04/02/2026
बिना शंका किए गुरु के हुक्म का पालन करना चाहिए और जो लीला वह खेल रहा हो, उसकी जांच करना शुरू नहीं कर देना चाहिए ।उसे दुनियादारों से किसी प्रकार की कोई गरज नहीं होती ।वह देखने में ही गृहस्थ दिखाई देता है ,पर होता है पूरा जोगी ।
जगत और जगत के पदार्थों की ओर से बिल्कुल निर्लिप्त
गुरु की सामर्थ्य अपार और अनंत है। वह तारना चाहे तो एक नज़र से ही बेड़ा पार कर सकता है :
"एक दृष्टि, तारे गुर पूरा"
पर उसके लिए ज़रूरी है शिष्य गुरु को सच्चे मन से परमेश्वर समझता हो ,उसमें अटल विश्वास रखता हो। कच्ची लस्सी से दही नहीं जम सकती। उल्टे बर्तन में अमृत तो क्या वर्षा का पानी भी इकट्ठा नहीं होता।
"सतगुरु निरंजन सोय, मानुख का कर रूप ना जान"
सतगुरु स्वयं परमेश्वर है, मनुष्य ना जान लेना
सतगुरु फरमाते हैं ऐसा विश्वास भी उसकी कृपा और स्वयं के अनुभव से आता है।
राधास्वामी जी 🙏