13/01/2024
श्री राम जी के कारसेवक
19 अक्टूबर 1990
सीकर, राजस्थान
"सौगंध राम की खाते हैं...
मंदिर वहीं बनाएंगे...!"
"सौगंध राम की खाते हैं...
मंदिर वहीं बनाएंगे...!"
"बच्चा बच्चा राम का...
जन्मभूमि के काम का...!"
"बच्चा बच्चा राम का...
जन्मभूमि के काम का...!"
राजस्थान के सीकर से, अयोध्या जी जाने के लिए, 252 राम भक्त, जब रात को तैयार हो रहे थे, तो ये नारे ही चहुं ओर गुंजायमान हो रहे थे, ये वो समय था जब देश में "जय श्री राम" बोलना और लिखना अपराध माना जाता था, परंतु ये वो समय भी था, जब मंडल कमीशन द्वारा फूट डालने के प्रयास के बावजूद, सभी रामभक्त एकात्म हो चुके थे, उनके मन में जातिवाद कहीं दूर दूर तक नहीं था, कौन ऊंचा कौन नीचा, कौन वैष्णव कौन शैव, कौन अमीर, कौन गरीब, कोई फर्क नहीं...
वो उस समय मात्र सनातनी थे... राम भक्त थे... प्रभु श्री राम के सेवक थे... उनकी बस एक ही पहचान थी... "कारसेवक..."
ये 252 कारसेवक, घर से निकले थे, एक प्रण के साथ, प्रण अपने प्राण न्यौछावर कर, श्री राम लला की जन्मभूमि को विधर्मी कब्जे से मुक्त कराने का!
वो अनाधिकृत कब्ज़ा जो 7वीं सदी से विदेशी आक्रांताओं ने प्रयास करते करते, मल्लेच्छों ने 14वीं सदी में हासिल किया, इस बीच न जाने कितनी बार मंदिर की मूर्तियों को तोड़ने का प्रयास हुआ, कभी सफल हुए, कभी असफल, क्योंकि अवध के राजाओं, साधु संतों, जागृत हिंदू समाज ने बारंबार, प्राणों का बलिदान देकर, मंदिर को मल्लेछों के कब्ज़े में जाने से रोक रखा था। वो ही कब्ज़ा बाबर के एक गुलाम ने बाबर के आदेश पर हासिल किया और अगले 500 वर्षों तक, श्री राम लला को उनके भक्तों से दूर कर दिया।
जिस मंदिर के लिए असंख्य नागा साधुओं ने विधर्मी सेनाओं से युद्ध किया था, जिसके लिए मुगल काल में अयोध्या अवध क्षेत्र के गांव के गांव कुछ रातों में ही शमशान भूमि में परिवर्तित हो गए, 1 लाख 77 हज़ार से भी अधिक सनातनियों ने अपने प्राण न्यौछावर कर दिए थे, अयोध्या जी के लिए, उनके निर्जीव शवों के अंबार से अवध क्षेत्र के कई हिस्से पट गए थे... केवल छोटे बच्चे, बचे थे और बूढ़ी दादी या नानी... युवा और बुजुर्ग पुरुष चुन चुन कर मार दिए गए थे, मल्लेछ सेनाओं की सोच थी, जब श्री राम के लिए, लड़ने वाला एक भी युवक नहीं बचेगा, तो श्री राम की भक्ति कौन करेगा, सब श्री राम को भूल जाएंगे...
पर उन्हीं बची हुई बूढ़ी दादियों और नानियों ने अपने नवजात पोते पोती, नाती नतीनियों को श्री राम को भूलने नहीं दिया...
प्रण लिया, पैरों में चमड़ों के जूते नहीं पहनेंगे... पगड़ियां नहीं लगाएंगे... और 9 पीढ़ियों तक नहीं पहने...
जब विधर्मी अवध से श्री राम की पूजा अर्चना रोक नहीं पाए तो दूर राजस्थान से कैसे कर पाते भला? और 19 अक्टूबर की इस रात को केवल राजस्थान से नहीं, अपितु गुजरात, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, बिहार, दिल्ली, कर्नाटक, बंगाल, आंध्रप्रदेश, उड़ीसा, लगभग प्रत्येक राज्य से रामभक्तों ने उस कब्जे को हटाने के लिए, अपने अपनों को त्यागा, अपने घर, अपने गांव, अपनी ज़मीन, अपनी भाषाई अंतर को त्यागा, जात पात, एकज द्विज के भेदभाव को त्यागा... क्योंकि मंदिर को बनाना था... ढांचे को हटाना था...
उसी मंदिर में अपने प्रभु श्री राम लला को बैठाना था...
तब न आज के स्मार्ट मोबाइल फोन का आविष्कार हुआ था, ना आज की भांति सोशल मीडिया से एकजुट करने वाले माध्यम का अस्तित्व था, बस दूरदर्शन और अखबार था, जो पूरी तरह सरकारों के और सरकारों के सेक्युलर अधिकारियों के कब्जे में था, लेकिन तब भी राम काज की गूंज सैकड़ों किलोमीटर तक पहुंची और लोग निकल पड़े, गुड़ चना लिए, पता नहीं था, पहुंचेंगे भी कि नहीं, पहुंचेंगे भी तो, जो काज करने का प्रण लिया है, वो पूरा कर पाएंगे या नहीं, पर ये सब सोचने का समय ही कहां था? बस जब भी मन में कोई नकारात्मक विचार आता, कारसेवक "जय जय श्री राम" के नारे या सीताराम सीताराम का जाप करने लग जाते, ट्रेन में, बस में, ट्रकों में सामूहिक रूप से हनुमान चालीसा का पाठ हो रहा था।
हर सनातनी के पास तब कोई कैमरा नहीं था, उस सबको रिकॉर्ड करने हेतु, नहीं तो वो आज के दौर के सोशल मीडिया पर, नंबर वन ट्रेंडिंग कर रहा होता। उन् रामभक्तों को आज के लाइक्स के इस आभासी संसार का कोई अंदाजा नहीं था, उन्हें तो तबके अखबारों और नेशनल न्यूज में भी अपना नाम नहीं चाहिए था, उन्हें किसी पार्टी में सीट नहीं चाहिए थी, उन्हें पैसा और प्रसिद्धि नहीं चाहिए थी, उन्हें चाटुकारों से चरणवंदना नहीं चाहिए थी, उन्हें गले में माला फूल नहीं चाहिए थे...
उन्हें बस, उनके राम चाहिए थे...
उनके राम, जो सबके राम थे...
उन रामभक्तों में बस एक चाह थी, उनके राजा श्री राम लला को उनका अधिकार पुनः वापस दिलाने की चाह, उनके राजा राम को उन्हीं की अयोध्या में पुनः सम्मान सहित, लाने की चाह, श्री राम को पाने की चाह, श्री राम का हो जाने की चाह...
सनातनी हिन्दू राकेश, [13/01/2024, 19:54]
उनके विरुद्ध मल्लेच्छ भी थे, मल्लेच्छ प्रेमी पार्टियां, सिस्टम और सरकारें भी थीं, मल्लेछों के प्रभाव को बढ़ावा देने वाली मकैले शिक्षा व्यवस्था द्वारा फैलाया भ्रमजाल भी था, और सनातन विरोधी एजेंडे के तहत काम करती बॉलीवुड इंडस्ट्री का वर्षों से किया ब्रेनवॉश भी, एक ऐसा मीठा ज़हर जो सेक्युलर हिंदुओं की रग रग में इतना रच बस गया था, कि वो अपने ही आराध्य की जन्मभूमि को पाने के इच्छुक ही न थे।
वो हिंदू मुस्लिम, भाई भाई के उसी आत्मघाती नैरेटिव की गुलामी कर रहे थे, जो सुसाइडल नैरेटिव मुगल प्रेमी कांग्रेस सरकारों ने उनकी रगों में, भर दिया था, इतना भर दिया था, कि अयोध्या के सेक्युलर हिंदू बाबरी के ढांचे के नीचे मौजूद साक्ष्य होने की बातों को ही नकारते थे और कहते थे, वहां मंदिर कभी था ही नहीं, हम तो सालों से हिंदू मुस्लिम साथ साथ खुशी खुशी रह रहे हैं।
परंतु उन भ्रमित हो चुके हिंदुओं से कोई ये नहीं पूछता था कि, हिंदुओं की आस्था के इन तीन प्रमुख केंद्रों, काशी, मथुरा और अयोध्या जी में उनके इन मुस्लिम भाईजानों की भारी भरकम संख्या, आई कहां से और कब?
क्यों इनकी मस्जिदें उन्हीं स्थानों पर बनी, जहां मुगल और अंग्रेज़ इतिहासकारों ने भी मंदिर होने की बातों को तथ्यों एवं चित्रों सहित लिखा था?
जहां ये लिखा था, कि मल्लेच्छों के आकाओं ने इन तीनों प्रमुख स्थानों पर मौजूद भव्य मंदिरों पर बारंबार आक्रमण किया, और कहीं मंदिरों के गर्भ गृह के ऊपर मस्जिद बनाई, कहीं मुख्य मंदिरों की मूर्तियों को तोड़कर, निकालकर अपनी मस्जिदों की सीढ़ियों में दबा दिया। कहीं शिव लिंग के पास पैखाना बना दिया और उसे डुबो कर, हाथ पैर धोने, कुल्ला करने का स्थान बना दिया!
वो अपमान पर अपमान करते रहे और हम अपने ही कसाइयों को भाई भाई और "बाबर द ग्रेट", "अकबर द ग्रेट" "औरंगजेब द ग्रेट", "ग्लोरियस मुगल पीरियड" कहते रहे...!
ये लोग सच तब भी नहीं पढ़ते थे, ये ही लोग सच अब भी पढ़ने से कतराते हैं...!
दिग्भ्रमित सेक्युलर हिंदू समाज तब इस अभियान के ही विरुद्ध खड़ा हो चुका था, वो कहता था ये एक शत प्रतिशत राजनीतिक मुद्दा है, जिसके चलते दंगे होंगे और हिंदू मारे जाएंगे, उनको अपने अधिकारों के लिए लड़ना फिज़ूल लगता था, वो अपने आराध्यों की जन्मभूमि में मुस्लिम आधिपत्य को स्वीकार कर चुके थे और कांग्रेस को ही अपना माई बाप समझते थे, उस समय की सरकारों के चाटुकार पत्रकारों ने ऐसे दिग्भ्रमित हिदुओं का इंटरव्यू लेकर, कई ऐसी डॉक्यूमेंट्री, लेख और खबरें बनाई जो सीधे सीधे जागृत हिंदुओं को मूर्ख, अंधा और एक पार्टी के इशारों पर नाचता, लड़ता, मारने की बात करता हिंदू आतंकवादी बताने का प्रयास करती थीं। वो खबरें, लेख और वीडियो कोई आज का युवा भी पढ़, देख ले, तो उसे जागृत हिंदुओं की ये गौरव यात्रा, बेकार की लगेगी और "मुझे हिंदू होने पर शर्म आती है" जैसे नैरेटीव को नव खाद मिलेगी।
ये वही हिंदुओं में शत्रुबोध को सुला कर, अपराधबोध जगाने वाले नैरेटिव था, जो तब का सारा मल्लेछ समाज फैलाता था, वही नैरेटिव, जो आज का ओवैसी और ओवैसी प्रेमी छिपा हुआ कांग्रेसी हिंदू फैलाता रहता है।
सेक्युलर हिंदुओं और आत्मघाती अपराधबोध से ग्रस्त हिंदुओं को तब भी बस ये एक राजनीतिक मुद्दा लग रहा था, परंतु ये मात्र एक राजनीतिक मुद्दा नहीं था, ना है, ना होगा, ये वो काज था, जो अपने होने की वर्षों से प्रतीक्षा कर रहा था, और एक राजनैतिक पार्टी का उदय उस शक्ति की एक लीला भर थी... ये राजनीतिक पार्टी बस एक माध्यम बनी, ये संगठन, ये जागृत सनातन एकता बस एक माध्यम बने, इस रामकाज के जो होना ही होना था...
20 अक्टूबर 1990
गाज़ियाबाद, उत्तरप्रदेश
सुबह सीकर से निकले 252 राम भक्त चले थे, किसी तरह गाजियाबाद पहुंचे, चारों तरफ पुलिस लगी हुई थी, जिसके पास भी गुड़ चना, तुलसी माला या राम नामी मिलती उन्हें खुली जेलों में, विद्यालयों में भर दिया जाता, गायब कर दिया जाता। कारसेवकों को विश्व हिंदू परिषद के श्री अशोक सिंघल जी का आदेश था, जो उस समय राजस्थान के क्षेत्र प्रचारक सोहन सिंह जी ने दोहराया "चाहे सो कर जाना, बैठकर जाना, लेटकर जाना, जाना अयोध्या जी है। रास्ते में अनेक बाधाएं आएंगी, उन सबको पार करते हुए आपको अयोध्या जी पहुंचना है।" इस आदेश का पालन करने हेतु, प्रत्येक कारसेक ने कोई कसर नहीं छोड़ी...
22 अक्टूबर 1990
लखनऊ, उत्तरप्रदेश
सीकर से चले 252 कारसेवकों में से मात्र 64 कारसेवक ही लखनऊ पहुंच पाए, बाकी 200 कब कहां पुलिस द्वारा, कौन से स्टेशन पर पकड़ लिए गए, पता नहीं चला...
सनातनी हिन्दू राकेश, [13/01/2024, 19:54]
बचे 64 कारसेवक किसी तरह छुपते छिपाते लखनऊ भाजपा के कमलापति त्रिपाठी के यहां किसी तरह ठहरे, वहां से निकले अलग अलग जत्थों में, फिर गिरफ्तार हुए, कौन कहां कब गिरफ्तार कर लिया जा रहा था, किसी को खबर ही नहीं पहुंच रही थी, एक एक करके सैनिक जैसे युद्ध में गिरते जाते हैं, और बाकी बचे युद्ध लड़ते जाते हैं, बस वैसा ही माहौल था उस समय, पूरे देश में, खासकर उत्तर प्रदेश में।
मुलायम ने अपने कोर वोटर विधर्मी पक्ष को खुश रखने के लिए, ऐलान कर रखा था कि अयोध्या जी में "एक परिंदा भी पर नहीं मार सकता", पर ये राम भक्त कहां सुनने वाले थे? ये वानर सेना कहां डरने वाली थी, उन्होंने तो अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया था, अपने प्रभु को, अब जो होगा, उनकी इच्छा, एक ही भावना थी, उनका काज करने में प्राण भी चले जाएं तो जाएं, किसी का वध करना पड़े तो करेंगे, जेल जाना पड़े तो जाएंगे, फांसी पर चढ़ जाएंगे, गोली खाएंगे पर अयोध्या जी जाएंगे, जो प्रण लिया है वो पूरा करेंगे। सारे यात्री वाहन बंद हो चुके थे, कोई साधन नहीं था, चारों तरफ़ फोर्स लगी हुई थी, गांवों से, खेतों से पैदल पैदल, सब अपने लक्ष्य की ओर भूखे प्यासे, बिना रुके, चलते हुए ये ही जयकारा, बार बार अपनी और बाकी बचे सबकी हिम्मत बढ़ाने को लगाते थे, "राम लला हम आएंगे, मंदिर वहीं बनाएंगे..!"
"बाधा सभी हटाएंगे, मंदिर वहीं बनाएंगे...!"
"राम लला हम आएंगे, मंदिर वहीं बनाएंगे...!"
29 अक्टूबर 1990
100–100 किलोमीटर पैदल चल कर ये जत्था, तमसा नदी पार करके अकबरपुर के आगे के गांवों तक पहुंचा, कुछ जागृत गांव वाले रामभक्तों के रक्त में उबाल लाने वाले नारों को सुन, कई किलोमीटर से भूखे प्यासे, पैदल चले आ रहे राम जी के इन कारसेवकों को पूड़ी आलू, पूड़ी हलवा खिला देते थे, बड़े बुजुर्ग गांव वाले युवा कारसेवकों के पैर छूते थे और उसमें सरसों के तेल से मालिश करते थे, महिलाएं लगातार कारसेवकों के जत्थों के लिए पूड़ी सब्जी बनाए जा रही थीं, आरती उतारी जा रही थी, तिलक लगाया जा रहा था, अपने गांव से भर्ती हुए पुलिस के सिपाहियों को उन्हें पकड़ने और उनकी सूचना देने से रोक लेते थे, उन्हें अपने अपने घरों में सुलाते थे, पर कुछ ऐसे भी थे जो इस समय भी मुखबरी कर राम जी के कारसेवकों को पकड़वा रहे थे, क्योंकि उन्हें लगता था कि मुगल प्रेमी सरकारों और अधिकारियों को खुश करके उन्हें कोई पद, कुछ पैसा और सेक्युलर समाज में सम्मान मिलेगा, और सेक्युलर हिंदू समाज ने इन गद्दारों को, वो सबकुछ दिया भी...
अपनों के इस विश्वासघात के कारण, सीकर से चले 252 कारसेवकों में से मात्र 24 ही सुरक्षित अयोध्या जी के बॉर्डर पर पहुंचे, अब पहुंचना था अयोध्या जी, पुलिस पहरा चहुं ओर था, सरकारी मुखबिर लकड़बग्घों की भांति घात लगाए बैठे थे, किसी ने कहा उन्हें मिट्टी में जाना है, किसी ने कहा विवाह में, किसी ने कहा पंचकोसी परिक्रमा करने जाना है, अयोध्या जी के कुछ जागृत सनातनियों ने इन अंजान रामभक्तों को अपना बेटा बताया, किसी ने मामा चाचा बताया और अपने घरों में आश्रय दिया, तब न भाषाई अंतर देखा गया, ना ये देखा गया कि कौन किस जाति का है, अगड़ा है कि पिछड़ा, सब बराबर थे तब, सनातनी पहले, हिंदू पहले, जाति बाद में...
30 अक्टूबर 1990
"मारेंगे मर जाएंगे
"मंदिर वहीं बनाएंगे"
"तेल लगाकर डाबर का
नाम मिटा दो बाबर का"
देव उठावनी एकादशी की सुबह 8 बजे तक, तब के उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव को ये सूचना दी गई थी कि सन्नाटा है अयोध्या में।
और उसके तुरंत बाद, डॉक्टर की वेशभूषा में अयोध्या जी की भूमि में प्रवेश कर चुके श्रद्धेय अशोक सिंघल, ऊमा भारती समेत साध्वी ऋतम्भरा और पूर्व डीजीपी श्री चंद्र दीक्षित जी की अगुवाई में, हज़ारों राम भक्तों का जुलूस इन्हीं नारों को लगाता हुआ, श्री राम जन्मभूमि की ओर कूच करने लगा...
पुलिस जहां रोकती, वहीं ज़मीन पर बैठ, हनुमान चालीसा का पाठ शुरू कर देते कारसेवक, और पुलिस वालों के पैर छूने लगते, पुलिस पीछे हटती, कारसेवक, "जय श्री राम" का नारा लगाकर आगे बढ़ते जाते।
कई कारसेवकों को पुलिस द्वारा बसों में भरा जाने लगा, तभी कहीं से एक साधु जी पुलिस की बस पर कब्ज़ा किया और बैरिकेड तोड़ते हुए बस को राम जन्मभूमि के पास तक ले गए, जहां वो ढांचा सनातनियों का अपना करता खड़ा था, कोठरी बंधुओं ने देखते देखते 30 फीट ऊंचे गुम्बद पर, वानर की भांति चढ़ाई करी और भगवा ध्वज फहरा दिया।
चहुं ओर "जय जय सियाराम" का उद्घोष हुआ, सांकेतिक कारसेवा सम्पूर्ण हुई, शाम तक चहुं ओर उत्सव का माहौल था, हर घर पर दीप जल रहे थे...
पूरी अयोध्या राम मय थी...
31 अक्टूबर और 1 नवंबर 1990
सनातनी हिन्दू राकेश, [13/01/2024, 19:54]
मुलायम सिंह क्रोध से तिलमिला रहा था, उसने कारसेवकों की खाद्य सामग्री की आपूर्ति को न सिर्फ़ बंद करवाया, अपितु हज़ारों खाद्य सामग्री के पैकेट से भरी ट्रक को सरयू के पुल पर जलवा दिया, ताकि कारसेवक भूखें रहें और उनका मनोबल टूट जाए, पर वो कहां टूटने वाला था, वो तो और बढ़ गया। महंत नित्य गोपालदास जी, सत्यमित्रानंद गिरी जी, राम चंद्र परमहंस जी और अशोक सिंघल जी सहित कई पूज्य संतों ने मनोबल गिरने नहीं दिया अपने व्यक्तव्यों से, और निर्णय हुआ कि आगामी 2 नवंबर को शासन से पुनः कार सेवा करने की अनुमति मांगी जाएगी, पता था हिंसा होगी क्योंकि मुख्यमंत्री मुलायम सिंह की प्रवृति से सभी परिचित थे और उन्हें पता था, विधर्मी पक्ष को प्रसन्न करने हेतु वो किसी भी हद्द तक जा सकता है। सीकर से चले इस जत्थे के प्रमुख कारसेवक रवींद्र जाजू जब सरयू नदी में अपने साथियों संग स्नान कर रहे थे, तो उनके पैरों से कुछ टकराया, देखा तो साधुओं के शव थे, उन्हें किसी तरह निकाल कर, ठेले पर ले जाकर उनका दाहसंस्कार किया गया, कितनी लाशें सरयू जी में दबा दी गई थीं इस बीच, कहना मुश्किल था...!
2 नवंबर 1990
श्री राम जी के कारसेवकों के दो जत्थे, मणिराम जी की छावनी, लालकोठी और हनुमानगढ़ी चौक होते हुए श्री राम जन्मभूमि की ओर प्रस्थान कर चुके थे, कि लाल कोठी के पास एक जत्थे के ऊपर आंसू गैस के गोलों से वार होना और लाठियों से पीछे खदेड़ना आरंभ हो गया, कारसेवक भी अपने नेताओं के आदेश अनुसार गोलों को पकड़ते और पास की नाली में डूबो देते ताकि उसका प्रभाव कम हो जाए, आंसू गैस के गोलों से सांस लेना मुश्किल हो रहा था तो आस पास के घर वाली महिलाएं और बच्चे इस जत्थे को पानी दे रहे थे, कि तभी मदद कर रही अयोध्या जी की इन निर्दोष महिलाओं और बच्चों पर मुलायम की पुलिस ने फायरिंग शुरू कर दी, कई महिलाएं घायल हुईं, कई महिलाओं बच्चों ने वहीं गली में अपने प्राण त्याग दिए।
सीआरपीएफ के डिप्टी कमांडेंट उस्मान अली ने सीआरपीएफ के जवानों को भड़काने के लिए, चिल्लाना शुरू कर दिया,"फोर्स फंस गई, फोर्स फंस गई" दूसरी ओर अयोध्या जी के डीएम रामशरण श्रीवास्तव कहते रह गए, "स्टॉप फायरिंग स्टॉप फायरिंग"। पर उस्मान अली के बहकावे में आकर, सीआरपीएफ ने मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के आदेश का पालन करना आरंभ कर दिया और पूरी अयोध्या गोलियों और कारसेवकों की चीत्कारों से, गूंज गई.!!
जोधपुर से आए सेठाराम परिहार की नृशंस हत्या की गई उनके मुंह में गोली चलाकर, अपनी बहन के विवाह में लौटने की बात कहकर सैकड़ों किलोमीटर से पैदल चलकर आए, ढांचे पर भगवा ध्वज फहराने वाले युवा कोठारी बंधुओं को पुलिस ने घरों से बाहर निकाला, और छतों से घात लगाकर शरद कोठारी और रामकुमार कोठारी की गोली मारकर हत्या कर दी, दोनों भाइयों के आखिरी शब्द थे... "जय सियाराम, जय सियाराम"
जोधपुर के कारसेवक प्रोफेसर महेंद्र नाथजी अरोड़ा की गोलियों के पेट में धसने के कारण आंतें बाहर आ गईं थीं, पर उनकी जिजीविषा थी कि अपनी आंतों को टी शर्ट से बांधे वो सीटी बजाकर बजाकर, साथी कारसेवकों को सुरक्षित करने का प्रयास करते रहे।
जो कारसेवक बचे, उनका शरीर काला नीला पड़ गया था, लाठियों की मार से, कितने मरे किसी को कोई अंदाज़ा नहीं, ना जाने कितने कारसेवकों के शव अकबरपुर में कुछ दिन बाद मिले और उनका गांव वालों ने अंतिम संस्कार कर दिया, कितनों का लावारिस शव के नाम पर, पुलिस ने सरयू किनारे ही रात के अंधेरे में सामूहिक रूप से जला दिया...
बेटे घर नहीं पहुंचे, पति लौटे नहीं, पिता की गोद को कई बच्चे तरसते रहे, ये बलिदान यहीं नहीं रुका, जो जो कारसेवक अपने अपने घर लौटे उन्हें मल्लेछों ने टारगेट करके, राजस्थान, आंधप्रदेश, उत्तरप्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात में मारा, पाकिस्तान और इंदिरा गांधी द्वारा बनाए इस्लामिक बांग्लादेश में कई मंदिर ध्वस्त कर दिए गए, हजारों सनातनियों को वहां भी मारा गया...
पर हम सब भूल गए... हमें सब भुला दिया गया...
हमें इन 33 वर्षों से अधिक समय में बार बार शर्मिंदा किया गया, अपमानित किया गया, हमें अपने अधिकारों की मांग करने के लिए, कोर्ट परिसर के चक्कर काटने पर कटाक्ष किया गया, हमें मंदिर की जगह स्कूल, कॉलेज, हॉस्पिटल और मस्जिद तक बनाने का सुझाव सुझाया गया, हमारे मन मस्तिष्क को इस अभियान से जुड़े नेताओं, कारसेवकों और साधु संतों के विरुद्ध भड़काया गया, ताकि हम बंट जाएं, पुनः जातीय, भाषाई, आर्थिक भेद के चलते एक दूसरे से दूर हो जाएं, एक दूसरे के विरोधी हो जाएं और उनका लक्ष्य वहां मंदिर तोड़ कर, पुनः बाबरी मस्जिद बनाने का पूरा हो... गज़वा ए हिंद का ख्वाब पूरा हो...
अब ये हम पर और हमारी अगली पीढ़ी पर निर्भर करता है, कि क्या हम पुनः अपने शत्रुओं के द्वारा ब्रेनवॉश होकर, अपनी ही संस्कृति, अपनी ही सनातन परंपरा अपने ही नायक श्री राम की जन्मभूमि के विरुद्ध खड़े होंगे?
सनातनी हिन्दू राकेश, [13/01/2024, 19:54]
या इस नारे को चरितार्थ करेंगे, और उन बलिदानी श्री राम जी के कारसेवकों के प्रण को पूर्ण करेंगे...
अयोध्या जी तो बस झांकी है... काशी मथुरा बाकी है...!
हर हर महादेव🚩
जय जय श्री राम🚩
जय जय श्री कृष्ण🚩
#साभार: तत्वज्ञ देवस्य