27/07/2019
जय श्री नारायण हरि !
मंगलमय सुप्रभात आत्मीय जन !
भूभारराजपृतना यदुभिर्निरस्य,
गुप्तैः स्वबाहुभिरचिन्तयदप्रमेयः!
मन्येऽवनेर्ननु गतोऽप्यगतं हि भारं,
यद्यादवं कुलमहो अविषह्यमास्ते !!
( श्रीमद्भागवत 11/1/3 )
पृथ्वी पर भारस्वरूप क्या है ? पार्थिव देहों की संख्या कुछ भी हो, उससे भूमि पर भार नहीं बढ़ता ! भूमि के तत्वों से ही सभी प्राणियों की शरीर संरचना होती है ! अत: पृथ्वी पर जनसंख्या दस करोड़ हो या दस अरब, क्या अन्तर पड़ता है ? पृथ्वी तत्व मिट्टी के रूप में रहे या शरीर रूप में, उसकी मात्रा तो उतनी ही रहेगी ! फिर अवतार लेकर ईश्वर द्वारा भूभार हरण का क्या अर्थ है ?
शरीर का कोई अंग आवश्यकता से अधिक बढ़ जाय या निष्क्रिय हो जाय तो वह भारस्वरूप हो जाता है ! आपने मोटे मनुष्य देखे होंगे, उनके देह में एकत्र मेद उनके लिए भार ही तो है ! दूसरा भार मन पर होता है ! जो बात हमें अप्रिय हो और वह हमारे समीप बराबर बनी रहे तो मन भार से पीड़ित होता है!
पृथ्वी पर भी दो प्रकार के भार होते हैं! पहला भार है पृथ्वी पर सेना की अभिवृद्धि।
गिरि सरि सिंधु भार नहिं मोंही !
जस मोंहि गरुअ एक परद्रोही !!
(श्रीरामचरितमानस 1/183/5)
समाज में उत्पीड़क व निरंकुश तत्वों को नियन्त्रित रखने तथा बाहरी आक्रमण से रक्षा के लिए सैन्य शक्ति आवश्यक है ; किन्तु प्राय: क्रूर एवं महत्वाकांक्षी शासक दूसरे राज्यों पर शासन स्थापित करने के लिए, उन्हें पराजित करने के लिए, दूसरों को आतंकित करने के लिए सैन्य शक्ति बढ़ाते रहते हैं और निरंतर बढ़ाते ही जाते हैं और जब एक पड़ोसी या प्रतिद्वन्द्वी अपनी सैन्य शक्ति बढ़ाता है तो दूसरे को भी अपनी सुरक्षा या प्रतिष्ठा रक्षा हेतु सैन्य शक्ति बढ़ानी पड़ती है! इस प्रकार की प्रतिस्पर्धा प्रारम्भ हो जाने पर पूरा समाज बहुत पीड़ा पाता है!
किसी देश की सेना को सबसे अधिक सुविधा चाहिए होती है ; क्योंकि उसे सदा युद्ध हेतु तैयार रहना होता है! उस पर होने वाला व्यय पर्याप्त अधिक होता है! सामान्य नागरिक की अपेक्षा बहुत अधिक! लेकिन युद्ध काल के अतिरिक्त सेना का क्या उपयोग ? सेना उत्पादक तत्व नहीं है! देश के उत्पादन का एक बड़ा भाग सेना पर व्यय होता है! यह व्यय सैन्यशक्ति की वृद्धि के साथ बढ़ता ही जाता है और उत्पादक समाज को अभावग्रस्त जीवन व्यतीत होने को बाध्य होना पड़ता है! प्रतिस्पर्धी का आतंक सैन्य शक्ति को घटाने नहीं देता ! इस प्रकार सेना की वृद्धि पूरे समाज पर व पृथ्वी पर भार बन जाती है! सम्पूर्ण मानव ही नहीं, सम्पूर्ण प्राणियों का शोषण सेना के लिये होता है! राज्यों की संख्या जितनी बढ़ती है, सेना का भार उतना बढ़ता जाता है और संसार में जब किन्हीं शासकों को आसुरी उन्माद चढ़ता है, सर्वजयी होने, सब पर प्रभुत्व स्थापन की इच्छा प्रबल होती है, तब यह भार और अधिक बढ़ जाता है!
केवल किसी को पराजित कर देने से ही तो बात समाप्त नहीं हो जाती। अन्याय, अधर्म, उत्पीड़न, शोषण करने वाले को अपना प्रभुत्व, अपना आतंक बनाये रखने के लिए भी बहुत बड़ी सैन्य शक्ति निरंतर सन्नद्ध रखनी पड़ती है! यह बढ़ी हुई सेना समाज पर भार है और उसके आतंक का भार रहता है जन मानस पर!
जब देव शक्ति भी आसुरी मानवों अथवा असुरों की बढ़ी सेना का भार दूर नहीं कर पाती तब सृष्टि की मर्यादा की सुरक्षा का जिन पर दायित्व है वे श्रीहरि पधारते हैं और तब वे स्वयं यह भार दूर करने की व्यवस्था करते हैं! सेना का भार तो युद्ध सैनिकोंं और उनके उन्मादी शासकों के विनाश के बिना तो दूर नहीं हो सकता ! कोई प्रबल सैन्य शक्ति सम्पन्न शासक अपनी सैन्य शक्ति का विसर्जन करना स्वेच्छापूर्वक तो कभी स्वीकार नही करता, भले ही उसका कोई प्रतिस्पर्धी न रह गया हो और उसके लिए आतंक या आशंका का कोई कारण न रह गया हो ! वह अपने को औरों का स्वघोषित स्वयम्भू संरक्षक बना लेता है और अपनी सैन्यशक्ति बनाये रखने अथवा बढ़ाते जाने के कल्पित कारण गढ़ता जाता है!
परमेश्वर के लिए अपना पराया कभी कोई कैसे हो सकता है! उनको तो भूभार दूर करना होता है! तभी तो वासुदेव यादव-वाहिनी को निमित्त बनाते हैं और अन्त में पारस्परिक संघर्ष के द्वारा उस अजेय वाहिनी का भी विसर्जन कर देते हैं!
भूदेवी जड़ तो नहीं है! सच तो यह है कि जड़ता भ्रम है! सम्पूर्ण सृष्टि एक सच्चिादानन्द परमात्मा में ओत-प्रोत है! परमात्मा ही इस सृष्टि के रूप में आभासित हो रहा है! इसमें जड़ तत्व केवल भ्रम से प्रतीत होते हैं! उस सच्चिादानन्द की प्रकृति ही ऐसी है कि उसकी सत्ता घनीभूत होकर तमोगुणी प्रतीत होने लगती है और उसमें जड़ता का भ्रम होने लगता है! जैसे समुद्र की अत्यधिक गहराई के कारण सफेद जल नीला दिखने लगता है व आकाश के असीमित विस्तार के कारण आकाश नीला दिखायी देता है!
हमारा यह देह जड़ है, ऐसा प्रतीत होता है; किन्तु देह में क्या जड़ है ? सम्पूर्ण देह क्या अरबों छुद्र कणप्राय जीवों का समुदाय नहीं है ? प्रत्येक तत्व जिन्हें जड़वादी जड़ मानते हैं, केवल शरीर हैं! पृथ्वी, जल, वायु आदि के दृश्य पञ्चीकृत रूप उनके शरीर हैं और उनके अधिदेवता उन शरीरों में चेतन हैं, ठीक वैसे ही जैसे अपने शरीर में हम अपने को चेतन जानते हैं!
भूदेवी चेतन हैं, अत: उनमें भी अनुभूति है और अनुभूति है तो उनके शरीर-धरा पर रहने वाले प्राणी जो कुछ करते हैं,उसमें उनको प्रिय अप्रिय का अनुभव होता है!
सभी प्राणी भगवती धरा की सन्तान ही तो हैं ?
हाँ, किन्तु जब माता का एक पुत्र अपने दूसरे भाइयों को उत्पीड़ित शोषित, आतंकित करने लगता है तो उसका अन्याय अत्याचार माता के मन का भार बन जाता है और माता किसी भी प्रकार उसके अत्याचार से अपने शेष पुत्रों की रक्षा को व्याकुल हो उठती है!
परोत्पीड़क, अधर्म-परायण असुर पृथ्वी के भार हैं! धर्म या अधर्म घट बढ़ नहीं सकते क्योंकि ये दोनों ही विराट स्वरूप श्रीहरि के गुणात्मक अंग ही हैं! धर्म यदि उनका हृदय है तो अधर्म उनका पृष्ठ देश है! होता यही है कि इनकी सघनता घटती-बढ़ती रहती है!
सत्व, रज और तम ये त्रिगुण प्रकृति में घटते-बढते नहीं! इनकी कुल मात्रा सदा समान रहती है; किन्तु प्रलय के समय ये साम्यावस्था में रहते हैं! सृष्टि के समय इनका तारतम्य बदलता रहता है! कहीं एक प्रबल होता है कभी और कहीं दूसरा! पाप-पुण्य, धर्म-अधर्म सब त्रिगुणात्मक हैं, अत: इनकी मात्रा घट या बढ़ कैसे सकती है ? केवल इनका तारतम्य परिवर्तित होता रहता है!
पाप के धरा पर बढ़ने का अर्थ है कि तमोगुण कहीं किसी विशिष्ट वर्ग के तमोन्मुख अधिकांश मानवों में ही केन्द्रित होकर सघनीभूत हो गया है! इससे सत्वगुण की व्यापकता घट गयी है और वह थोड़े से विशिष्ट व्यक्तियों में अधिक सघन हो गया है!
यही अवसर परम प्रभु के अवतीर्ण होने का होता है! अधिक सघन प्रबल सत्वगुण अन्त:करण को शुद्ध कर देता है और तब उसमें अन्तर्मुखता, अन्तर्यामी वासुदेव का सानिध्य स्पष्ट हो जाता है! जन्म-जन्म के संस्कारों के अनुसार ऐसे शुद्धान्त:करण वाले लोग योग, ज्ञान या उपासना का मार्ग अपनाने लगते हैं!
प्राय: सर्वत्र व्याप्त तमोगुण प्रधान रजोगुण- जिनमें ये व्याप्त हैं, ऐसे लोगों को सत्वगुण /शुद्ध सत्वगुण भला कैसे सहन हो सकता है ? फलत: उनके द्वारा वे साधक-संत पीड़ित होने लगते हैं! उन पर अत्याचार होने लगता है! आसुरीजन सात्विकों का समूलोन्मूलन करने पर उतारू हो जाते हैं! उनका यह उत्पीड़न भगवती धरा को अपने ‘श्रेष्ठतम’ सर्वाधिक प्रिय पुत्रों की पीड़ा असह्य हो उठती है! यह धरा का सबसे असह्य भार है!
विशुद्ध सात्त्विक शुद्धान्त:करण जनों में जो योगी हैं, ज्ञानी हैं, उन्हें सुरक्षा चाहिए! भले वे अपने शरीर से निरपेक्ष हों और देह का मानापमान, देह की पीड़ा उन्हें व्यथित न करती हो लेकिन सर्वेश्वर को उनकी सुरक्षा सबसे अधिक आवश्यक लगती है! क्योंकि "योग क्षेम वहाम्यहम्" उनका संकल्प है!
जो धर्मवान लोग शुध्द अंतःकरण होने पर पुरुषार्थी बन जाते हैं , पूर्व के संस्कार जिन्हें तप यज्ञादि में लगा देते हैं- वे अपने धर्म की रक्षा के आग्रही होते हैं और उनका तप यज्ञ इन आसुरी जनों को सबसे अधिक असह्य होता है!क्योंकि योगी ज्ञानी तो आत्मरत, आत्मतृप्त, एकान्तप्रिय निरपेक्ष होते हैं! उन्हें कोई कैसे रहता है या रहे, इसकी चिन्ता ही नहीं होती! सब अपना स्वरूप या सब भगवन्मय हैं तो उसमें पापी, असुर या पुण्यात्मा क्या ? अत: ऐसों की असुर भी उपेक्षा कर सकते हैं, किन्तु धार्मिक कार्मिकों का यज्ञ-तप सीधे असुरता पर, तमोगुण पर आघात करता है,अत: इस वर्ग को सबसे अधिक उत्पीड़ित होना पड़ता है और यह चुपचाप सहन नहीं कर पाता ! वह पुकारता है आर्तनाद करता है सर्वेश्वर को! उनके आह्वान की उपेक्षा भला कब तक परमात्मा कर सकता है?
सबसे बड़ी बात !
जब सत्वगुण धर्मप्राण अन्त:करणों में प्रबल होता है, जन्म-जन्म का पुण्योदय और भगवत्कृपा का संयोग होता है, तब जगदम्बा माँ भगवती भक्ति देवी उन अंतःकरणों में स्थायी रूप से निवास करने लगती हैं! फिर उन महात्मजनों से परमात्मा का संबंध स्थापित हो जाता है, ऐसे महाभाग जब आग्रह करते हैं तब वह सर्वश्वेश्वर उनके अनन्त प्रेमार्णव से विवश हो जाता है और ऐसे महाभागवतों पर असुरता दृष्टि उठावे- यह उसे भी असह्य हो जाता है! भगवती धरित्री को ऐसे जन अपने चरण स्पर्श से धन्य करते हैं, उन पर विपत्ति आवे- धरा के लिए यह भार सर्वथा ही असह्य हो जाता है!
फिर मंगलमूर्ति प्रभु नारायण का अवतरण इस धरती का भूभार हरण करने हेतु सुनिश्चित हो जाता है!
जय श्री नारायण हरि !
बोलो आनंदकंद नारायण श्रीहरि की जय !