16/08/2025
क्रान्ति के पुरोधा श्रीकृष्ण पूर्ण ब्रह्म हैं
डॉ रामानंद शुक्ल
अयोध्या
कृष्ण शब्द कृष् धातु से बना है, जिसका अर्थ है खींचना, आकर्षित करना।अन्य अर्थ है काला-श्याम।आठवॉं अवतारधारी विष्णु ।देवों में सर्वप्रिय सुप्रसिद्ध नायक।पुराणों के अनुसार वसुदेव और देवकीसुत होने के कारण कंस के भान्जे हैं।व्यवहारतःवह नन्द और यशोदा के पुत्र हैं।उन्होंने ही इनका पालन-पोषण किया था।वहीं कृष्ण ने अपना बचपन बिताया।कंस द्वारा उनकी हत्या के लिए भेजे गये पूतना और बकादि क्रूर राक्षसों को उन्होंने मार गिराया।शूरवीरता के अनेक आश्चर्यजनक कर्तव्य किये तो क्रमशः उनका दिव्य लक्षण प्रकट होने लगा।गोकुल की ग्वाल-बधुएँ-बालाएँ उनकी मुख्य साथी थीं।गोपियों में राधा उनको विशेष प्रिय थीं।
पाण्डवों के हितार्थ दी गयी कृष्ण की सहायता ही कौरवों के नाश का मुख्य कारण थी।रुक्मिणी-सत्यभामा(राधा)उनकी विशेष प्रिया थीं।प्रद्युम्न उनके पुत्र थे।भाद्रकृष्ण चन्द्रमास का अँधेरा पक्ष, आठवॉं दिन ही कृष्ण का जन्मदिन है।इसे गोकुलाष्टमी भी कहते हैं।
कृष्ण का नाम और काम टेढा है।केश टेढे, वंशी बजाते समय शरीर टेढा, भृकुटी टेढी-चितवन टेढी, आँखें टेढ़ी ।बाँकेबिहारी तो नाम ही है।गोकुल गये टेढीमेढी पगडंड़ियों से।माखन-मिश्री पसंद है कृष्ण को, मक्खन निकालते समय अँगुलियाँ टेढी करनी पड़ती हैं।मिश्री की डली तो टेढीमेड़ी होती ही है।मानो टेढों को सीधा करने के लिए ही कृष्णावतार हुआ हो।कंस-कौरव टेढे, महाभारत कराना टेढा काम।टेढ को सीधा करने के लिए टेढा बनना ही पड़ता है।जीवन का ऊबड़-खाबड़ और टेढामेढा पथ कृष्ण की कूटनीति के बिना सीधा-सपाट हो ही नहीं सकता।योगेश्वर हैं कृष्ण ।सीधा-सरल काम नहीं है।योग कोई भी हो बहुत बक्र टेढा होता है।हठयोग में तो शरीर के अंग-प्रत्यंगों को बखूबी टेढामेढा करना ही पड़ता है।
प्रेमपटु कृष्ण कला निष्णात हैं।सभी कलाओं में कुशलता-रोचकता और माधुर्य ही कृष्ण हैं।प्रेम-पारंगत ही नहीं साक्षात् प्रेमपुरुष हैं।इसलिए योगेश्वर-यतीश्वर, परमेश्वर-रसेश्वर एवं मधुरेश्वर सब कुछ हैं।उनके टेढेपन-बाँकीपन में रुक्षता नहीं महत्माधुर्य है।रस एवम् आनंद है; इसलिए वह परमानंद -लीलापुरुषोत्तम हैं।ऊब-दुराव नहीं है, उनमें भरपूर भराव-पुराव और लगाव- जुड़ाव है।प्रेम का प्रचुर प्रभाव-सद्भाव, सरस सौख्य है।कृष्ण की दिव्यता निर्विकार है।समान रूप से सबके लिए साध्य-आराध्य हैं।
कृष्ण का हर काम अभूतपूर्व है।उनका वात्सल्य-प्रेम और महाभारत जैसी ऐतिहासिक महाक्रान्ति एवं गीता जैसा सारगर्भित उपदेश, शिक्षा -दृष्टान्त जीवन को मुकम्मल दिशा एवं मुकाम देने-दिलाने वाले प्रचुर प्रेरक उदाहरण हैं।धर्म -अर्थ, काम और मोक्ष तक की जीवनयात्रा की सफलता के क्रमिक सोपान हैं।कृष्ण की बाँसुरी में मधुर प्रेम और जीवन में क्रान्ति का लय है।आँखों में आकर्षण।कुञ्चित् केशों की कालिमा में कुटिलता को कम करने का संकेत, अधरों में अमृत, वाणी में मोहक मंगलगान, पीताम्बर में स्तम्भन, मकराकृत कुण्डल में शुभत्व, सिर पर मोरपंख ऊर्ध्वरेतस् ब्रह्मचर्य का प्रतीक है।स्वभाव में नटखटपन! बाँकी चितवन की चञ्चलता, दूरदृष्टि में सब कुछ समेट लेने की विशद क्षमता।कृष्ण का लोकरंजक रूप मधुर-मनोहर,मादक तथा मनमोहक है।इसलिए मनमोहन कहे जाते हैं।कृष्णस्तु कालिका स्वयम्।कृष्ण काली भी हैं और काम भी हैं।काली भी षोडश कलात्मिका हैं।कैवल्यदायिनी हैं ---काली कैवल्यदायिनी।कृष्ण -काली और कामदेव तीनों का एकाक्षर-बीजाक्षर मंत्र भी एक ही है; जिसे कामबीज कहा जाता है।षोडश कलाओं से परिपूर्ण हैं श्रीकृष्ण।श्रीसंपदा- भूसंपदा,कीर्ति संपदा-वाणीसम्मोहन, लीला-कान्ति, विद्या-विमला, उत्कर्षिणी शक्ति,नीरक्षीर विवेक, कर्मण्यता,योगशक्ति, विनय, सत्य धारणा, आधिपत्य और अनुग्रह क्षमतादि सोलह कलाएँ हैं।सन्तान के लिए रसरासेश्वर कृष्ण का सन्तानगोपाल अनुष्ठान किया जाता है।
राधा के बिना आधा कृष्ण को किसी ने नहीं साधा।तिरछी नयन कोर वाला साँवला रूपरतन की खान है।नैन-निकुञ्ज में रम्या रमा के साथ मनमोहन की मञ्जुल माधुरी कायाछाया अविचल भक्तिभाव से छायी रहती है। खूब तड़पाने के बाद ही, सब कुछ लूट-छूट जाने के बाद ही आता है, साँवरिया।
कृष्ण सार्वकालिक और सार्वदेशिक -सार्ववर्णिक हैं ।पुराणों में इनका विशिष्ट उल्लेख है।छान्दोग्योपनिषद् में देवकीसुत कृष्ण ने घोर आंगिरस से शिक्षाएँ ग्रहण की थीं।संदीपनी गुरुकुलवास भी सुप्रसिद्ध ही है।
जैन-परम्पराओं में कृष्ण 22वें तीर्थंकर नेमिनाथ के समकालीन माने गये हैं।जैनों के प्राक्-इतिहास के63महापुरुषों के विवरण में विशद हैं।महाभारत में यादव राजकुमार कहे गये हैं।कतिपय स्थानों पर विष्णु परमात्मा कहे गये हैं।विष्णु, ब्रह्मवैवर्त पुराणों में कृष्ण -लीलाओं का वर्णन है, जो कि महाभारत में नहीं है।श्रीमद्भागवत-पद्म, मत्स्य-अग्नि -हरिवंश, विष्णु -वायु तथा ब्रह्मवैवर्त पुराण में कृष्ण -लीलाओं का विशद वर्णन है।पाणिनि-पतञ्जलि ने भी कृष्ण सम्बन्धी घटनाओं की ओर संकेत किया है।कृष्ण को वासुदेव एवं परब्रह्म विश्व का मूल कहा गया है।
ईशापूर्व पहली या दूसरी शताब्दी के घोसुण्डी अभिलेख एवं इण्डियन एण्टीक्वेरी में कृष्ण को भागवत एवं सर्वेश्वर कहा गया है।यही बात नानाघाट के अभिलेखों में भी है।बेसनगर के गरुडध्वज अभिलेख में वासुदेव को देव-देव कहा गया है।
भागवत के अनुसार कृष्ण -जन्म के समय शोभन काल, स्वच्छ दिशाएँ, निर्मल गगन उडुगन (तारों)से युक्त था।सुखस्पर्शी एवं गन्धवाही वायु बह रही थी।अर्द्धरात्रि थी।अन्धकार ने आच्छादित कर लिया था।वहाँ अजनजन्मर्क्ष---शब्द आया है।यह अपूर्व प्रयोग है।न विद्यते जनःजन्म यस्य स अजनः(प्रजापति, जो आत्मभू या स्वयंभू) कहा गया है।आशय है; जन्मनक्षत्र वह रोहिणी है, जिसका प्रजापति(अजन)देवता है।भविष्य-भविष्योत्तर, स्कन्द-विष्णुधर्मोत्तर, नारदीय एवं पद्मपुराणों में कृष्ण की उपस्थिति है।भविष्य में कृष्ण स्वयं कहते हैं ----मैं वसुदेव एवं देवकी से भाद्रकृष्ण-अष्टमी को उत्पन्न हुआ था।सूर्य सिंह राशि में था, चन्द्रमा वृषभ में और नक्षत्र रोहिणी था।हरिवंश के अनुसार अभिजित् नक्षत्र और विजय मुहूर्त था।
कृष्ण -जन्माष्टमी-व्रत में उपवास और रात्रिजागरण का विशेष महत्व है।यदि जयंती रोहिणी युक्त अष्टमी एक दिन वाली है तो उसी दिन उपवास करना चाहिए।यदि जयंती न हो तो उपवास रोहिणी युक्त अष्टमी को होना चाहिए।यदि रोहिणी से युक्त दो दिन हों तो उपवास दूसरे दिन किया जाता है।यदि रोहिणी नक्षत्र न हो तो उपवास अर्द्धरात्रि में अवस्थित अष्टमी को होना चाहिए।यदि अष्टमी अर्धरात्रि में दो दिनों वाली हो या यदि वह अर्धरात्रि में न हो तो उपवास दूसरे दिन किया जाना चाहिए।यदि जयंती मंगल या बुध को हो तो उपवास महापुण्यकारक होता है।रोहिणी युक्त चन्द्रमा को अर्घ्य देना चाहिए।शंख में श्वेत पुष्प, श्वेत चन्दन, कुश-अक्षत डालकर मंत्रोच्चारपूर्वक दें।तदनन्तर दण्डवत् झुककर नमन करना चाहिए।वसुदेव के विभिन्न नामों वाले श्लोकों का पाठ करके प्रार्थनाएँ करनी चाहिए।दूसरे दिन मंत्रवाचन के साथ ब्राह्मण-पूजन करके दान देना चाहिए ----यं देवं देवकी देवी वसुदेवादजीजनत्।भौमस्य ब्रह्मणो गुप्तयै तस्मै ब्रह्मात्मने नमः।सुजन्म वासुदेवाय गोब्राह्मणहिताय च।शान्तिरस्तु, शिवं चास्तु।व्रत में उपवास केवल अंग है, पूजा ही प्रमुख है।फिर पारण करना चाहिए।जब तक अष्टमी चलती रहे या उस पर रोहिणी नक्षत्र रहे तब तक पारण नहीं करना चाहिए।कुछ परिस्थितियों में पारण रात्रि में भी होता है।विशेषतः वैष्णवों में जो व्रत को नित्य रूप में करते हैं न कि काम्य।पारण के उपरांत व्रती ऊँ भूताय भूतेश्वराय भूतपतये भूतसम्भवाय गोविन्दाय नमो नमः मंत्र का पाठ कर ले।
सूर-मीरा, स्वामी हरिदास-चैतन्य महाप्रभु और गीतगोविन्दकार जयदेव कृष्ण के अनन्य समर्पित रससिद्ध साधक थे।सूरदास कृष्ण के बालोपासक थे।बालकों की भावभूमि को आत्मसात् करके बालसुलभ निश्छल -निर्विकार स्वभाव-संस्कार बनाया, तब सूर वात्सल्य रस के सम्राट् कहे जाते है।गोपियों जैसा प्रेमोपासक भी दूसरा नहीं ।मीरा की प्रेम दिवानगी इस कदर चढी कि अन्त समय में कृष्ण के मुख में सशरीर समाती चली गयीं।भारतीय प्रेमोपासना का यह अप्रतिम उदाहरण है।रूपगोस्वामी-अष्टछाप के भक्तकवि, रसखान-नरोत्तमदास, घनान्द-आलम, मतिराम कृष्णोपासक-काव्याराधक थे।
अन्त में कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्!!