Yatharth Geeta

Yatharth Geeta Yatharth Geeta GEETA IS A SACRED WRIT OF THE WHOLE OF HUMANITY. It is written by SHRI PARAMAHANS SWAMI ADGADANADNJI MAHARAJ after a long years of 5200 years.

आरक्षण ख़त्म करने की बात करते हो? ठीक है, आंदोलन करो हम भी तुम्हारा साथ देंगे।  लेकिन उससे पहले एक काम और कर लो—जाति और ...
28/07/2026

आरक्षण ख़त्म करने की बात करते हो? ठीक है, आंदोलन करो हम भी तुम्हारा साथ देंगे। लेकिन उससे पहले एक काम और कर लो—जाति और जातिवाद की मानसिकता ख़त्म करो।
हाँ वही मानसिकता, जिसमें हम पिछड़े या दलित समाज का व्यक्ति आगे बढ़ जाए तो तुम सामने उसकी पीठ थपथपा देते हो, लेकिन पीठ पीछे कहते हो —"इसके दादा-परदादा हमारे खेत जोतते थे", "इसकी दादी हमारे यहाँ मैला ढोती थी।"

तुम ख़त्म करो आरक्षण साथ देंगे तुम्हारा लेकिन आज 2026 में भी तुम लोग साथ बैठते तो हो लेकिन एक जातिगत दूरी बना कर रखते हो।

तुम लोग दलील देते हो की आरक्षण का लाभ पिछड़े और दलितों में केवल क्रीमी लेयर तक सीमित रह गया है, चलो सहमत भी हूँ। तो चलो एक काम करते हैं आओ साथ मिलकर इस समाज के गरीब व वंचितों को शिक्षित और जागरूक करते हैं उन्हें बराबरी पर लाते हैं और आरक्षण का लाभ लेने में मदद करते हैं। इसका दो फ़ायदा होगा एक तो सब बराबर हो जायेंगे और दूसरा ये की हमारे समाज के शोषण का जो दाग है तुम लोग पर वो भी मिटेगा। समतामूलक समाज की धारणा स्पष्ट होगी। फिर तो आरक्षण को नए शीरे से लागू करना आसान होगा।

हम ये भी मानते हैं की तुम्हारे समाज में भी अत्यंत गरीब लोग है जिन्हें सहायता की आवश्यकता है लेकिन वो सिर्फ गरीब हैं जिसका हल सरल है। लेकिन हमारे समाज में जो कमज़ोर हैं वो गरीब और शोषित भी। गरीबी और सामाजिक भेदभाव एक ही समस्या नहीं हैं। आर्थिक अभाव आय को प्रभावित करता है, जबकि जातिगत भेदभाव व्यक्ति की सामाजिक गरिमा, अवसरों और स्वीकार्यता को भी प्रभावित करता है।

यदि तुम्हारा मानना है कि आरक्षण समाज में विभाजन पैदा कर रहा है, तो पहले उस सामाजिक भेदभाव को समाप्त करो, जिसने आरक्षण जैसी व्यवस्था की आवश्यकता पैदा की। लेकिन यदि वास्तविक असहजता इस बात से है कि वंचित समाज के लोग शिक्षा और अवसरों के सहारे आगे बढ़ रहे हैं, हमसे बराबरी कर रहे हैं तो समस्या आरक्षण नहीं, बल्कि जातिगत श्रेष्ठता का अहंकार है।

500 या 1000 वर्ष पहले क्या हुआ उसे अलग रखते हैं, लकिन आज की वास्तविक स्थिति को ईमानदारी से देखो फ़िर बात करेंगे। हमारा मकशद तुम्हे पीछे धकलेना कभी था ही नहीं न आज भी है बस हमें एक इंसान की तरह देखा जाना है।
- अरुण मौर्य।


17/07/2026

मेंढक बोले टर्र टर्र 🐸

14/07/2026

फ्रीज़ में बाबा अमरनाथ 🕉️🛕

G D अग्रवाल इनका नाम है। ज़रा गूगल करके या जैमिनी से चैट जीपीटी से जिससे पूछना होगा पूछ लीजिएगा। ग्रेटा थनबर्ग, सोनम वां...
13/07/2026

G D अग्रवाल इनका नाम है। ज़रा गूगल करके या जैमिनी से चैट जीपीटी से जिससे पूछना होगा पूछ लीजिएगा। ग्रेटा थनबर्ग, सोनम वांगचुक जैसे तमाम लोगों से पहले ये आदमी था। जो हिंदुस्तान कहिये या यूं कहिए प्रकृति को बचाना चाहता था। और 111 दिन के अनशन के बाद इसने अपने प्राण त्याग दिए।

मुझे आज भी याद है बस एक छोटी सी ख़बर बनी। इस देश का दलाल मीडिया और उन्मादी लोग इस महान विचारक को खा गए। इनकी पढ़ाई देखिएगा ये कोई बाबा नहीं थे।

उच्च शिक्षा: उन्होंने IIT रुड़की (तब रुड़की यूनिवर्सिटी) से सिविल इंजीनियरिंग की और फिर दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित संस्थानों में से एक, कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, बर्कले से पर्यावरण इंजीनियरिंग में Ph.D. की।
अकादमिक और प्रशासनिक कद: वह IIT कानपुर में पर्यावरण इंजीनियरिंग विभाग के प्रमुख (HOD) रहे। इसके साथ ही, वह भारत के केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के पहले सदस्य सचिव (Member Secretary) भी थे।

कभी दिमाग़ फिर गया होगा तो सोचा इस देश को बचा लें। तो गंगा को बचाने के लिए अनशन पर बैठ गए।
लेकिन हमको गंगा तो बचानी नहीं थी। हम पता नहीं क्या ही बचा रहे थे? जो न ख़त्म हुआ था। न ख़त्म होगा। लेकिन हमको बचाने का ज़िम्मा दिया गया था सो सब बचा ही रहे थे। इसलिए गंगा के नाम पर धंधा हुआ कि उसको बचाना है। लेकिन बचाया नहीं गया जेबें ज़रूर भर गई।

और एक शख़्स इस दुनिया से चला गया इस देश को बचाने के लिए। हम सब मरेंगे क्योंकि हमने सही लोगों को कभी नहीं पहचाना। हम बस दलालों को सिर आंखों पर बिठाकर रखते हैं।

जिस इंसान के पास आराम, शोहरत और विदेश में बसने के तमाम रास्ते खुले थे, उसने सब कुछ छोड़कर गंगा और प्रकृति के लिए लड़ना चुना।
111 दिनों का महा-अनशन और व्यवस्था की बेरुखी। साल 2018 में, 86 वर्ष की आयु में, उन्होंने गंगा को प्रदूषण मुक्त करने, उस पर बन रहे बड़े बांधों को रुकवाने और 'गंगा महाधुत कानून' पास कराने के लिए हरिद्वार में अनशन शुरू किया।

111 दिनों तक वह केवल पानी और शहद पर रहे। एक ऐसा वैज्ञानिक, जिसने देश के विकास और पर्यावरण की नीतियों को गढ़ा था, वह घुट-घुट कर मर रहा था। मुख्यधारा की मीडिया के लिए यह कोई बड़ी खबर नहीं थी। वे धार्मिक ध्रुवीकरण, राजनीतिक नूराकुश्ती और खोखले राष्ट्रवाद को बेचने में व्यस्त थे।

जीडी अग्रवाल मर गए, वो भी विदेश में रह सकते थे लेकिन उन्होंने एक ऐसा कृतघ्न देश चुना जो उनका उपकार तक न माने, वहां उन्होंने लड़ते - लड़ते मरना चुना।

11/07/2026

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