण अध्याय का जीवंत दस्तावेज़ है।

जो भी व्यक्ति ओशो, रजनीशपुरम और उस पूरे दौर को समझना चाहता है, उसके लिए यह पुस्तक अवश्य पढ़ी जानी चाहिए।



(चित्र : ओशो के साथ शुन्यो, पुस्तक, समीक्षक, और हिंदी रूपान्तरणकर्ता 😊)

Address

Daudnagar, Aurangabad
Daudnagar

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when Mr. Prem Kumar posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Shortcuts

Share