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Shandilya Jyotish Anusandhan Kendra We solve chronic and critical human problems in day-to-day life using vedic astrology, planetory, vastu, gemology and vedic puja

Shandilya Jyotish Anusandhan Kendra (SJAK) was founded by Pt. Ram Narayan Sharma in 2003 having consultancy services in the field of Vedic Astrology, Planetory, Vastu, Gemology and Vedic Puja etc. We, at SJAK, suggest unique remedial measures to solve chronic and critical human problems in day-to-day life, after analyzing your horoscope, tries to suggest instant effective remedies in solving all k

inds of human troubles and tensions, without inflicting harm on anybody i.e. these remedies are completely self defensive against the evils created by the planets without causing injury in anyway to anyone concerned.

होलिया में उड़े रे गुलाल:-बहुत दिनों के बाद एक नया लेख साझा कर रहा हूं l अभी होली का त्योहार समीप है l इस लेख को पढ़ने स...
05/03/2023

होलिया में उड़े रे गुलाल:-

बहुत दिनों के बाद एक नया लेख साझा कर रहा हूं l अभी होली का त्योहार समीप है l इस लेख को पढ़ने से पहले ये वीडियो देखें । हमारे गांव के बच्चों द्वारा सरस्वती पूजा के शुभ अवसर पर आयोजित प्रोग्राम का हिस्सा है । अगर नृत्य शैली पसंद आए तो लाइक करके इन बच्चों का हौसला जरूर बढ़ाएं । अधिक मनोरंजन के लिए इस चैनल को सब्सक्राइब भी कर सकते हैं । इस वर्ष हमने सरस्वती पूजा समारोह का ५०वां अधिवेशन मनाया है।

भारत में, किसी भी सकारात्मक परिवर्तन को एक उत्सव द्वारा चिह्नित किया जाता है। बुराई पर अच्छाई की जीत और रंगों के त्यौहार के रूप में मनाई जाने वाली होली को वसंत के आरम्भ और शीत ऋतु के समापन के रूप में मनाया जाता है। होली के समय मौसम में होने वाले इस परिवर्तन का बहुत महत्व है। होली की मूल कथा होली के दो मुख्य पहलुओं से जुड़ी हुई है जिनमे से एक है - होलिका दहन और दूसरी है धुलेटी जो कि रंगों का उत्सव है| यह होलिका दहन के अगले दिन मनाया जाता है। होली फाल्गुन मास की पूर्णिमा के दिन मनाई जाती है।

भारत का बच्चा- बच्चा प्रह्लाद और होलिका की कहानी के विषय में जानता है। प्रह्लाद असुरों के राजा हिरण्यकश्यप का पुत्र था। प्रह्लाद जन्म से ही भगवान विष्णु का अनन्य भक्त था, जिसे हिरण्यकश्यप एक नश्वर शत्रु मानता था। प्रह्लाद के पिता ने उसे हर तरह से भगवान विष्णु की पूजा करने से रोकने का प्रयास किया, किन्तु प्रह्लाद की भक्ति अटूट थी। इससे तंग आकर हिरण्यकश्यप ने अपने ही पुत्र को कई बार तरह-तरह से जान से मारने की कोशिश की लेकिन चमत्कारिक रूप से प्रह्लाद हर बार बच गया। चूंकि हिरण्यकश्यप की बहन, ‘होलिका’ को वरदान मिला था कि अग्नि उसे कभी नहीं जला सकती | एक बार होलिका ने हिरण्यकश्यप को सुझाव दिया कि वह प्रह्लाद के साथ अग्नि की एक चिता में बैठेगी और इस प्रकार प्रहलाद अग्नि में जलकर मृत्यु को प्राप्त हो जाएगा तथा अपने वरदान के कारण होलिका सुरक्षित बच जाएगी ।

अपने सुझाव के अनुसार उसी फाल्गुन महीने की पूर्णिमा की संध्या पर, होलिका, प्रह्लाद को अपनी गोद में लेकर, एक चिता पर बैठ गई और वहां उपस्थित अन्य लोगों ने उसे आग लगा दी। चमत्कारिक रूप से उस दिन ‘होलिका’ (जिसे अग्नि से न जलने का वरदान था ) बुरी तरह से जल गई और मृत्यु को प्राप्त हुई जबकि भीषण अग्नि, प्रह्लाद का बाल भी बांका नहीं कर पायी | यही बुराई पर अच्छाई की जीत है| इसीलिए हर फाल्गुन की पूर्णिमा के अगले दिन होली का उत्सव मनाया जाता है |

होली के विषय में क्या कहता है ज्योतिष शास्त्र:
यद्यपि, होली का एक गहरा ज्योतिषीय महत्व है जो कि उपरोक्त कहानी में भी कुछ सीमा तक परिलक्षित होता है। फाल्गुन में पूर्णिमा के दिन, सूर्य ‘कुंभ राशि’ में ‘पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र’ में होता है जबकि चंद्रमा ‘सिंह राशि’ में पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र में होता है।

पृथ्वी पर जीवन की उपस्थिति के पीछे सूर्य और चंद्रमा के संयोजन को कारण माना जाता है। आध्यात्मिक रूप से भी, सूर्य को हमारी आत्मा माना जाता है जबकि चंद्रमा को हमारे मन के रूप में दर्शाया जाता है। सूर्य को देवत्व का प्रकाश भी माना जाता है जबकि चंद्रमा को भक्ति का प्रतिनिधि कहा जाता है। यदि हम सूर्य को देवता के समकक्ष मानते हैं, तो चंद्रमा को भक्त माना जाएगा। शास्त्रों में भी, भगवान के परम भक्तों को चंद्रमा के रूप में मान्यता दी जाती है।

फाल्गुन की पूर्णिमा के दिन, चन्द्रमा जिस नक्षत्र में होता है, उसके स्वामी ‘शुक्र’ हैं । और सूर्य जिस नक्षत्र में है, उसके स्वामी ‘बृहस्पति’ हैं । शास्त्रों कहते हैं कि असुरों के गुरु शुक्राचार्य हैं, जबकि बृहस्पति देवताओं के गुरु हैं। और इस नक्षत्र में, चंद्रमा की राशि (एक भक्त के रूप में चिह्नित) ‘सिंह’ है, जो अग्नि संकेत है।

इसलिए, फाल्गुन की पूर्णिमा के दिन, चंद्रमा (भक्त), सिंह (अग्नि) के प्रभाव में होता है, लेकिन उसे कुछ भी नुकसान नहीं होता है क्योंकि उस पर सूर्य (भगवान) का पूरा प्रकाश पड़ता है। यह प्रतीक है जो जलती चिता में होलिका की गोद में बैठे प्रह्लाद में परिलक्षित होता है।

इस दिन, परमात्मा (सूर्य) की ऊर्जा अपने भक्त (चंद्रमा) पर अपना पूरा ध्यान दे रही है क्योंकि पूर्णिमा वह दिन है जब पूरा चंद्रमा दिखाई देता है। इसका अर्थ है कि देवता अपने भक्तों को पूरी कृपादृष्टि से देख रहे हैं। और ‘सिंह राशि’ के प्रभाव से आसुरी ऊर्जा का दहन किया जा रहा है, जबकि भक्त को कोई नुकसान नहीं होता है। इसलिए, यह दिन ईश्वर की कृपा से, भीतर की सभी नकारात्मक ऊर्जा से निवृत्ति के लिए महत्वपूर्ण है।

होली में महत्वपूर्व हैं ये अनुष्ठान :
होली के दिन कई तरह की पूजा-अर्चना होती है। भारत के कई राज्य अपने क्षेत्रीय विधि-विधान के अनुसार एक विशेष पूजा के साथ होली मनाते हैं। यद्यपि कुछ विशिष्ट अनुष्ठान भी हैं, जिन्हें आप इस दिन कर सकते हैं।

वास्तु शांति पूजा: होली का दिन घर के वास्तु में सुधार करने के लिए एक अच्छा दिन है। वास्तु-शांति पूजा का आयोजन करना, स्वादिष्ट भोजन बनाना और लोगों को उत्सव के लिए आमंत्रित करना वास्तुपुरुष को प्रसन्न करता है और स्थान विशेष के वास्तु में सुधार करता है।

हनुमान पूजा: भगवान हनुमान को सभी भक्तों में सर्वोच्च माना जाता है। इसलिए इस दिन हनुमान-पूजा का आयोजन करना काफी शुभ होता है। नकारात्मकता से बचाने के लिए हनुमान जी की पूजा की जाती है और इस दिन इस पूजा का प्रभाव अत्यधिक होता है।

भगवान विष्णु के मंत्र का जाप: भगवान नरसिंह, जिसने हिरण्यकश्यप का वध किया था, वह स्वयं भगवान विष्णु का अवतार थे इसलिए विष्णु मंत्र - ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ का जाप करना सबसे शुभ माना जाता है। इस मंत्र को एक जप माला के 10 -11 बार जाप से जपा जा सकता है।

होलिया में उड़े रे गुलालOccasion: Saraswati Puja 2023 (Golden Jubilee Celebration)Venue: Gokula Rangalay 28/01/2023 holiya mein ude re gulalholiya khele ram ...

|| श्री गणेशाय नमः ||महाभारत में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को हमेशा कुछ न कुछ ज्ञान की बातें बताते रहते थे। कभी-कभी श्रीकृष...
16/05/2021

|| श्री गणेशाय नमः ||

महाभारत में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को हमेशा कुछ न कुछ ज्ञान की बातें बताते रहते थे। कभी-कभी श्रीकृष्ण थोड़े शब्दों में ही बड़ी बात कह देते थे। ऐसे में अर्जुन उनसे कहते थे कि कृपया ये बात विस्तार से भी समझाएं।

कुरुक्षेत्र में कौरव और पांडव का युद्ध चल रहा था। हनुमानजी अर्जुन के रथ के ऊपर लगी ध्वजा पर बैठे हुए थे। रथ के घोड़े की डोर श्रीकृष्ण के हाथ में थी। दो समर्थ शक्तियां अर्जुन के साथ थीं। सामने भीष्म पितामह थे। भीष्म ने एक शक्तिशाली बाण अर्जुन के रथ की ओर छोड़ा। बाण का प्रहार बहुत तेज था, लेकिन रथ थोड़ा सा भी हिला नहीं। प्रहार इतना भीषण था कि रथ को डगमगाना था, पीछे चले जाना था, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ।

अर्जुन ने मुस्कान के साथ भगवान से कहा, ‘देखा आपने, भीष्म जैसे योद्धा भी मेरे रथ को हिला नहीं सके। देखिए नीचे, पहिए वहीं के वहीं हैं।’

श्रीकृष्ण ने कहा, ‘तुम नीचे देख रहे हो। मैं तुमसे कहता हूं ऊपर देखो। तुम्हारे रथ की ध्वजा पर हनुमान बैठे हैं। तुमने सिर्फ नीचे देखा और निर्णय ले लिया कि तुम बलशाली हो, भीष्म कमजोर हैं। ऊपर देखोगे तो तुम्हें मालूम हो जाएगा, इसका कारण क्या है?’

सीख - श्रीकृष्ण ने इसके जरिये हमें ये समझाया कि जीवन में नीचे और ऊपर समान रूप से देखना चाहिए। जब कभी बुरा समय आए तो हमें आगे वाले लोगों से प्रेरणा लेनी चाहिए। अगर हम सफल लोगों की बराबरी न कर सके तो भी निराश नहीं होना चाहिए। ध्यान रखें, हमसे पीछे भी काफी लोग हैं। जीवन में सफलता और असफलता के बीच संतुलन बनाए रखना चाहिए। जो मिल गया, उसका घमंड न करें और जो नहीं मिला, उसकी वजह से दुखी नहीं होना चाहिए।

21/11/2020

छठ पूजा 2020. स्थान- गोकुला. संध्या अर्घ्य 20 नवंबर।

Om Namah Shivay!
22/02/2020

Om Namah Shivay!

छठ पर्व 2019:कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि से ही देवी छठ माता की पूजा अर्चना शुरू हो जाती है और सप्तमी तिथि ...
29/10/2019

छठ पर्व 2019:

कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि से ही देवी छठ माता की पूजा अर्चना शुरू हो जाती है और सप्तमी तिथि की सुबह तक चलती है. शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को नहाय-खाय होता है. इसमें व्रती का मन और तन दोनों ही शुद्ध और सात्विक होते हैं. इस दिन व्रती शुद्ध सात्विक भोजन करते हैं.

शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को खरना का विधान होता है व्रती सारा दिन निराहार रहते हैं और शाम के समय गुड़ वाली खीर का विशेष प्रसाद बनाकर छठ माता और सूर्य देव की पूजा करके खाते हैं. षष्टि तिथि के पूरे दिन निर्जल रहकर शाम के समय अस्त होते सूर्य को नदी या तालाब में खड़े होकर अर्घ्य देते हैं और अपने मन की कामना सूर्यदेव को कहते हैं.

सप्तमी तिथि के दिन भी सुबह के समय उगते सूर्य को भी नदी या तालाब में खड़े होकर जल देते हैं और अपनी मनोकामनाओं के लिए प्रार्थना करते हैं.

छठ पूजा का कैलेंडर-

छठ पूजा नहाय-खाए (31 अक्टूबर)

खरना का दिन (1 नवम्बर)

छठ पूजा संध्या अर्घ्य का दिन (2 नवम्बर)

उषा अर्घ्य का दिन (3 नवम्बर)

पूजा के लिए शुभ मुहूर्त-

पूजा का दिन- 2 नवंबर, शनिवार

पूजा के दिन सूर्योदय का शुभ मुहूर्त- 06:33

छठ पूजा के दिन सूर्यास्त का शुभ मुहूर्त- 17:35

षष्ठी तिथि आरंभ- 00:51 (2 नवंबर 2019)

षष्ठी तिथि समाप्त- 01:31 (3 नवंबर 2019)

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Shiv Vihar Colony, (Back Side Of Durga Mandir), Bounsi
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