Shri Jagdish Dham

Shri Jagdish Dham “श्री जगदीश धाम” एक जन कल्याणकारी न्यास है।

चित्रकूट धाम में वर्ष 2018 का यह चित्र Shri Jagdish Dham परिवार। पुत्र, पुत्री, पुत्रवधू  और छोटी सी वाच्या बिटिया दादी ...
16/03/2026

चित्रकूट धाम में वर्ष 2018 का यह चित्र Shri Jagdish Dham परिवार। पुत्र, पुत्री, पुत्रवधू और छोटी सी वाच्या बिटिया दादी के साथ तीर्थ यात्रा में🙏

होली की शुभकामनाएं 🙏
05/03/2026

होली की शुभकामनाएं 🙏

25/01/2026

बाढ़हिं पूत पिता के धरमे
खेती उपजै अपने करमे ।।
बेटवा मूलधन नाती ब्याज
मूल से जादा मोहय ब्याज।।

24/01/2026
श्रीकृष्ण भगवान की शिव भक्ति का शास्त्रोक्त संदर्भ:–महाभारत के खिलपर्व हरिवंश में भविष्यान्तर्गत कैलास यात्रा के अध्याय ...
16/01/2026

श्रीकृष्ण भगवान की शिव भक्ति का शास्त्रोक्त संदर्भ:–

महाभारत के खिलपर्व हरिवंश में भविष्यान्तर्गत कैलास यात्रा के अध्याय 73 में रुक्मिणी जी की प्रार्थना पर श्रीकृष्ण कहते हैं :–

एष गच्छामि पुत्रार्थं कैलासं पर्वतोत्तमम् ।।35।।
तत्रोपास्य महादेवं शङ्करं नीललोहितम् ।
ततो लब्धास्मि पुत्रं ते भवाद् भूतहिते रतात् ।।36।।
तपसा ब्रह्मचर्येण भवं शङ्करमव्ययम्।
तोषयित्वा विरूपाक्षमादिदेवमजं विभुम् ।।37।।
गमिष्याम्यहमद्यैव द्रष्टुं शङ्करमव्ययम्।
स च मे दास्यते पुत्रं तोषितस्तपसा मया ॥38॥

'यह लो, मैं पुत्र-प्राप्तिके लिये पर्वतोत्तम कैलासकी तरफ जाता हूँ और वहाँ महादेवकी उपासना करके (उनको प्रसन्न करूँगा), नीललोहित अव्यय भगवान् शङ्कर से, जो प्राणिमात्र के हितपरायण हैं, तुझे पुत्रलाभ होगा। ब्रह्मचर्यव्रत पालन पूर्वक तपश्चर्या से मैं उन विरूपाक्ष, आदिदेव, अज, विभु परमात्माको सन्तुष्ट करूँगा! मैं आज ही अव्यय शङ्करका दर्शन करने जाऊँगा और मुझको दृढ़ विश्वास है कि मेरे तपसे प्रसन्न होकर वे मुझे पुत्र अवश्य देंगे'।।

।।आप सब को महादेव की कृपा निरंतर प्राप्त होती रहे।।
🙏🙏🙏

शीतकालीन सेवा : Shri Jagdish Dham में आज शीत प्रकोप से बचाव हेतु ग्रामवासियों को कंबल वितरण संपन्न किया गया।
14/01/2026

शीतकालीन सेवा : Shri Jagdish Dham में आज शीत प्रकोप से बचाव हेतु ग्रामवासियों को कंबल वितरण संपन्न किया गया।

भावाभावविहीनो यस्तृप्तो निर्वासनो बुधः। नैव किंचित् कृतं तेन लोकदृष्टयाविकुर्वता ॥ 19 ॥– अष्टावक्र गीता, अठारहवां प्रकरण...
25/11/2025

भावाभावविहीनो यस्तृप्तो निर्वासनो बुधः।
नैव किंचित् कृतं तेन लोकदृष्टयाविकुर्वता ॥ 19 ॥
– अष्टावक्र गीता, अठारहवां प्रकरण, सूत्र 19
अनुवाद : जो ज्ञानी पुरुष तृप्त है, भाव-अभाव से रहित है, वासना-रहित है वह लोक-दृष्टि से कर्म करता हुआ भी कुछ नहीं करता है।

व्याख्या : अहंकार–वश कर्म करने वाला ही कर्त्ता है। जिसका कोई अहंकार नहीं, जिसकी कोई वासना नहीं, जिसकी कोई फलाकांक्षा नहीं, कर्म करके भी कोई अपेक्षा नहीं रखता, जो भाव और अभाव की चिन्ता से रहित है, ऐसा व्यक्ति कर्त्ता नहीं है। वह संसार में कर्म करता हुआ भी उनसे सदा अलिप्त रहता है क्योंकि उन कर्मों से प्राप्त फलों को वह क्षणिक एवं असत्य समझता है। उसे जब शाश्वत सुख व आनन्द की प्राप्ति हो गई है, तब वह अपने आत्मानन्द में तृप्त है अतः इन अनित्य भोगों के प्रति उदासीन हो जाता है, किन्तु संसार की भाँति वह भी कर्म करता रहता है किन्तु भीतर अछूता रहता है अतएव वह कर्म करता हुआ भी कुछ नहीं करता है।

व्यक्तेः मित्राणि पश्य, चरित्रं ज्ञास्यसि।                       अर्थात्किसी व्यक्ति के मित्र को देखिए, उसका चरित्र ज्ञा...
08/11/2025

व्यक्तेः मित्राणि पश्य, चरित्रं ज्ञास्यसि।
अर्थात्
किसी व्यक्ति के मित्र को देखिए, उसका चरित्र ज्ञात हो जाएगा।

महाशिवपुराण, विद्येश्वरसंहिता, श्लोक सं० 21/22 से उद्धृत :–जङ्गमं लिङ्गमित्याहुः कृमिकीटादिकं तथा। स्थावरस्य च शुश्रूषा ...
07/11/2025

महाशिवपुराण, विद्येश्वरसंहिता, श्लोक सं० 21/22 से उद्धृत :–
जङ्गमं लिङ्गमित्याहुः कृमिकीटादिकं तथा।
स्थावरस्य च शुश्रूषा जङ्गमस्य च तर्पणम् ॥ 21
तत्तत्सुखानुरागेण शिवपूजां विदुर्बुधाः ।
पीठमम्बामयं सर्वं शिवलिङ्गं च चिन्मयम् ॥ 22
स्थावर और जंगम के भेद से लिंग भी दो प्रकार का कहा गया है। वृक्ष, लता आदि को स्थावर लिंग कहते हैं और कृमि-कीट आदि को जंगम लिंग। सींचने आदि के द्वारा स्थावर लिंग की सेवा करनी चाहिये और जंगम लिंग को आहार एवं जल आदि देकर तृप्त करना उचित है। उन स्थावर-जंगम जीवों को सुख पहुँचाने में अनुरक्त होना भगवान् शिव का पूजन है-ऐसा विद्वान् पुरुष मानते हैं। [इस प्रकार चराचर जीवोंको ही भगवान् शंकरके प्रतीक मानकर उनका पूजन करना चाहिये ।] ॥
सभी पीठ पराप्रकृति जगदम्बाका स्वरूप हैं और समस्त शिवलिंग चैतन्यस्वरूप हैं।

05/11/2025

परेषां च तथा दोषं न प्रशंसेद्विचक्षणः ।
विद्वेषेण तथा ब्रह्मन् श्रुतं दृष्टं च नो वदेत् ॥ ७९
(श्रीशिवमहापुराण, अध्याय 13)
अर्थात्: विद्वान्‌ को चाहिये कि वह दूसरों के दोषों का वर्णन न करे। द्वेष वश दूसरों के सुने या देखे हु छिद्र को भी प्रकट न करे।

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224159

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