28/07/2026
आरक्षण ख़त्म करने की बात करते हो? ठीक है, आंदोलन करो हम भी तुम्हारा साथ देंगे। लेकिन उससे पहले एक काम और कर लो—जाति और जातिवाद की मानसिकता ख़त्म करो।
हाँ वही मानसिकता, जिसमें हम पिछड़े या दलित समाज का व्यक्ति आगे बढ़ जाए तो तुम सामने उसकी पीठ थपथपा देते हो, लेकिन पीठ पीछे कहते हो —"इसके दादा-परदादा हमारे खेत जोतते थे", "इसकी दादी हमारे यहाँ मैला ढोती थी।"
तुम ख़त्म करो आरक्षण साथ देंगे तुम्हारा लेकिन आज 2026 में भी तुम लोग साथ बैठते तो हो लेकिन एक जातिगत दूरी बना कर रखते हो।
तुम लोग दलील देते हो की आरक्षण का लाभ पिछड़े और दलितों में केवल क्रीमी लेयर तक सीमित रह गया है, चलो सहमत भी हूँ। तो चलो एक काम करते हैं आओ साथ मिलकर इस समाज के गरीब व वंचितों को शिक्षित और जागरूक करते हैं उन्हें बराबरी पर लाते हैं और आरक्षण का लाभ लेने में मदद करते हैं। इसका दो फ़ायदा होगा एक तो सब बराबर हो जायेंगे और दूसरा ये की हमारे समाज के शोषण का जो दाग है तुम लोग पर वो भी मिटेगा। समतामूलक समाज की धारणा स्पष्ट होगी। फिर तो आरक्षण को नए शीरे से लागू करना आसान होगा।
हम ये भी मानते हैं की तुम्हारे समाज में भी अत्यंत गरीब लोग है जिन्हें सहायता की आवश्यकता है लेकिन वो सिर्फ गरीब हैं जिसका हल सरल है। लेकिन हमारे समाज में जो कमज़ोर हैं वो गरीब और शोषित भी। गरीबी और सामाजिक भेदभाव एक ही समस्या नहीं हैं। आर्थिक अभाव आय को प्रभावित करता है, जबकि जातिगत भेदभाव व्यक्ति की सामाजिक गरिमा, अवसरों और स्वीकार्यता को भी प्रभावित करता है।
यदि तुम्हारा मानना है कि आरक्षण समाज में विभाजन पैदा कर रहा है, तो पहले उस सामाजिक भेदभाव को समाप्त करो, जिसने आरक्षण जैसी व्यवस्था की आवश्यकता पैदा की। लेकिन यदि वास्तविक असहजता इस बात से है कि वंचित समाज के लोग शिक्षा और अवसरों के सहारे आगे बढ़ रहे हैं, हमसे बराबरी कर रहे हैं तो समस्या आरक्षण नहीं, बल्कि जातिगत श्रेष्ठता का अहंकार है।
500 या 1000 वर्ष पहले क्या हुआ उसे अलग रखते हैं, लकिन आज की वास्तविक स्थिति को ईमानदारी से देखो फ़िर बात करेंगे। हमारा मकशद तुम्हे पीछे धकलेना कभी था ही नहीं न आज भी है बस हमें एक इंसान की तरह देखा जाना है।
- अरुण मौर्य।