Sanatan Dharm Chetana Charitabale Trust

Sanatan Dharm Chetana Charitabale Trust सनातन धर्म - सृष्टि का आधार

12/02/2026

समस्त रोग, दोष एवं ग्रह बाधा से मुक्ति के लिए
🌸 महाशिवरात्रि महोत्सव 🌸
🕉️ रुद्राभिषेक महाअनुष्ठान 🕉️
✨ महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर ✨
रुद्राभिषेक कर पुण्य लाभ प्राप्त करें।
📍 स्थान:
कड़र शिव मंदिर, बस्ती
दिनांक:
15 फरवरी 2026 | रविवार
⏰ समय:
प्रातः 9:00 बजे से
📞 आयोजन में भाग लेने एवं रुद्राभिषेक हेतु संपर्क करें:
मो.: 9125915880, 9305025324
🙏 आयोजक:
सनातन धर्म चेतना चैरिटेबल ट्रस्ट (रजि०)

12/02/2026

सनातन धर्म - सृष्टि का आधार

लोहिया काम्प्लेक्स में सनातन धर्म चेतना चैरिटेबल ट्रस्ट रजि० की बैठक संपन्न हुई। बैठक में संगठन के विस्तार एवं आगामी वर्...
08/12/2025

लोहिया काम्प्लेक्स में सनातन धर्म चेतना चैरिटेबल ट्रस्ट रजि० की बैठक संपन्न हुई। बैठक में संगठन के विस्तार एवं आगामी वर्षिक कार्य योजना पर विस्तृत चर्चा की गई। बैठक में उपस्थित सदस्यों के आम सहमति से
श्री अरुण भारती गोस्वामी को पूर्वी संभाग के संयोजक का उत्तर दायित्व सौंपा गया, जिसे अरुण भारती जी ने सहर्ष स्वीकार करते हुए , ट्रस्ट के कार्यों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता प्रकट करते हुए , सनातन धर्म के मूल्यों की रक्षा व सामाजिक निर्माण में योगदान का संकल्प लिया ।
राजेश मिश्र को कार्यक्रम संयोजक की जिम्मेदारी दी गई, राजेश मिश्र ने कहा कि वार्षिक कार्यक्रम के क्रम में संस्था धार्मिक, विधिक, सामाजिक और शैक्षिक चार स्तरीय कार्यक्रम करेगी जिससे सनातन धर्म के पुनर्जागरण का अभियान मजबूती से चल सके।
विशाल पाण्डेय को सर्व सम्मति से केन्द्रीय प्रवक्ता का उत्तर दायित्व सौंपा गया, जिसे सहर्ष स्वीकार करते हुए विशाल पाण्डेय ने संस्था के उद्देश्यों के प्रति पूरी निष्ठा से समर्पित रहने का संकल्प लिया।
शैलेष कुमार श्रीवास्तव एडवोकेट को पूर्वी संभाग का संयोजक विधि प्रकोष्ठ नियुक्त किया गया।
सौरभ कुमार बोस को पूर्वी संभाग के उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी दी गई, सौरभ कुमार बोस ने संगठन विस्तार एवं आगामी वर्षिक कार्य योजना पर विस्तृत प्रकाश डालते हुए अपनी कृतज्ञता व्यक्त किया।
सौरभ कुमार मिश्र एडवोकेट को विधि प्रकोष्ठ संगठन मंत्री पूर्वी संभाग का नियुक्त किया गया ।
संस्था ने सरकार से चार लाख से अधिक मठ मंदिर जो कि सरकारी नियंत्रण में हैं , उन्हें मुक्त करने के लिए जन सहयोग का आह्वान किया।

सीताराम सीताराम सीताराम भगवान राम को मर्यादा पुरुषोत्तम बनाने के लिए कैकयी का त्याग !एक रात जब माता कैकेयी सोती हैं, तो ...
26/11/2025

सीताराम सीताराम सीताराम
भगवान राम को मर्यादा पुरुषोत्तम बनाने के लिए
कैकयी का त्याग !

एक रात जब माता कैकेयी सोती हैं, तो उनके स्वप्न में विप्र, धेनु, सुर, संत सब एक साथ हाथ जोड़ के आते हैं और उनसे कहते हैं कि 'हे माता कैकेयी, हम सब आपकी शरण में हैं, महाराजा दशरथ की बुद्धि जड़ हो गयी है, तभी वो राम को राजा का पद दे रहे हैं, अगर प्रभु राजगद्दी पर बैठ गए तब उनके अवतार लेने का मूल कारण ही नष्ट हो जायेगा।

माता, सम्पूर्ण पृथ्वी पर सिर्फ आपमें ही ये साहस है कि, आप राम से जुड़े अपयश का विष पी सकती हैं, कृपया प्रभु को जंगल भेज के सुलभ करिये, युगों-युगों से कई लोग उद्धार होने की प्रतीक्षा में हैं, त्रिलोक स्वामी का उद्देश्य भूलोक का राजा बनना नहीं है, अगर वनवास ना हुआ तो, राम इस लोक के 'प्रभु' ना हो पाएंगे माता' ये कहते-कहते देवता घुटनों पर आ गए, माता कैकेयी के आँखों से आँसू बहने लगे।

माता बोलीं-'आने वाले युगों में लोग कहेंगे कि, मैंने भरत के लिए राम को छोड़ दिया, लेकिन असल में मैं राम के लिए आज भरत का त्याग कर रही हूँ, मुझे मालूम है, इस निर्णय के बाद भरत मुझे कभी स्वीकार नहीं करेगा।'

रामचरित मानस में भी कई जगहों पर इसका संकेत मिलता है। जब गुरु वशिष्ठ दुःखी भरत से कहते हैं,

सुनहु भरत भावी प्रबल बिलखि कहेउ मुनिनाथ।
हानि लाभु जीवनु मरनु जसु अपजसु बिधि हाथ।।

हे भरत सुनो, भविष्य बड़ा बलवान् है। हानि-लाभ, जीवन-मरण और यश-अपयश, ये सब विधाता के ही हाथ में है, बीच में केवल माध्यम आते हैं।

प्रभु इस लीला को जानते थे, इसीलिए चित्रकूट में तीनों माताओं के आने पर प्रभु सबसे पहले माता कैकेयी के पास ही पहुँच कर प्रणाम करते हैं। क्यूंकि उनको पैदा करने वाली भले ही कौशल्या जी थीं, लेकिन उनको 'मर्यादा पुरुषोत्तम' बनाने वाली माता कैकेयी ही थीं।

माता सीता को मुँह -दिखाई में कनक भवन देने वाली, सनातन धर्म को अपने त्याग से सिंचित करने वाली, सम्पूर्ण रामायण में आदर्श से ज्यादा वस्तुनिष्ठ रहने वाली श्रेष्ठ विदुषी, काल-खंड विजयी और युगों-युगों से अपयश का विष पी रही माता कैकेयी को शत् शत् प्रणाम है।।
।। जय जय सीताराम ।।

॥ श्री लक्ष्मी द्वादश नाम स्तोत्रम् ॥श्रीदेवी प्रथमं नाम द्वितीयं अमृत्तोद्भवा।तृत्तीयं कमला प्रोक्ता चतुर्थं लोकसुन्दरी...
25/10/2025

॥ श्री लक्ष्मी द्वादश नाम स्तोत्रम् ॥

श्रीदेवी प्रथमं नाम द्वितीयं अमृत्तोद्भवा।
तृत्तीयं कमला प्रोक्ता चतुर्थं लोकसुन्दरी ॥

पञ्चमं विष्णुपत्नी च षष्ठं स्यात् वैष्णवी तथा।
सप्ततं तु वरारोहा अष्टमं हरिवल्लभा ॥

नवमं शार्गिंणी प्रोक्ता दशमं देवदेविका।
एकादशं तु लक्ष्मीः स्यात् द्वादशं श्रीहरिप्रिया ॥

द्वादशैतानि नामानि त्रिसंध्यं यः पठेन्नरः।
आयुरारोग्यमैश्वर्यं तस्य पुण्यफलप्रदम् ॥

द्विमासं सर्वकार्याणि षण्मासाद्राज्यमेव च।
संवत्सरं तु पूजायाः श्रीलक्ष्म्याः पूज्य एव च ॥

लक्ष्मीं क्षीरसमुद्रराजतनयां श्रीरङ्गधामेश्वरीं ।
दासीभूत समस्त देववनितां लोकैक दीपांकुराम् ॥

श्रीमन्मन्दकटाक्ष लब्ध विभव ब्रह्मेन्द्र गंगाधरां ।
त्वां त्रैलोक्य कुटुंबिनीं सरसिजां वन्दे मुकुन्दप्रियाम् ॥

इति श्रीलक्ष्मी द्वादशनाम स्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

सभी सनातनी बन्धुओं को दीपोत्सव के महापर्व पर हार्दिक शुभकामनाएं
18/10/2025

सभी सनातनी बन्धुओं को दीपोत्सव के महापर्व पर हार्दिक शुभकामनाएं

देवी स्कंदमाता स्तोत्रनमामि स्कन्दमाता स्कन्दधारिणीम्।समग्रतत्वसागरम् पारपारगहराम्॥शिवाप्रभा समुज्वलां स्फुच्छशागशेखराम्...
26/09/2025

देवी स्कंदमाता स्तोत्र
नमामि स्कन्दमाता स्कन्दधारिणीम्।
समग्रतत्वसागरम् पारपारगहराम्॥

शिवाप्रभा समुज्वलां स्फुच्छशागशेखराम्।
ललाटरत्नभास्करां जगत्प्रदीप्ति भास्कराम्॥

महेन्द्रकश्यपार्चितां सनत्कुमार संस्तुताम्।
सुरासुरेन्द्रवन्दिता यथार्थनिर्मलाद्भुताम्॥

अतर्क्यरोचिरूविजां विकार दोषवर्जिताम्।
मुमुक्षुभिर्विचिन्तितां विशेषतत्वमुचिताम्॥

नानालङ्कार भूषिताम् मृगेन्द्रवाहनाग्रजाम्।
सुशुध्दतत्वतोषणां त्रिवेदमार भूषणाम्॥

सुधार्मिकौपकारिणी सुरेन्द्र वैरिघातिनीम्।
शुभां पुष्पमालिनीं सुवर्णकल्पशाखिनीम्॥

तमोऽन्धकारयामिनीं शिवस्वभावकामिनीम्।
सहस्रसूर्यराजिकां धनज्जयोग्रकारिकाम्॥

सुशुध्द काल कन्दला सुभृडवृन्दमज्जुलाम्।
प्रजायिनी प्रजावति नमामि मातरम् सतीम्॥

स्वकर्मकारणे गतिं हरिप्रयाच पार्वतीम्।
अनन्तशक्ति कान्तिदां यशोअर्थभुक्तिमुक्तिदाम्॥

पुनः पुनर्जगद्धितां नमाम्यहम् सुरार्चिताम्।
जयेश्वरि त्रिलोचने प्रसीद देवी पाहिमाम्॥

देवाधिदेव शिव परिवार के पूजन का महापर्व हरतालिका तीज व्रत  हरितालिका तीज व्रत का आरम्भ शिव जी को पति के रूप में पाने के ...
26/08/2025

देवाधिदेव शिव परिवार के पूजन का महापर्व
हरतालिका तीज व्रत
हरितालिका तीज व्रत का आरम्भ शिव जी को पति के रूप में पाने के लिए माता पार्वती की कठोर तपस्या से हुआ, जहाँ उनकी सहेलियों ने उनके पिता की इच्छा के विरुद्ध होने वाले विवाह को रोकने के लिए उनका अपहरण कर लिया था, इसलिए इसे हरतालिका (हरण + आलिका) कहा जाता है. इस व्रत को सुहागिन महिलाएँ अखंड सौभाग्य और पति की लंबी आयु के लिए तथा कुंवारी कन्याएँ अच्छे वर एवं सौभाग्य की प्राप्ति के लिए रखती हैं।

हरितालिका तीज व्रत की पौराणिक कथा
पार्वती जी की तपस्या:
मुख्य बिंदु : सर्व प्रथम माता पार्वती ने पार्थिव शिवलिंग का पूजन किया।
इस दिन तीन बार दोपहर, सायं और मध्य रात्रि शिव पूजन से अभीष्ट फल की प्राप्ति होती है।

पौराणिक कथाओं के अनुसार, देवी पार्वती (जो सती के रूप में जन्मी थीं) ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की थी.
हिमालय का निर्णय:
विवाह योग्य होने पर, उनके पिता हिमालयराज ने नारद जी के सुझाव पर माता पार्वती का विवाह भगवान विष्णु से तय कर दिया था, जबकि पार्वती जी शिव जी को अपना पति मान चुकी थीं.
सहेलियों द्वारा अपहरण:
पार्वती की सहेलियों ने उनकी इच्छा के विरुद्ध होने वाले विवाह को रोकने के लिए उनका अपहरण कर उन्हें एक घने जंगल में छिपा दिया.
शिव की प्राप्ति:
#जंगलमें एक गुफा में, पार्वती जी ने मिट्टी का शिवलिंग #
बनाकर भगवान शिव की कठोर आराधना की. उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर शिव जी ने उन्हें अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार किया.
व्रत का नाम:
क्योंकि पार्वती जी का अपहरण उनकी सहेलियों (आलिका) ने किया था, इसलिए इस तपस्या और व्रत का नाम "हरतालिका" पड़ा, जो हरण और आलिका से मिलकर बना है.
व्रत का विधान:
यह शुभ संयोग भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को हुआ था, इसलिए उसी तिथि को हरितालिका तीज मनाई जाती है. इस दिन भगवान शिव, माता पार्वती और श्री गणेश की पूजा की जाती है और महिलाएं पूरे दिन निर्जला उपवास रखती हैं.
व्रत का महत्व
सुहागिन महिलाओं के लिए:
यह व्रत महिलाओं के लिए अखंड सौभाग्य और पति के स्वस्थ एवं लंबी आयु की कामना के लिए रखा जाता है.
कुंवारी कन्याओं के लिए:
कुंवारी लड़कियाँ भी इस व्रत को मनचाहा और सौभाग्य
प्राप्त करने की इच्छा से करती हैं ।
हर हर महादेव।।

क्रान्ति के पुरोधा श्रीकृष्ण पूर्ण ब्रह्म हैं डॉ रामानंद शुक्ल अयोध्या              कृष्ण शब्द कृष् धातु से बना है, जिसक...
16/08/2025

क्रान्ति के पुरोधा श्रीकृष्ण पूर्ण ब्रह्म हैं
डॉ रामानंद शुक्ल
अयोध्या
कृष्ण शब्द कृष् धातु से बना है, जिसका अर्थ है खींचना, आकर्षित करना।अन्य अर्थ है काला-श्याम।आठवॉं अवतारधारी विष्णु ।देवों में सर्वप्रिय सुप्रसिद्ध नायक।पुराणों के अनुसार वसुदेव और देवकीसुत होने के कारण कंस के भान्जे हैं।व्यवहारतःवह नन्द और यशोदा के पुत्र हैं।उन्होंने ही इनका पालन-पोषण किया था।वहीं कृष्ण ने अपना बचपन बिताया।कंस द्वारा उनकी हत्या के लिए भेजे गये पूतना और बकादि क्रूर राक्षसों को उन्होंने मार गिराया।शूरवीरता के अनेक आश्चर्यजनक कर्तव्य किये तो क्रमशः उनका दिव्य लक्षण प्रकट होने लगा।गोकुल की ग्वाल-बधुएँ-बालाएँ उनकी मुख्य साथी थीं।गोपियों में राधा उनको विशेष प्रिय थीं।
पाण्डवों के हितार्थ दी गयी कृष्ण की सहायता ही कौरवों के नाश का मुख्य कारण थी।रुक्मिणी-सत्यभामा(राधा)उनकी विशेष प्रिया थीं।प्रद्युम्न उनके पुत्र थे।भाद्रकृष्ण चन्द्रमास का अँधेरा पक्ष, आठवॉं दिन ही कृष्ण का जन्मदिन है।इसे गोकुलाष्टमी भी कहते हैं।
कृष्ण का नाम और काम टेढा है।केश टेढे, वंशी बजाते समय शरीर टेढा, भृकुटी टेढी-चितवन टेढी, आँखें टेढ़ी ।बाँकेबिहारी तो नाम ही है।गोकुल गये टेढीमेढी पगडंड़ियों से।माखन-मिश्री पसंद है कृष्ण को, मक्खन निकालते समय अँगुलियाँ टेढी करनी पड़ती हैं।मिश्री की डली तो टेढीमेड़ी होती ही है।मानो टेढों को सीधा करने के लिए ही कृष्णावतार हुआ हो।कंस-कौरव टेढे, महाभारत कराना टेढा काम।टेढ को सीधा करने के लिए टेढा बनना ही पड़ता है।जीवन का ऊबड़-खाबड़ और टेढामेढा पथ कृष्ण की कूटनीति के बिना सीधा-सपाट हो ही नहीं सकता।योगेश्वर हैं कृष्ण ।सीधा-सरल काम नहीं है।योग कोई भी हो बहुत बक्र टेढा होता है।हठयोग में तो शरीर के अंग-प्रत्यंगों को बखूबी टेढामेढा करना ही पड़ता है।
प्रेमपटु कृष्ण कला निष्णात हैं।सभी कलाओं में कुशलता-रोचकता और माधुर्य ही कृष्ण हैं।प्रेम-पारंगत ही नहीं साक्षात् प्रेमपुरुष हैं।इसलिए योगेश्वर-यतीश्वर, परमेश्वर-रसेश्वर एवं मधुरेश्वर सब कुछ हैं।उनके टेढेपन-बाँकीपन में रुक्षता नहीं महत्माधुर्य है।रस एवम् आनंद है; इसलिए वह परमानंद -लीलापुरुषोत्तम हैं।ऊब-दुराव नहीं है, उनमें भरपूर भराव-पुराव और लगाव- जुड़ाव है।प्रेम का प्रचुर प्रभाव-सद्भाव, सरस सौख्य है।कृष्ण की दिव्यता निर्विकार है।समान रूप से सबके लिए साध्य-आराध्य हैं।
कृष्ण का हर काम अभूतपूर्व है।उनका वात्सल्य-प्रेम और महाभारत जैसी ऐतिहासिक महाक्रान्ति एवं गीता जैसा सारगर्भित उपदेश, शिक्षा -दृष्टान्त जीवन को मुकम्मल दिशा एवं मुकाम देने-दिलाने वाले प्रचुर प्रेरक उदाहरण हैं।धर्म -अर्थ, काम और मोक्ष तक की जीवनयात्रा की सफलता के क्रमिक सोपान हैं।कृष्ण की बाँसुरी में मधुर प्रेम और जीवन में क्रान्ति का लय है।आँखों में आकर्षण।कुञ्चित् केशों की कालिमा में कुटिलता को कम करने का संकेत, अधरों में अमृत, वाणी में मोहक मंगलगान, पीताम्बर में स्तम्भन, मकराकृत कुण्डल में शुभत्व, सिर पर मोरपंख ऊर्ध्वरेतस् ब्रह्मचर्य का प्रतीक है।स्वभाव में नटखटपन! बाँकी चितवन की चञ्चलता, दूरदृष्टि में सब कुछ समेट लेने की विशद क्षमता।कृष्ण का लोकरंजक रूप मधुर-मनोहर,मादक तथा मनमोहक है।इसलिए मनमोहन कहे जाते हैं।कृष्णस्तु कालिका स्वयम्।कृष्ण काली भी हैं और काम भी हैं।काली भी षोडश कलात्मिका हैं।कैवल्यदायिनी हैं ---काली कैवल्यदायिनी।कृष्ण -काली और कामदेव तीनों का एकाक्षर-बीजाक्षर मंत्र भी एक ही है; जिसे कामबीज कहा जाता है।षोडश कलाओं से परिपूर्ण हैं श्रीकृष्ण।श्रीसंपदा- भूसंपदा,कीर्ति संपदा-वाणीसम्मोहन, लीला-कान्ति, विद्या-विमला, उत्कर्षिणी शक्ति,नीरक्षीर विवेक, कर्मण्यता,योगशक्ति, विनय, सत्य धारणा, आधिपत्य और अनुग्रह क्षमतादि सोलह कलाएँ हैं।सन्तान के लिए रसरासेश्वर कृष्ण का सन्तानगोपाल अनुष्ठान किया जाता है।
राधा के बिना आधा कृष्ण को किसी ने नहीं साधा।तिरछी नयन कोर वाला साँवला रूपरतन की खान है।नैन-निकुञ्ज में रम्या रमा के साथ मनमोहन की मञ्जुल माधुरी कायाछाया अविचल भक्तिभाव से छायी रहती है। खूब तड़पाने के बाद ही, सब कुछ लूट-छूट जाने के बाद ही आता है, साँवरिया।
कृष्ण सार्वकालिक और सार्वदेशिक -सार्ववर्णिक हैं ।पुराणों में इनका विशिष्ट उल्लेख है।छान्दोग्योपनिषद् में देवकीसुत कृष्ण ने घोर आंगिरस से शिक्षाएँ ग्रहण की थीं।संदीपनी गुरुकुलवास भी सुप्रसिद्ध ही है।
जैन-परम्पराओं में कृष्ण 22वें तीर्थंकर नेमिनाथ के समकालीन माने गये हैं।जैनों के प्राक्-इतिहास के63महापुरुषों के विवरण में विशद हैं।महाभारत में यादव राजकुमार कहे गये हैं।कतिपय स्थानों पर विष्णु परमात्मा कहे गये हैं।विष्णु, ब्रह्मवैवर्त पुराणों में कृष्ण -लीलाओं का वर्णन है, जो कि महाभारत में नहीं है।श्रीमद्भागवत-पद्म, मत्स्य-अग्नि -हरिवंश, विष्णु -वायु तथा ब्रह्मवैवर्त पुराण में कृष्ण -लीलाओं का विशद वर्णन है।पाणिनि-पतञ्जलि ने भी कृष्ण सम्बन्धी घटनाओं की ओर संकेत किया है।कृष्ण को वासुदेव एवं परब्रह्म विश्व का मूल कहा गया है।
ईशापूर्व पहली या दूसरी शताब्दी के घोसुण्डी अभिलेख एवं इण्डियन एण्टीक्वेरी में कृष्ण को भागवत एवं सर्वेश्वर कहा गया है।यही बात नानाघाट के अभिलेखों में भी है।बेसनगर के गरुडध्वज अभिलेख में वासुदेव को देव-देव कहा गया है।
भागवत के अनुसार कृष्ण -जन्म के समय शोभन काल, स्वच्छ दिशाएँ, निर्मल गगन उडुगन (तारों)से युक्त था।सुखस्पर्शी एवं गन्धवाही वायु बह रही थी।अर्द्धरात्रि थी।अन्धकार ने आच्छादित कर लिया था।वहाँ अजनजन्मर्क्ष---शब्द आया है।यह अपूर्व प्रयोग है।न विद्यते जनःजन्म यस्य स अजनः(प्रजापति, जो आत्मभू या स्वयंभू) कहा गया है।आशय है; जन्मनक्षत्र वह रोहिणी है, जिसका प्रजापति(अजन)देवता है।भविष्य-भविष्योत्तर, स्कन्द-विष्णुधर्मोत्तर, नारदीय एवं पद्मपुराणों में कृष्ण की उपस्थिति है।भविष्य में कृष्ण स्वयं कहते हैं ----मैं वसुदेव एवं देवकी से भाद्रकृष्ण-अष्टमी को उत्पन्न हुआ था।सूर्य सिंह राशि में था, चन्द्रमा वृषभ में और नक्षत्र रोहिणी था।हरिवंश के अनुसार अभिजित् नक्षत्र और विजय मुहूर्त था।
कृष्ण -जन्माष्टमी-व्रत में उपवास और रात्रिजागरण का विशेष महत्व है।यदि जयंती रोहिणी युक्त अष्टमी एक दिन वाली है तो उसी दिन उपवास करना चाहिए।यदि जयंती न हो तो उपवास रोहिणी युक्त अष्टमी को होना चाहिए।यदि रोहिणी से युक्त दो दिन हों तो उपवास दूसरे दिन किया जाता है।यदि रोहिणी नक्षत्र न हो तो उपवास अर्द्धरात्रि में अवस्थित अष्टमी को होना चाहिए।यदि अष्टमी अर्धरात्रि में दो दिनों वाली हो या यदि वह अर्धरात्रि में न हो तो उपवास दूसरे दिन किया जाना चाहिए।यदि जयंती मंगल या बुध को हो तो उपवास महापुण्यकारक होता है।रोहिणी युक्त चन्द्रमा को अर्घ्य देना चाहिए।शंख में श्वेत पुष्प, श्वेत चन्दन, कुश-अक्षत डालकर मंत्रोच्चारपूर्वक दें।तदनन्तर दण्डवत् झुककर नमन करना चाहिए।वसुदेव के विभिन्न नामों वाले श्लोकों का पाठ करके प्रार्थनाएँ करनी चाहिए।दूसरे दिन मंत्रवाचन के साथ ब्राह्मण-पूजन करके दान देना चाहिए ----यं देवं देवकी देवी वसुदेवादजीजनत्।भौमस्य ब्रह्मणो गुप्तयै तस्मै ब्रह्मात्मने नमः।सुजन्म वासुदेवाय गोब्राह्मणहिताय च।शान्तिरस्तु, शिवं चास्तु।व्रत में उपवास केवल अंग है, पूजा ही प्रमुख है।फिर पारण करना चाहिए।जब तक अष्टमी चलती रहे या उस पर रोहिणी नक्षत्र रहे तब तक पारण नहीं करना चाहिए।कुछ परिस्थितियों में पारण रात्रि में भी होता है।विशेषतः वैष्णवों में जो व्रत को नित्य रूप में करते हैं न कि काम्य।पारण के उपरांत व्रती ऊँ भूताय भूतेश्वराय भूतपतये भूतसम्भवाय गोविन्दाय नमो नमः मंत्र का पाठ कर ले।
सूर-मीरा, स्वामी हरिदास-चैतन्य महाप्रभु और गीतगोविन्दकार जयदेव कृष्ण के अनन्य समर्पित रससिद्ध साधक थे।सूरदास कृष्ण के बालोपासक थे।बालकों की भावभूमि को आत्मसात् करके बालसुलभ निश्छल -निर्विकार स्वभाव-संस्कार बनाया, तब सूर वात्सल्य रस के सम्राट् कहे जाते है।गोपियों जैसा प्रेमोपासक भी दूसरा नहीं ।मीरा की प्रेम दिवानगी इस कदर चढी कि अन्त समय में कृष्ण के मुख में सशरीर समाती चली गयीं।भारतीय प्रेमोपासना का यह अप्रतिम उदाहरण है।रूपगोस्वामी-अष्टछाप के भक्तकवि, रसखान-नरोत्तमदास, घनान्द-आलम, मतिराम कृष्णोपासक-काव्याराधक थे।
अन्त में कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्!!

07/06/2025

Address

लोहिया काम्प्लेक्स, कचहरी बस्ती
Basti
२७२००२

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