Huzur Mujahid-E-Millat رحمتہُ اللہ علیہ ( Dhamnagar Sharif )

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Huzur Mujahid-E-Millat رحمتہُ اللہ علیہ ( Dhamnagar Sharif ) This is a Official Page of Sarkar Huzoor Mujahid-e-Millat Rehmatu'LLAH Aleh

08/04/2024

عجیب معاملات چل رہا ہے دنیا میں۔
خوف خدا کا نہیں سوسل میڈیا کا ہے۔
अजीब मामलात चल रहा है दुनया में।
खैफ खुदा काख नहीं शोशल मिड़िया का है।

30/11/2022
Aalame Islam ko huzur AAka-E-Nemat Dada peero-murshid Sarkar mujahide millat rahmato Rijwan Ka urse paak bhut bhut  Muba...
11/12/2021

Aalame Islam ko huzur AAka-E-Nemat Dada peero-murshid Sarkar mujahide millat rahmato Rijwan Ka urse paak bhut bhut Mubarak 🥰🥰
भाइयों आज का दौर बहुत ही नाजुक है इस दौर में बहुत से पीर फकीर जो फेसबुक पर लाइव होकर अपने मुरीदों के दुख दर्द सुनते हैं और उन्हें अमल भी बताते हैं अपनी तकरीर को भी फेसबुक पर लाइव दिखाते हैं खुद फेसबुक चलाते हैं और अपने हर प्रोग्राम को फेसबुक के जरिए लोगों को दिखाते हैं मगर आज के इस दौर में भी ऐसी शख्सियत मौजूद है जिनका ने तो आज तक किसी ने फेसबुक पर फोटो देखा होगा और ना आप लाइव आए हैं आपकी उमर शरीफ 95 साल है मगर कुर्बान जाओ उस मसलक ए आला हजरत के शेर पर और आशिक ए रसूल पर आपकी आवाज इस उम्र में भी शेर की तरह है कभी मौका मिले तो आपका प्रोग्राम सुनना क्योंकि आपका प्रोग्राम मैं मैं तो किस से फोटो खींचने की इजाजत होती है और ना ही वीडियो बनाने की इजाजत होती है आपकी आवाज माशाल्लाह आज भी शेर की दहाड़ की मानिंद है आप हुजूर मुजाहिद ए मिल्लत के शागिर्द है आपका नाम हुजूर हबीबे मिल्लत पीरे तरीकत अब्दुल तवाव कादरी हबीबी है सिर्फ आपकी आवाज की रिकॉर्डिंग मिलेगी
अल्लाह ताला से दुआ है कि हुजूर हबीबे मिल्लत की उम्र में बरकत अता फरमाए आमीन ❤️❤️❤️❤️❤️❤️

27/04/2021

⚠ बीमारी उड़कर नहीं लगती ⚠

सवाल ये है कि:

"बीमारी उड़कर लगती है या नहीं?",

इसपर आ़ला ह़ज़रत इमाम अह़मद रज़ा ख़ान ह़नफ़ी क़ादिरी बरकाती बरेलवी (अ़लैहिर्रह़मह) की बहुत ज़बरदस्त किताब है, जिसका नाम है:

"अल् ह़क़्क़ुल् मुज्तला फ़ी हुक्मिल् मुब्तला",

इसी से मिलती जुलती एक और किताब है, जो त़ाऊ़न (Plague) पर लिखी:

"तैसिरुल् माऊ़न लिस् सकनि फ़ित़् त़ाऊ़न".

पहली किताब में आपने पहले 32 रिवायात ज़िक्र कीं, जिनमें वो रिवायात भी हैं जिनसे बीमारी का 'मुतअ़द्दी (Contagious)' होना भी साबित होता है, और वो रिवायात भी हैं जिनमें इसे ग़लत बताया गया है. इन्हें ज़िक्र करने के बाद लिखते हैं:

".....बीमारी उड़कर नहीं लगती; कोई मरज़, एक से दूसरे की तरफ़ सरायत नहीं करता; कोई तंदरुस्त, बीमार के क़रीब व इख़्तिलात़ से बीमार नहीं हो जाता; जिसे पहले शुरू हुई, उसे किसकी उड़कर लगी?

इन मुतवातिर व रौशन व ज़ाहिर इरशादाते आ़लिया को सुन कर, ये ख़्याल किसी तरह गुंजाइश नहीं पाता कि: "वाक़िअ़ में तो बीमारी उड़कर लगती है, मगर रसूलुल्लाह (ﷺ) ने ज़माना-ए-जाहिलिय्यत का वसवसा उठाने के लिए मुत़्लक़न् इसकी नफ़ी फ़रमाई है."...!"

फिर आगे लिखते हैं:

"....फिर हुज़ूर (ﷺ) व अजिल्ल-ए-सह़ाबा-ए-किराम (रद़ियल्लाहु अ़न्हुम) की अमली कार्रवाई:

मज्ज़ूमों (Lepers) को अपने साथ खिलाना;
उनका झूठा पानी पीना;
उनका हाथ, अपने हाथ से पकड़कर बर्तन में रखना;
ख़ास उनके खाने की जगह से, निवाला उठाकर खाना;
जहां मुँह लगाकर उन्होंने पिया, बिल् क़स़्द उसी जगह मुँह रखकर ख़ुद नोश करना;

ये और भी वाज़िह़ कर रही है कि 'अ़द्-वा (عدويٰ)', यानी एक की बीमारी दूसरे को लग जाना, मह़ज़ ख़्याले बात़िल है....!"

इसके बाद कुछ सतर बाद लिखते हैं:

"....कोई ह़दीस सुबूते अ़द्-वा में नस नहीं; ये तो मुतवातिर ह़दीसों में फ़रमाया कि: "बीमारी उड़कर नहीं लगती"; और ये एक ह़दीस में भी नहीं आया कि: " (बीमारी) आ़दी तौर पर उड़कर लग जाती है"...!"

फिर जिन रिवायात से बज़ाहिर 'अ़द्-वा (عدويٰ)' साबित होता है, उनमें एक रिवायत 'इब्ने माजह' की ये है कि कबीला स़क़ीफ़ का एक गिरोह आया, उन में से एक साहब को 'जुज़ाम (Leprosy)' का मरज़ था, तो वो आक़ा (ﷺ) की बारगाह में बैअ़त के लिए हाज़िर हुए, तो आक़ा (ﷺ) ने उनसे फ़रमाया: "लौट जाओ, हमनें तुम्हें बैअ़त कर लिया." यानी आक़ा (ﷺ) ने न ही उनसे मुस़ाफ़हा किया, और न ही उन्हें महफ़िल में पास आने दिया, दूर से ही बैअ़त क़ुबूर फ़रमा के, वापस जाने का हुक्म दे दिया...!

तो आ़ला ह़ज़रत इमाम अह़मद रज़ा ख़ान ह़नफ़ी क़ादिरी बरकाती बरेलवी (अ़लैहिर्रह़मह) इस रिवायत के जवाब में फरमाते हैं:

".....(उन्हें वापस करने में) कई वजह हैं:

1. उन्हें मज्लिसे अक़्दस में न बुलाया, कि (कहीं) ह़ाज़िरीन (उन्हें) देखकर हक़ीर न समझें;

2. ह़िज़ार (ह़ाज़िरीन) में (से) किसी को (उन्हें) देखकर, ये ख़्याल न पैदा हो कि हम इनसे बेहतर हैं. (चूंकि) ख़ुद-बीनी (Arrogance) इस मरज़ से भी सख़्त-तर बीमारी है;

3. मरीज़ अहले मज्मअ़ को देखकर ग़मगीन न हो, कि ये सब ऐसे चैन में हैं और वो बला में. तो (इससे) इसके क़ल्ब में तक़दीर की शिकायत पैदा होगी;

4. ह़ाज़िरीन का लिहाज़ ख़ातिर फ़रमाया, कि अ़रब बल्कि अ़रबो अ़जम, जुम्हूर बनी आदम, बित़् त़ब्अ़, ऐसे मरीज़ की क़ुरबत से बुरा मानते हैं, (और) नफ़रत लाते हैं;

5. मुम्किन है कि ख़ात़िरे मरीज़ का लिहाज़ फ़रमाया, कि ऐसा मरीज़, ख़ुसूसन नौ-मुब्तला (New suffered), ख़ुसूसन ज़ी-वजाहत, मज़्मअ़ में आते हुए शर्माता है;

6. मुम्किन है कि मरीज़ (रद़ियल्लाहु अ़न्हु) के हाथों से रुत़ूबत निकालती हो, तो न चाहा कि मुस़ाफ़ह़ा फ़रमायें....!"

👆🏻फिर आपने, अपनी इन तावीलात की ताईद में दलाइल के अंबार लगाना शुरू किए हैं...!

और फिर जितनी भी ऐसी रिवायात हैं जिनमें बज़ाहिर 'अ़द्-वा' का सुबूत मिलता है, उन्हें अपनी इन मज़कूरा-बाला 6 तावीलात में ही समेट डाला, मगर ज़िम्नन एक दो तावील का इज़ाफ़ा किया है कहीं कहीं...!!

फिर किताब के आख़िर में फैसला करते हुए लिखते हैं:

"....बिल् जुमला, मज़हबे मुअ़तमद व सह़ीह़ व रजीह़ व नजीह़ ये है कि जुज़ाम (Leprosy), खुजली (Itch), चेचक (Small Pox), त़ाऊ़न (Plague) वग़ैरह, अस्लन् कोई बीमारी एक की दूसरे को हरगिज़ हरगिज़ उड़कर नहीं लगती. ये महज़ औहामे बे-अस्ल हैं....!"

अब कहीं किसी के दिमाग में ये सवाल न आए, कि:

"अगर बीमारी उड़कर नहीं लगती है, तो फिर ऐसा क्यूँ हो जाता है कि बहुत से लोग मरीज़ के क़रीब जाने से उसी बीमारी में मुब्तला हो जाते हैं?"

तो इसका जवाब देते हुए लिखते हैं:

"....कोई वहम पकाए जाए, तो कभी अस्ल भी हो जाता है, कि (अल्लाह का ह़दीसे क़ुद्सी में) इरशाद हुआ है:

"أنا عند ظنّ عبدي بي."

"मैं अपने बन्दे के गुमान के मुताबिक़ उसके पास होता हूँ."
📙मुस्नदे अह़मद
....वो उस दूसरे की बीमारी उसे न लगी, बल्कि ख़ुद उसी की बात़िनी बीमारी, कि वहम परवरदह थी, सूरत पकड़कर ज़ाहिर हो गई. 'फ़ैज़ुल् क़दीर' में है:

"بل الوهم وحده من أكبر أسباب الإصابة."

"बल्कि अकेला वहम, अस्बाबे रसाई में से, सबसे बड़ा सबब है."
....इसलिए;
और नीज़ कराहत व अज़िय्यत व ख़ुद-बीनी व तह़क़ीरे मज्ज़ूम से बचने के वास्ते;
और नीज़ इस दूर-अंदेशी से, कि मबादा (ख़ुदा न करे) (बीमार के पास जाने से) इसे कुछ (वही बीमारी) पैदा हो, और इब्लीसे लई़न वसवसा डाले, कि: "देख! बीमारी उड़कर लग गई", और अब मआ़ज़ल्लाह उस अम्र की ह़क़्क़ानिय्यत इसके ख़तरह (दिल) में गुज़रेगी, जिसे मुस्त़फ़ा (ﷺ) बातिल फ़रमा चुके, (तो) ये उस मरज़ से भी बदतर मरज़ होगा. इन वुजूह से शरए़ ह़कीम व रह़ीम ने 'ज़ई़फ़ुल् यक़ीन (कमज़ोर यक़ीन वाले)' लोगों को 'हुक्मे इस्तिह़्बाबी' दिया है कि उस (मरीज़) से दूर रहें; और 'कामिलुल् ईमान' बंदगाने ख़ुदा के लिए कुछ ह़रज नहीं, (क्यूँ) कि वो इन मफ़ासिद से पाक हैं...!"

22/12/2020

🌺𝐔𝐫𝐬 𝐄 𝐇𝐮𝐳𝐮𝐫 𝐌𝐮𝐣𝐚𝐡𝐢𝐝 𝐄 𝐌𝐢𝐥𝐥𝐚𝐭 𝐀𝐚𝐥𝐚𝐦 𝐄 𝐈𝐬𝐥𝐚𝐦 𝐊𝐨 𝐁𝐚𝐡𝐨𝐭-𝐁𝐚𝐡𝐨𝐭 𝐌𝐮𝐛𝐚𝐫𝐚𝐤....
🌹𝑨𝒚𝒆 𝑯𝒂𝒃𝒊𝒃𝒊 𝑻𝒆𝒓𝒊 𝑻𝒐 𝑩𝒂𝒅𝒊 𝑺𝒉𝒂𝒂𝒏 𝑯𝒂𝒊,
🌹𝑮𝒂𝒖𝒔𝒐 𝑲𝒉𝒂𝒘𝒂𝒋 𝑲𝒆 𝑻𝒖 𝒁𝒆𝒓𝒆 𝑫𝒂𝒂𝒎𝒂'𝒏 𝑯𝒂𝒊,
🌹𝒀𝒆 𝑴𝒖𝒋𝒂𝒉𝒊𝒅 𝑬 𝑴𝒊𝒍𝒍𝒂𝒕 𝑲𝒂 𝑭𝒂𝒊𝒛𝒂𝒏 𝑯𝒂𝒊,
🌹𝒀𝒆 𝑺𝒉𝒂𝒓𝒂𝒇 𝒀𝒆 𝑺𝒂'𝒂𝒂𝒅𝒂𝒕 𝑺𝒂𝒍𝒂𝒂𝒎𝒂𝒕 𝑹𝒂𝒉𝒆 .
HABIBI

22/12/2020

निगाह ए इश्क़ का अज़ीब शौक़ देखा
तुम्हीं को देखा और बे पनाह देखा
मेरे पीर-ओ-मुर्शिद
URSE MUJAHI-E-MILLAT MUBARK
Gulam Mujahid e Millat
GULAM-E-HABIB-E-MILLAT

Urse Sarkar Mubarak 🥰🥰🥰
22/12/2020

Urse Sarkar Mubarak 🥰🥰🥰

عید سعيد مبارك
24/05/2020

عید سعيد مبارك

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