24/10/2025
मोदी ने झूठ से किया आगाज़-
प्रधानमंत्री मोदी ने बिहार चुनाव का बिगुल झूठ बोलकर फूंका है।
वे कर्पूरी ठाकुर का गुणगान कर रहे हैं, लेकिन उनके और उनकी पार्टी के विचार न केवल कर्पूरी विरोधी थे, बल्कि वे उन्हें ग़ालियाँ तक देते थे।
कर्पूरी ठाकुर को उन्होंने अछूत और जातिसूचक शब्दों से संबोधित करके अपमानित किया था। कर्पूरी जाति से नाई था, अति पिछड़ा थे।
आज मोदी कर्पूरी ठाकुर के नाम पर पिछडों, दलितों को बरगलाने की कोशिश कर रहे हैं, मगर सचाई ये है कि वे संघ परिवार की सांप्रदायिक राजनीति के कट्टर विरोधी थे। उन्होंने कभी जनसंघ या बीजेपी का साथ लेने की कोशिश नहीं की, बल्कि वे समाजावादी-साम्यवादी दलों की एकता के पक्षधर थे।
इसका सबसे बड़ा उदाहरण ये है कि उन्होंने सरकारी नौकरियों में जो आरक्षण लागू किया उसमें मुसलमानों के पिछड़े समुदायों को भी शामिल किया, धर्म के आधार पर उन्हें बाहर नहीं किया, जबकि बीजेपी हमेशा उनके आरक्षण का विरोध करती रही है।
कर्पूरी ठाकुर ने हमेशा पिछड़ों और दलितों की राजनीति की, जबकि जनसंघ और बीजेपी सवर्णों की राजनीति करते रहे हैं। इस बार भी मोदी की पार्टी ने लगभग आधी टिकटें सवर्णों को दी हैं।
कर्पूरी जी संघ को सामंती शक्ति मानते थे और उसके साथ उनके संंबंध हमेशा तनावपूर्ण रहे क्योंकि उनकी नज़र में हिंदुत्व समानता विरोधी है और वह सवर्णों का वर्चस्व चाहता है। वे 'अल्पसंख्यक एकता' पर विश्वास करते थे, जो आरएसएस/बीजेपी की 'मेजॉरिटेरियन' सोच से टकराती थी।
ठाकुर जी के शासन में बिहार में सांप्रदायिक दंगों को नियंत्रित करने के प्रयास हुए, और उन्होंने कभी धार्मिक आधार पर वोटबैंकिंग नहीं की। वे खुद एक नाई समुदाय (अति पिछड़ा) से थे, लेकिन मुसलमानों और दलितों के साथ गठजोड़ बनाकर ऊपरी जाति-केंद्रित सांप्रदायिकता को चुनौती दी।
हाँ, बीजेपी और संघ परिवार मंडल की राजनीति के आने के बाद से उन्हें अपना नेता बताने की तिकड़म ज़रूर करती है। इसी के तहत उसने उन्हें भारत रत्न तक दिया।
आज मोदी उनकी तारीफ़ कर रहे हैं तो इसलिए कि बिहार के चुनाव में पिछड़े, अति पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक उन्हें धूल चंटा सकते हैं। कुल 10 फ़ीसदी सवर्ण कुछ नहीं कर सकते, भले ही उनके पास, धनबल, बाहुबल और प्रोपेगंडा बल है।