14/04/2022
राम नौमी की यात्रा से क़ब्ल ये मस्जिद पर कवर नही बल्कि मुल्क की जमहूरियत पर कफन चढ़ाया गया है, लोकतंत्र के चेहरे पर फ़ासिस्ट ताक़तों ने तमांचा मारा है,
सेकुलरिज्म के जनाज़े पर फ़िरक़ा परस्त ताक़तों ने रक़्स किया है।
ये तस्वीर मस्जिद पर नही बल्कि उम्मत पर कफन डालने का मंजर पेश कर रही है।
हम भी महफूज़ कहाँ अपने ठिकाने पर हैं,
बादे बग़दाद हमी __लोग__ निशाने _पर हैं
जुलूसे गौसिया,जुलूसे खुवाज़ा,जुलूसे रजविया, पर ज़ोर ज़ोर से डी, जे,जज़्बाती नारा बजाने वालों को ये तस्वीर जवाब है।
जब हम नारों में राफ़ज़ी ख़ारजी को चढ़ाने के लिए नारा लगाते हैं कि
ऐ दीन के गद्दार बुलाऊँ क्या अली को,
तब हिन्दू धर्म के लोग समझते हैं कि ये नारा हमारे खिलाफ लग रहा है,
पूरी दुनिया मे हम जश्न मना देंगे,
इसको सुनकर ओ लोग जश्न का अलग माना निकालते हैं और कहते हैं कि ये लोग हमारे खिलाफ हैं,
जबकि ये सारी गैर जरूरी हरकतें हमारी बर्बादी की ज़िम्मेदार हैं,
खुश्क पत्तों की तरह हम भी बिखर जाएंगे,
तुम ने ताजिया रखना और उसका जुलूस निकालना शुरू किया जवाब में दुर्गा पूजा, सामने आया,
जुलूसे गौसिया का जवाब जुलूसे राम नौमी की शक्ल में, सामने आया,
तुम्हें काली घटाओं को पहचानना नही आया
नशीमन से धुआं उठता है कहते हो सावन आया
मैं तो हमेशा से कहता रहा कि इन जलसों जुलूसों और क़व्वालियों पर रोक लगाकर ज़मीनी काम शुरू किया जाय
अपना स्कूल,कॉलेज,यूनिवर्सिटी, हॉस्पिटल, चेरिटेबल ट्रस्ट, वगैरह कायम किया जाए,और भर पूर मज़बूत किया जाए,
शिक्षा को 100% यकीनी बना जाए, जो क़ौम शिक्षा ओ रोजगार में दलितों से भी पीछे हो आज उस क़ौम में उर्स,चादर,गागर,क़व्वाली,जलसा, जुलूस,पर करोड़ों रुपये
सालाना खर्च होते हैं।
वह क़ौम कैसे सम्हल सकती है जिसको अपनी बर्बादी का खुद एहसास न हो।
जमाल अख्तर सदफ़