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गिरजाबंध हनुमान मंदिर - एक अति प्राचीन मंदिर जहाँ स्त्री रूप में होती है हनुमान कि पूजाबिलासपुर से 25 कि. मी. दूर एक स्थ...
26/07/2016

गिरजाबंध हनुमान मंदिर - एक अति प्राचीन मंदिर जहाँ स्त्री रूप में होती है हनुमान कि पूजा

बिलासपुर से 25 कि. मी. दूर एक स्थान है रतनपुर। इसे महामाया नगरी भी कहते हैं। यह देवस्थान पूरे भारत में सबसे अलग है। इसकी मुख्य वजह मां महामाया देवी और गिरजाबंध में स्थित हनुमानजी का मंदिर है। खास बात यह है कि विश्व में हनुमान जी का यह अकेला ऐसा मंदिर है जहां हनुमान नारी स्वरूप में हैं। आपको सुनकर आश्चर्य लगेगा, लेकिन दुनिया में एक मंदिर ऐसा भी है जहां हनुमान पुरुष नहीं बल्कि स्त्री के वेश में नजर आते हैं। हनुमानजी के स्त्री वेश में आने की यह कथा कोई सौ दौ सौ नहीं बल्कि दस हजार साल पुरानी मानी जाती है। इस दरबार से कोई निराश नहीं लौटता। भक्तों की मनोकामना अवश्य पूरी होती है।

राजा को सपने में दिया मंदिर निर्माण का आदेश
रतनपुर के राजा पृथ्वी देवजू ने सपने में देखा कि संकटमोचन हनुमान जी उनके सामने हैं, भेष देवी सा है, पर देवी है नहीं, लंगूर हैं पर पूंछ नहीं जिनके एक हाथ में लड्डू से भरी थाली है तो दूसरे हाथ में राम मुद्रा अंकित है। कानों में भव्य कुंडल हैं। माथे पर सुंदर मुकुट माला। अष्ट सिंगार से युक्त हनुमान जी की दिव्य मंगलमयी मूर्ति ने राजा से एक बात कही। हनुमानजी ने राजा से कहा कि हे राजन मैं तेरी भक्ति से प्रसन्न हूं। तुम्हारा कष्ट अवश्य दूर होगा। तू मंदिर का निर्माण करवा कर उसमें मुझे बैठा। मंदिर के पीछे तालाब खुदवाकर उसमें स्नान कर और मेरी विधिवत् पूजा कर। इससे तुम्हारे शरीर में हुए कोढ़
का नाश हो जाएगा। एक रात स्वप्न में फिर हनुमान जी आए और कहा मां महामाया के कुण्ड में मेरी मूर्ति रखी हुई है। तू कुण्ड से उसी मूर्ति को यहां लाकर मंदिर में स्थापित करवा। तब राजा को मूर्ति को तालाब से निकालकर स्थापना करवाई। इस दरबार से कोई निराश नहीं लौटता। भक्तों की मनोकामना अवश्य पूरी होती है।
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सभी को अपनाने चाहिए प्रभु श्रीराम के ये 5 गुण - सहनशील व धैर्यवानसहनशीलता व धैर्य भगवान राम का एक और गुण है। कैकेयी की आ...
22/07/2016

सभी को अपनाने चाहिए प्रभु श्रीराम के ये 5 गुण -

सहनशील व धैर्यवान
सहनशीलता व धैर्य भगवान राम का एक और गुण है। कैकेयी की आज्ञा से वन में 14 वर्ष बिताना, समुद्र पर सेतु बनाने के लिए तपस्या करना, सीता को त्यागने के बाद राजा होते हुए भी संन्यासी की भांति जीवन बिताना उनकी सहनशीलता की पराकाष्ठा है।

दयालु व बेहतर स्वामी
भगवान राम ने दया कर सभी को अपनी छत्रछाया में लिया। उनकी सेना में पशु, मानव व दानव सभी थे और उन्होंने सभी को आगे बढ़ने का मौका दिया। सुग्रीव को राज्य, हनुमान, जाम्बवंत व नल-नील को भी उन्होंने समय-समय पर नेतृत्व करने का अधिकार दिया।

बेहतर प्रबंधक
भगवान राम न केवल कुशल प्रबंधक थे, बल्कि सभी को साथ लेकर चलने वाले थे। वे सभी को विकास का अवसर देते थे व उपलब्ध संसाधनों का बेहतर उपयोग करते थे। उनके इसी गुण की वजह से लंका जाने के लिए उन्होंने व उनकी सेना ने पत्थरों का सेतु बना लिया था। सही भी है, किसी के गुण व कर्म ही उसकी पहचान बनाते हैं।

दोस्ती का रिश्ता
केवट हो या सुग्रीव, निषादराज या विभीषण। हर जाति, हर वर्ग के मित्रों के साथ भगवान राम ने दिल से करीबी रिश्ता निभाया। दोस्तों के लिए भी उन्होंने स्वयं कई संकट झेले। श्रीराम के इन्हीं गुणों के कारण उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम राम के नाम से पूजा जाता है।

त्याग और समर्पण का भाव
भगवान राम के तीन भाई लक्ष्मण, भरत व शत्रुघ्न सौतेली मां के पुत्र थे, लेकिन उन्होंने सभी भाइयों के प्रति सगे भाई से बढ़कर त्याग और समर्पण का भाव रखा और स्नेह दिया। यही वजह थी कि भगवान राम के वनवास के समय लक्ष्मण उनके साथ वन गए और राम की अनुपस्थिति में राजपाट मिलने के बावजूद भरत ने भगवान राम के मूल्यों को ध्यान में रखकर सिंहासन पर रामजी की चरण पादुका रख जनता को न्याय दिलाया।
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इस मंदिर की रखवाली करता है शाकाहारी मगर, विचित्रता से भरा हुआ मंदिर। www.bhaktionline.in Bhakti Online - Mitaye Mandir T...
20/07/2016

इस मंदिर की रखवाली करता है शाकाहारी मगर, विचित्रता से भरा हुआ मंदिर। www.bhaktionline.in Bhakti Online - Mitaye Mandir Tak Ki Doori

भारत एक विशाल देश है, और यहां हर धर्म, संस्कृति को मानने वाले लोग रहते हैं। मंदिरों के इस देश में लोग भगवान से प्रार्थना करने के लिए मंदिर जाते हैं और अपनी मनोकामना पुरी करते हैं। ठीक इसी तरह है केरल का अनंतपुर मंदिर जहां लोग अपनी मनोकमाना पुर्ण करने के लिए जाते हैं।

पर यह मंदिर अनोखा है और रहस्य से भरा हुआ है यहां पर एक मान्यता है जो बहुत विचित्र हैं जिनके बारे में जानकर आप चौंक जाएंगे। ऐसी ही एक मान्यता की जानकारी आज हम आपको दे रहे हैं…

*अनोखी है मान्यता

अनंतपुर मंदिर जो कि केरल में हैं, यह मंदिर झील पर बना हुआ है। इस मंदिर की बहुत ही विचित्र मान्यता है कि इस मंदिर की रखवाली एक मगरमच्छ करता है। ‘बबिआ’ नाम के मगरमच्छ से प्रसिद्ध इस मंदिर में यह भी मान्यता है कि जब इस झील में एक मगरमच्छ की मृत्यु होती है तो रहस्यमयी ढंग से दूसरा मगरमच्छ प्रकट हो जाता है। यह मंदिर भगवान विष्णु (भगवान अनंत-पद्मनाभस्वामी) का है। माना जाता है कि झील में रहने वाला यह मगरमच्छ पूरी तरह शाकाहारी है और पुजारी इसके मुंह में प्रसाद डालकर इसका पेट भरते हैं।

*मंदिर के पुजारियों के हाथ से खाता है यह ‘शाकाहारी मगरमच्छ’

स्थानीय लोगों का कहना है कि कितनी भी ज्यादा या कम बारिश होने पर झील के पानी का स्तर हमेशा एक-सा रहता है। यह मगरमच्छ अनंतपुर मंदिर की झील में करीब 60 सालों से रह रहा है। भगवान की पूजा के बाद भक्तों द्वारा चढ़ाया गया प्रसाद बबिआ को खिलाया जाता है। प्रसाद खिलाने की अनुमति सिर्फ मंदिर प्रबंधन के लोगों को है।

हाथ से प्रसाद खाता है यह ‘शाकाहारी मगरमच्छ’

मान्यता है कि यह मगरमच्छ पूरी तरह शाकाहारी है और प्रसाद इसके मुंह में डालकर खिलाया जाता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि मगरमच्छ शाकाहारी है और वह झील के अन्य जीवों को नुकसान नहीं पहुंचाता। अधिक जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करे https://www.facebook.com/bhaktionline.in

जानिए हिन्दू धर्म को www.bhaktionline.in Bhakti Online - Mitaye Mandir Tak Ki Dooriहिन्दू धर्म भारत का प्रमुख धर्म है। ह...
13/07/2016

जानिए हिन्दू धर्म को www.bhaktionline.in Bhakti Online - Mitaye Mandir Tak Ki Doori

हिन्दू धर्म भारत का प्रमुख धर्म है। हिन्दू या सनातन धर्म 4000 साल से भी पुराना माना जाता है। मान्यता है कि हिन्दू धर्म प्राचीन आर्य समाज के वेदों पर चलता हुआ विकसित हुआ है। इस धर्म को किसी व्यक्ति विशेष ने नहीं बल्कि समय ने बनाया और फैलाया है।

हिन्दू धर्म का इतिहास

हिन्दू धर्म का उदय कब और कैसे हुआ इसकी सटीक जानकारी किसी को नहीं है। मान्यता है कि वेदों का अनुसरण करते हुए आर्यों ने ही हिन्दू धर्म को उसकी पहचान दिलाई। हिन्दू धर्म के पुरातन लेखों और तथ्यों से जाहिर होता है कि हिन्दू धर्म बेहद विकसित और समृद्ध था। सिंधु घाटी सभ्यता और अन्य कई पुरातन अध्ययनों से यह जाहिर हुआ है कि हिन्दू धर्म का उदय बेहद प्राचीन है।

वेदों पर आधारित धर्म

विश्व की प्रथम पुस्तक "वेदों " को माना गया है। वेदों के अस्तित्व को पूरे विश्व में मान्यता प्राप्त हैं। वेदों में सबसे प्राचीन "ऋग्वेद" को माना गया है। कई जानकार मानते हैं कि वेदों में लिखे नियमों और बातों का अनुसरन करके ही हिन्दू धर्म ने अपने नियम और मानदंड स्थापित किए हैं।

हिन्दू धर्म के इतिहास की मुख्य बातें

भाषा: मान्यता है कि प्राचीन हिन्दू धर्म की मुख्य भाषा संस्कृत थी।
समाज: प्राचीन हिन्दू समाज में राजा और प्रजा के रूप में विभाजित थी, जहां राजा प्रजा को संचालित करता था।
देव: वेदों की मान्यतानुसार सनातन धर्म के मुख्य देव इन्द्र, वरुण, अग्नि और वायु देव हैं।
तीन मुख्य संप्रदाय: सनातन हिन्दू धर्म मुख्यत: तीन संप्रदायों में बंटा था एक शैव जो शिव की पूजा करते थे। दूसरा वैष्णव जो विष्णुजी को अपना आराध्य मानते थे। और तीसरे शक्ति के उपासक थे।
श्री आदि शंकराचार्य द्वारा धर्म की पुन: स्थापना: मान्यता है कि विभिन्न संप्रदायों में बंट जाने से जब सनातन धर्म कमजोर होने लगा तो आदि शंकराचार्य ने पूरे भारत का भ्रमण कर पुन: धर्म की स्थापना कर लोगों को जोड़ने का काम किया।
अन्य संस्कृतियां: मान्यता है कि बौद्ध और जैन धर्म भी सनातन हिन्दू धर्म का ही एक अंग है। अधिक जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करे https://www.facebook.com/bhaktionline.in

www.bhaktionline.in Bhakti Online - Mitaye Mandir Tak Ki Doori श्री हनुमान मंदिर की महिमा जिस प्रकार काशी भगवान शिव के त...
12/07/2016

www.bhaktionline.in Bhakti Online - Mitaye Mandir Tak Ki Doori श्री हनुमान मंदिर की महिमा जिस प्रकार काशी भगवान शिव के त्रिशूल पर टिकी मानी जाती है लगभग वही स्थित परम बलशाली रघुकुलनंदन प्रिय बजरंगबली की कनाट प्लेस स्थित मंदिर की है। ऐसा प्रतीत होता है कि दिल्ली के हृदयस्थल में विराजमान हनुमानजी तमाम संकटों, दुखों से इस शहर को बचाए हुए हैं। दिल्ली के इतिहासिक और सर्वाधिक प्राचीन मंदिरों में बाबा खड़क सिंह मार्ग पर स्थित भगवान हनुमानजी भवसागर से उद्धार करने के एकमात्र साधन और शरणागत के प्रतिपालक हैं। इनका अनुपम प्रभाव लोकविख्यात है। इनकी शरीर क्रांति प्रतप्त सुवर्ण की सी है। करूणारस समूह से जिनके लोचनकोर भरे हुए हैं।इनकी महिमा मनोहारिणी है, ये स्मरणमात्र से ही भक्तों पर दया करने वाले हैं। अंजना के सौभाग्य और जीवनदान देने वाले कनाट प्लेस वाले हनुमानजी की शरण में जो भी भक्त श्रद्धा के साथ आता है वो भवसागर के संकटों से पार हो जाता है। अधिक जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करे https://www.facebook.com/bhaktionline.in

जब भगवान शिव की हुई जलती लकड़ी से पिटाई www.bhaktionline.in Bhakti Online - Mitaye Mandir Tak Ki Dooriदेवों में देव महाद...
11/07/2016

जब भगवान शिव की हुई जलती लकड़ी से पिटाई www.bhaktionline.in Bhakti Online - Mitaye Mandir Tak Ki Doori

देवों में देव महादेव की कोई जलती लकड़ी से पिटाई करे ऐसा कोई सोच भी नहीं सकता लेकिन, यह बात बिल्कुल सच है। बात कुछ 1360 ई. के आस-पास की है। उन दिनों बिहार के विस्फी गांव में एक कवि हुआ करते थे। कवि का नाम विद्यापति था। कवि होने के साथ-साथ विद्यापति भगवान शिव के अनन्य भक्त भी थे। इनकी भक्ति और रचनाओं से प्रसन्न होकर भगवान शिव को इनके घर नौकर बनकर रहने की इच्छा हुई।
भगवान शिव एक दिन एक जाहिल गंवार का वेष बनाकर विद्यापति के घर आ गये। विद्यापति को शिव जी ने अपना नाम उगना बताया। विद्यापति की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी अतः उन्होंने उगना को नौकरी पर रखने से मना कर दिया। लेकिन शिव जी मानने वाले कहां थे। सिर्फ दो वक्त के भोजन पर नौकरी करने के लिए तैयार हो गये। इस पर विद्यापति की पत्नी ने विद्यापति से उगना को नौकरी पर रखने के लिए कहा। पत्नी की बात मानकर विद्यापति ने उगना को नौकरी पर रख लिया।

एक दिन उगना विद्यापति के साथ राजा के दरबार में जा रहे थे। तेज गर्मी के वजह से विद्यापति का गला सूखने लगा। लेकिन आस-पास जल का कोई स्रोत नहीं था। विद्यापति ने उगना से कहा कि कहीं से जल का प्रबंध करो अन्यथा मैं प्यासा ही मर जाऊंगा। भगवान शिव कुछ दूर जाकर अपनी जटा खोलकर एक लोटा गंगा जल भर लाए।

विद्यापति ने जब जल पिया तो उन्हें गंगा जल का स्वाद लगा और वह आश्चर्य चकित हो उठे कि इस वन में जहां कहीं जल का स्रोत तक नहीं दिखता यह जल कहां से आया। वह भी ऐसा जल जिसका स्वाद गंगा जल के जैसा है। कवि विद्यापति उगना पर संदेह हो गया कि यह कोई सामान्य व्यक्ति नहीं बल्कि स्वयं भगवान शिव हैं अतः उगना से उसका वास्तविक परिचय जानने के लिए जिद करने लगे।

जब विद्यापति ने उगना को शिव कहकर उनके चरण पकड़ लिये तब उगना को अपने वास्तविक स्वरूप में आना पड़ा। उगना के स्थान पर स्वयं भगवान शिव प्रकट हो गये। शिव ने विद्यापति से कहा कि मैं तुम्हारे साथ उगना बनकर रहना चाहता हूं लेकिन इस बात को कभी किसी से मेरा वास्तविक परिचय मत बताना।

विद्यापति को बिना मांगे संसार के ईश्वर का सानिध्य मिल चुका था। इन्होंने शिव की शर्त को मान लिया। लेकिन एक दिन विद्यापति की पत्नी सुशीला ने उगना को कोई काम दिया। उगना उस काम को ठीक से नहीं समझा और गलती कर बैठा। सुशीला इससे नाराज हो गयी और चूल्हे से जलती लकड़ी निकालकर लगी शिव जी की पिटाई करने। विद्यापति ने जब यह दृश्य देख तो अनायास ही उनके मुंह से निकल पड़ा 'ये साक्षात भगवान शिव हैं, इन्हें जलती लकड़ी से मार रही हो।' फिर क्या था, विद्यापति के मुंह से यह शब्द निकलते ही शिव वहां से अर्न्तध्यान हो गये।

इसके बाद तो विद्यापति पागलों की भांति उगना -उगना कहते हुए वनों में, खेतों में हर जगह उगना बने शिव को ढूंढने लगे। भक्त की ऐसी दशा देखकर शिव को दया आ गयी। भगवान शिव उगना के सामने प्रकट हो गये और कहा कि अब मैं तुम्हारे साथ नहीं रह सकता। उगना रूप में मैं जो तुम्हारे साथ रहा उसके प्रतीक चिन्ह के रूप में अब मैं शिव लिंग के रूप विराजमान रहूंगा। इसके बाद शिव अपने लोक लौट गये और उस स्थान पर शिव लिंग प्रकट हो गया। उगना महादेव का प्रसिद्घ मंदिर वर्तमान में मधुबनी जिला में भवानीपुर गांव में स्थित है। अधिक जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करे https://www.facebook.com/bhaktionline.in

शिव का धाम कैलाश मानसरोवर जहाँ की यात्रा प्रदान करती है मोक्ष...www.bhaktionline.in Bhakti Online - Mitaye Mandir Tak Ki...
06/07/2016

शिव का धाम कैलाश मानसरोवर जहाँ की यात्रा प्रदान करती है मोक्ष...www.bhaktionline.in Bhakti Online - Mitaye Mandir Tak Ki Doori

धर्मयात्रा में इस बार हम आपको दर्शन करा रहे हैं कैलाश मानसरोवर के। मानसरोवर वही पवित्र जगह है, जिसे शिव का धाम माना जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार मानसरोवर के पास स्थित कैलाश पर्वत पर शिव-शंभु का धाम है। यही वह पावन जगह है, जहाँ शिव-शंभु विराजते हैं।

कैलाश पर्वत, 22,028 फीट ऊँचा एक पत्थर का पिरामिड, जिस पर सालभर बर्फ की सफेद चादर लिपटी रहती है। हर साल कैलाश-मानसरोवर की यात्रा करने, शिव-शंभु की आराधना करने, हजारों साधु-संत, श्रद्धालु, दार्शनिक यहाँ एकत्रित होते हैं, जिससे इस स्थान की पवित्रता और महत्ता काफी बढ़ जाती है।

मान्यता है कि यह पर्वत स्वयंभू है। कैलाश-मानसरोवर उतना ही प्राचीन है, जितनी प्राचीन हमारी सृष्टि है। इस अलौकिक जगह पर प्रकाश तरंगों और ध्वनि तरंगों का समागम होता है, जो ‘ॐ’ की प्रतिध्वनि करता है। इस पावन स्थल को भारतीय दर्शन के हृदय की उपमा दी जाती है, जिसमें भारतीय सभ्यता की झलक प्रतिबिंबित होती है। कैलाश पर्वत की तलछटी में कल्पवृक्ष लगा हुआ है। कैलाश पर्वत के दक्षिण भाग को नीलम, पूर्व भाग को क्रिस्टल, पश्चिम को रूबी और उत्तर को स्वर्ण रूप में माना जाता है।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार यह जगह कुबेर की नगरी है। यहीं से महाविष्णु के करकमलों से निकलकर गंगा कैलाश पर्वत की चोटी पर गिरती है, जहाँ प्रभु शिव उन्हें अपनी जटाओं में भर धरती में निर्मल धारा के रूप में प्रवाहित करते हैं।

यह स्थान बौद्ध धर्मावलंबियों के सभी तीर्थ स्थानों में सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। कैलाश पर स्थित बुद्ध भगवान के अलौकिक रूप ‘डेमचौक’ बौद्ध धर्मावलंबियों के लिए पूजनीय है। वह बुद्ध के इस रूप को ‘धर्मपाल’ की संज्ञा भी देते हैं। बौद्ध धर्मावलंबियों का मानना है कि इस स्थान पर आकर उन्हें निर्वाण की प्राप्ति होती है। वहीं जैन धर्म के पहले तीर्थंकर ने भी यहीं निर्वाण लिया। कुछ लोगों का मानना यह भी है कि गुरु नानक ने भी यहाँ ध्यान किया था।

मानसरोवर झील से घिरा होना कैलाश पर्वत की धार्मिक महत्ता को और अधिक बढ़ाता है। प्राचीनकाल से विभिन्न धर्मों के लिए इस स्थान का विशेष महत्व है। इस स्थान से जुड़े विभिन्न मत और लोककथाएँ केवल एक ही सत्य को प्रदर्शित करती हैं, जो है सभी धर्मों की एकता।

मानसरोवर दर्शन : ऐसा माना जाता है कि महाराज मानधाता ने मानसरोवर झील की खोज की और कई वर्षों तक इसके किनारे तपस्या की थी, जो कि इन पर्वतों की तलहटी में स्थित है। बौद्ध धर्मावलंबियों का मानना है कि इसके केंद्र में एक वृक्ष है, जिसके फलों के चिकित्सकीय गुण सभी प्रकार के शारीरिक व मानसिक रोगों का उपचार करने में सक्षम हैं। अधिक जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करे https://www.facebook.com/bhaktionline.in

हनुमान उपासना के उपाय एवं मंत्र www.bhaktionline.in Bhakti Online - Mitaye Mandir Tak Ki Dooriभगवान रामभक्त हनुमान की उप...
05/07/2016

हनुमान उपासना के उपाय एवं मंत्र www.bhaktionline.in Bhakti Online - Mitaye Mandir Tak Ki Doori

भगवान रामभक्त हनुमान की उपासना से जीवन के सारे कष्ट, संकट मिट जाते है। माना जाता है कि हनुमान एक ऐसे देवता है जो थोड़ी-सी प्रार्थना और पूजा से ही शीघ्र प्रसन्न हो जाते है। जहां मंगलवार और शनिवार का दिन इनके पूजन के लिए सर्वश्रेष्ठ हैं।

अगर आप अपनी परेशानियों से निजात पाना चाहते हैं तो आप निम्न मंत्र और उपाय आजमाएं। शीघ्र ही आपके सारे कष्ट दूर होकर आपको सुख की अनुभूति होगी।

* ॐ हं हनुमंतये नम: मंत्र का जप करें।

* हं हनुमते रुद्रात्मकाय हुं फट् का रुद्राक्ष की माला से जप करें।

* संकट कटै मिटै सब पीरा, जो सुमिरै हनुमत बलबीरा।

* राम-राम नाम मंत्र का 108 बार जप करें।

* हनुमान को नारियल, धूप, दीप, सिंदूर अर्पित‍ करें।

* हनुमान अष्टमी के दिन हनुमान चालीसा का पाठ करें।

* राम रक्षा स्त्रोत, बजरंगबाण, हनुमान अष्टक का पाठ करें।

* हनुमान आरती, हनुमत स्तवन, राम वन्दना, राम स्तुति, संकटमोचन हनुमानाष्टक का पाठ करें।

* ‍परिवार सहित मंदिर में जाकर मंगलकारी सुंदरकांड पाठ करें।

* हनुमान को चमेली का तेल, सिंदूर का चोला चढ़ाएं।

* गुड-चने और आटे से निर्मित प्रसाद वितरित करें।

* श्रद्धानुसार भंडारे का आयोजन कराएं।

मंगलवार और शनिवार के दिन हनुमान म‍ंदिर में जाकर रामभक्त हनुमान का गुणगान करें और उनसे अपने पापों के लिए क्षमायाचना करें। अधिक जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करे https://www.facebook.com/bhaktionline.in

by www.bhaktionline.in जानिए गौमूत्र छिड़कने से कौन-कौन से लाभ प्राप्त होते हैं!  घर में सुख और समृद्धि बनी रहे इसके लिए...
04/07/2016

by www.bhaktionline.in जानिए गौमूत्र छिड़कने से कौन-कौन से लाभ प्राप्त होते हैं!
घर में सुख और समृद्धि बनी रहे इसके लिए पुराने समय से कई परंपराएं प्रचलित हैं। इन परंपराओं का पालन जिन घरों में किया जाता है, वहां का वातावरण सकारात्मक और पवित्र बना रहता है। प्राचीन समय में हर रोज घर में गौमूत्र का छिड़काव किया जाता था। ऐसा करने पर घर का वातावरण शुभ और पवित्र बना रहता है। आज भी इस परंपरा का पालन कई लोग करते हैं। यहां जानिए गौमूत्र छिड़कने से कौन-कौन से लाभ प्राप्त होते हैं...

गाय को पवित्र और पूजनीय माना गया है। ऐसी मान्यता है कि गाय के शरीर में सभी देवी-देवताओं का वास होता है। इस कारण कभी भी गाय का अनादर नहीं करना चाहिए। जो लोग गाय की सेवा करते हैं, उन्हें सभी देवी-देवताओं की कृपा प्राप्त होती है और पुण्य की बढ़ोतरी होती है। पुराने समय में तो अधिकांश लोग अपने-अपने घर में ही गाय को पालते थे, लेकिन आज काफी कम लोगों के घर में गाय होती है। जिन लोगों के यहां गाय नहीं है, वे नियमित रूप से किसी गौशाला में हरी घास का दान कर सकते हैं या अपनी इच्छा के अनुसार धन का दान कर सकते हैं। इस सेवा से भी गौमाता की कृपा प्राप्त होती है। गौसेवा का महत्व इस बात से भी प्रकट होता है कि स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने भी गौमाता की सेवा की है।

गौमूत्र से दूर होते हैं कई दोष
यदि हम नियमित रूप से गौमूत्र का छिड़काव करते हैं तो घर के वास्तु दोष कम हो सकते हैं। वास्तु दोष के कारण आ रही परेशानियां कम हो सकती हैं। यदि घर के आसपास कोई नकारात्मक ऊर्जा सक्रिय होगी तो वह भी निष्क्रिय हो सकती है।
गौमूत्र की गंध से नष्ट होते हैं हानिकारक सूक्ष्म कीटाणु
घर के वातावरण में मौजूद कई प्रकार के हानिकारक सूक्ष्म कीटाणु गौमूत्र के प्रभाव से नष्ट हो जाते हैं। इससे परिवार के सदस्यों को स्वास्थ्य संबंधी लाभ प्राप्त होता है।

गौमूत्र के सेवन से दूर होते हैं कई रोग
आयुर्वेद के अनुसार गौमूत्र का नियमित सेवन कई बीमारियों को खत्म कर सकता है। बहुत सी बीमारियों में दवा के रूप में इसका उपयोग किया जाता है। जो लोग नियमित रूप से थोड़े से गौमूत्र का भी सेवन करते हैं, उनकी रोगप्रतिरोधी क्षमता बढ़ती है। मौसम परिवर्तन के समय होने वाली कई बीमारियां दूर ही रहती हैं। शरीर स्वस्थ और ऊर्जावान बना रहता है।

घर में गौमूत्र छिड़कने से मिलती है लक्ष्मी कृपा

जिस घर में प्रतिदिन गौमूत्र का छिड़का जाता है, वहां देवी लक्ष्मी की विशेष कृपा बरसती है। जिससे घर में धन-धान्य की कमी नहीं आती है। अधिक जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करे https://www.facebook.com/bhaktionline.in

केदारनाथ मंदिर का अस्तित्व पहले भी था क्योंकि स्वयं भगवान शिव ने भी यहां तप किया था। केदारनाथ के बारे में अधिक हाल की कि...
30/06/2016

केदारनाथ मंदिर का अस्तित्व पहले भी था क्योंकि स्वयं भगवान शिव ने भी यहां तप किया था। केदारनाथ के बारे में अधिक हाल की किंबदन्ती पांडवों से संबंधित है जो महाकाव्य महाभारत के नायक थे तथा भगवान शिव जो रूद्रप्रयाग तथा चमोली जिलों के इर्द-गिर्द संपूर्ण केदारनाथ क्षेत्र के सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन को प्रभावित करता है।

यह समय महाभारत का उत्तरकाल है। पांडव विजयी हुए हैं, पर वे सगे संबंधियों से युद्ध कर उदास हैं इसलिए अपने भाईयों को मारने के पाप से मुक्ति पाने के लिए वे ऋषि वेदव्यास के पास जाते है। व्यास उन्हें भगवान शिव के पास भेजते हैं क्योंकि केवल वे ही क्षमा दान दे सकते हैं और केदारेश्वर के बिना मुक्ति या छुटकारा पाना संभव नहीं है। इसलिए पांडव शिव की खोज करते है। भावु शिव उन्हें क्षमा करने को तैयार नहीं हैं पर चूंकि वे ना भी नहीं कह सकते इसलिए भागे फिर रहे है और उनके सामने आना नहीं चाहते।

परंतु पांडवों को उन्हें ढूंढना ही था और इस प्रकार वे उनके पीछे-पीछे चलते रहे। शिव आगे-आगे और पांडव उनके पीछे-पीछे यत्र, तत्र, सर्वत्र चलते रहे। जब भगवान शिव काशी पहुंचे तो पांडवों ने उन्हें देख लिया और फिर शिव विलीन होकर गुप्तकाशी में प्रकट हुए। इस प्रकार गढ़वाल हिमालय में इस जगह का नाम ऐसा पड़ा तथा कुछ समय तक भगवान शिव इस निर्जनता में वेश बदलकर खुशी-खुशी रहे। परंतु कुछ समय बाद ही पांडवों को उनका सुराग मिल गया और फिर महाभाग-दौड़ शुरू हुआ।

अंत में भगवान शिव केदार घाटी पहुंच गये। जो एक चालाक विकल्प नहीं हो सकता था क्योंकि इसके और आगे कोई रास्ता नहीं था और केवल बर्फीली चोटियां क्षेत्र उनके लिए बाधा नहीं हो सकते थे। संभवतः उन्होंने तय कर लिया था कि पांडवों की काफी परीक्षा हो चुकी है।

केदारघाटी में प्रवेश एवं बाहर आने का एक ही रास्ता है, पांडवों को भान हुआ कि वे भगवान शिव के पहुंच के करीब हैं। पर शिव ने अभी भी सोचा या ऐसा बहाना किया कि वे खेल जारी रखना चाहते हैं। चूंकि उच्च पर्वतों पर कई चारागाह थे इसलिए शिव बैल का रूप धारण मवेशियों के साथ मिल गये ताकि उन्हें पहचाना नहीं जाय और इस प्रकार पांडवों के लिए यह इतना निकट पर कितने दूर साबित हो।

इतनी दूर आने के बाद पांडव इसे छोड़ देने को तैयार नहीं थे। निश्चित ही नहीं। शीघ्र ही उन्होंने भगवान शिव को फंसाने की कार्य योजना बनायी। भीम अपनी काया को विशाल बनाकर प्रवेश द्वार पर खड़े हो गये जिससे घाटी का रास्ता अवरूद्ध हो गया। पांडवों के अन्य भाईयों ने मवेशियों को हांकना शुरू किया। विचार यह था कि मवेशी तो भीम के फैले पैर के बीच से निकल जांयेंगे पर भगवान होने के नाते शिव ऐसा नहीं करेंगे और उन्हें जानकर वे पकड़ लेगें। भगवान शिव ने इस योजना को भांप लिया तथा अंतिम प्रयास के रूप में उन्होंने अपना सिर पृथ्वी में घुसा दिया। विशाल भीम को इसका भान हुआ तथा वे शीघ्र उस जगह पहुंचे। तब तक बैल कमर तक पृथ्वी में समा चुका था और केवल दोनों पीछे के पैर और पूछ ही जमीन के ऊपर थी। भीम ने पूछ पकड़ ली और उसे जाने नहीं दिया। उस क्षण शिव मान गये। वे अपने मूल रूप मे आकर पांडवों के समक्ष प्रकट हुए तथा उन्हें अपने सगे-संबंधियों की गोत्र हत्या से मुक्ति दे दी। जमीन के ऊपर बैल के पिछले भाग की पूजा करने उनके साथ वे भी शामिल हो गये और इस प्रकार वे केदारनाथ के प्रथम पूजक बने और उन्होंने ही केदारनाथ का मूल मंदिर बनवाया जिसके बाद मानव-भक्तों ने इसे बनवाया।

पृथ्वी के अंदर का धसा भाग विभिन्न जगहों पर फिर प्रकट हुआ जो नेपाल में पशुपतिनाथ तथा गढ़वाल के कपलेश्वर या कल्पनाथ में बाल, रूद्रनाथ में चेहरा (मुंह) तुंगनाथ में छाती तथा वाहे एवं मध-माहेश्वर में मध्य भाग या नाभि-क्षेत्र है और इसलिए इन जगहों पर शिव के लिंग की पूजा नहीं होती है उनके अन्य अंगों की पूजा होती है।

गढ़वाल में इन पांच स्थलों को पंच केदार कहा जाता है। माना जाता है कि जो भी तीर्थयात्री इन पांच मंदिरों में पूजा कर लेता है उसके जीवन भर के पाप धुल जाते हैं।

मम क्षेत्राणी पंचेवा भक्तिप्रीतिकारिणी वै

केदारम मध्यम तुंग थाता रूद्रालयम प्रियम

कल्पकम चा महादेवी सर्वपाप प्रनाशममं

कथितं ते महाभागे केदारेश्वर मंडलम

मेरे मात्र पांच स्थल हैं जो शिष्यों में प्रेम लाते हैं वे केदारनाथ, मध्यम (मधमाहेश्वर) तुंग (तुंगनाथ) रूद्रालय (रूद्रनाथ) तथा कल्पकार (कल्पेश्वर) हैं। हे महादेवी, ये सभी पाप धो डालते हैं। www.bhaktionline.in Bhakti Online - Mitaye Mandir Tak Ki Doori

भागीरथ और गंगा का धरती पर आगमन!! www.bhaktionline.in Bhakti Online - Mitaye Mandir Tak Ki Doori सूर्यवंशी राजा दिलीप के ...
29/06/2016

भागीरथ और गंगा का धरती पर आगमन!! www.bhaktionline.in Bhakti Online - Mitaye Mandir Tak Ki Doori

सूर्यवंशी राजा दिलीप के पुत्र भागीरथ हिमालय पर तपस्या कर रहे थे । वे गंगा को धरती पर लाना चाहते थे । उनके पूर्वज कपिल मुनि के शाप से भस्म हो गये । गंगा ही उनका उद्वार कर सकती थी । भागीरथ अन्न जल छोड़कर तपस्या कर रहे थे ।

गंगा उनकी कठोर तपस्या से प्रसन्न हो गई । भागीरथ ने धीरे स्वर में गंगा की आवाज सुनी । महाराज मैं आपकी इच्छानुसार धरती पर आने के लिये तैयार हूँ, लेकिन मेरी तेज धारा को धरती पर रोकेगा कौन । अगर वह रोकी न गई तो धरती के स्तरों को तोड़ती हुई पाताल लोक में चली जायेगी ।

भागीरथ ने उपाय पूछा तो गंगा ने कहा, महाराज भागीरथ, मेरी प्रचन्ड धारा को सिर्फ शिव रोक सकते है । यदि वे अपने सिर पर मेरी धारा को रोकने के लिये मान जाये तो मैं पृथ्वी पर आ सकती हूँ ।

भागीरथ शिव की अराधना में लग गये । तपस्या से प्रसन्न हुए शिव गंगा की धारा को सिर पर रोकने के लिये तैयार हो गये ।

ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष के दशहरे के दिन जटा खोलकर, कमर पर हाथ रख कर खड़े हुए शिव अपलक नेत्रों से ऊपर आकाश की ओर देखने लगे । गंगा की धार हर हर करती हुई स्वर्ग से शिव के मस्तक पर गिरने लगी । जल की एक भी बूँद पृथ्वी पर नहीं गिर रही थी । सारा पानी जटाओं में समा रहा था ।

भागीरथ के प्रार्थना करने पर शिव ने एक जटा निचोड़ कर गंगा के जल को धरती पर गिराया । शिव की जटाओं से निकलने के कारण गंगा का नाम जटाशंकरी पड़ गया ।

गंगा के मार्ग में जहृु ऋषि की कुटिया आयी तो धारा ने उसे बहा दिया । क्रोधित हुए मुनि ने योग शक्ति से धारा को रोक दिया । भागीरथ ने प्रार्थना की तो ऋषि ने गंगा को मुक्त कर दिया । अब गंगा का नाम जाहृनवी हो गया ।

कपिल मुनि के आश्रम में पहुँचकर गंगा ने भागीरथ के महाराज सगर आदि पूर्वजों का उद्वार किया । वहाँ से गंगा बंगाल की खाड़ी में समाविष्ट हुई, उसे आज गंगासागर कहते है ।

अतः ये कहानी हमें ये सीखाती है की सच्चे मन, लगन और एक लक्ष्य के साथ किया गया कार्य हर बाधाओं को तोड़कर सफल होता है एवं हमें हमेशा आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता है । अधिक जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करे https://www.facebook.com/bhaktionline.in

ॐ हनुमते नमः। ॐ वायु पुत्राय नमः।ॐ रुद्राय नमः।ॐ अजराय नमः।ॐ अमृत्यवे नमः।ॐ वीरवीराय नमः।ॐ वीराय नमः।ॐ निधिपतये नमः।ॐ वर...
28/06/2016

ॐ हनुमते नमः।
ॐ वायु पुत्राय नमः।
ॐ रुद्राय नमः।
ॐ अजराय नमः।
ॐ अमृत्यवे नमः।
ॐ वीरवीराय नमः।
ॐ वीराय नमः।
ॐ निधिपतये नमः।
ॐ वरदाय नमः।
ॐ निरामयाय नमः।
ॐ आरोग्यकर्त्रे नमः।
श्री हनुमान जी को गंध, फूल, सिंदूर, नारियल, गुड़-चने, धूप, दीप से पूजा कर इन मंत्रों का यथाशक्ति जप करें।इससे हनुमान जी की अद्भुत कृपा प्राप्त होती है जीवन के सारे कष्ट दूर हो जाते है।
सुप्रभात।
आज का दिन मंगलमय हो।
जय बजरंगबली।
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