I shree Khodiyar Mandir Sundan

I shree Khodiyar Mandir Sundan Hindu Temple

26/01/2024
पांच सदियों तक प्रतीक्षा के बाद आज प्रभु श्री राम के प्राणप्रतिष्ठा देखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है, निश्चित ही पिछले जन...
22/01/2024

पांच सदियों तक प्रतीक्षा के बाद आज प्रभु श्री राम के प्राणप्रतिष्ठा देखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है, निश्चित ही पिछले जन्मों के पुण्यफल प्राप्त हुआ है।
तो जोर से बोलिए जय श्री राम।।

श्री राम जी के कारसेवक19 अक्टूबर 1990सीकर, राजस्थान"सौगंध राम की खाते हैं...मंदिर वहीं बनाएंगे...!""सौगंध राम की खाते है...
13/01/2024

श्री राम जी के कारसेवक

19 अक्टूबर 1990
सीकर, राजस्थान

"सौगंध राम की खाते हैं...
मंदिर वहीं बनाएंगे...!"
"सौगंध राम की खाते हैं...
मंदिर वहीं बनाएंगे...!"

"बच्चा बच्चा राम का...
जन्मभूमि के काम का...!"
"बच्चा बच्चा राम का...
जन्मभूमि के काम का...!"

राजस्थान के सीकर से, अयोध्या जी जाने के लिए, 252 राम भक्त, जब रात को तैयार हो रहे थे, तो ये नारे ही चहुं ओर गुंजायमान हो रहे थे, ये वो समय था जब देश में "जय श्री राम" बोलना और लिखना अपराध माना जाता था, परंतु ये वो समय भी था, जब मंडल कमीशन द्वारा फूट डालने के प्रयास के बावजूद, सभी रामभक्त एकात्म हो चुके थे, उनके मन में जातिवाद कहीं दूर दूर तक नहीं था, कौन ऊंचा कौन नीचा, कौन वैष्णव कौन शैव, कौन अमीर, कौन गरीब, कोई फर्क नहीं...

वो उस समय मात्र सनातनी थे... राम भक्त थे... प्रभु श्री राम के सेवक थे... उनकी बस एक ही पहचान थी... "कारसेवक..."

ये 252 कारसेवक, घर से निकले थे, एक प्रण के साथ, प्रण अपने प्राण न्यौछावर कर, श्री राम लला की जन्मभूमि को विधर्मी कब्जे से मुक्त कराने का!

वो अनाधिकृत कब्ज़ा जो 7वीं सदी से विदेशी आक्रांताओं ने प्रयास करते करते, मल्लेच्छों ने 14वीं सदी में हासिल किया, इस बीच न जाने कितनी बार मंदिर की मूर्तियों को तोड़ने का प्रयास हुआ, कभी सफल हुए, कभी असफल, क्योंकि अवध के राजाओं, साधु संतों, जागृत हिंदू समाज ने बारंबार, प्राणों का बलिदान देकर, मंदिर को मल्लेछों के कब्ज़े में जाने से रोक रखा था। वो ही कब्ज़ा बाबर के एक गुलाम ने बाबर के आदेश पर हासिल किया और अगले 500 वर्षों तक, श्री राम लला को उनके भक्तों से दूर कर दिया।

जिस मंदिर के लिए असंख्य नागा साधुओं ने विधर्मी सेनाओं से युद्ध किया था, जिसके लिए मुगल काल में अयोध्या अवध क्षेत्र के गांव के गांव कुछ रातों में ही शमशान भूमि में परिवर्तित हो गए, 1 लाख 77 हज़ार से भी अधिक सनातनियों ने अपने प्राण न्यौछावर कर दिए थे, अयोध्या जी के लिए, उनके निर्जीव शवों के अंबार से अवध क्षेत्र के कई हिस्से पट गए थे... केवल छोटे बच्चे, बचे थे और बूढ़ी दादी या नानी... युवा और बुजुर्ग पुरुष चुन चुन कर मार दिए गए थे, मल्लेछ सेनाओं की सोच थी, जब श्री राम के लिए, लड़ने वाला एक भी युवक नहीं बचेगा, तो श्री राम की भक्ति कौन करेगा, सब श्री राम को भूल जाएंगे...

पर उन्हीं बची हुई बूढ़ी दादियों और नानियों ने अपने नवजात पोते पोती, नाती नतीनियों को श्री राम को भूलने नहीं दिया...

प्रण लिया, पैरों में चमड़ों के जूते नहीं पहनेंगे... पगड़ियां नहीं लगाएंगे... और 9 पीढ़ियों तक नहीं पहने...

जब विधर्मी अवध से श्री राम की पूजा अर्चना रोक नहीं पाए तो दूर राजस्थान से कैसे कर पाते भला? और 19 अक्टूबर की इस रात को केवल राजस्थान से नहीं, अपितु गुजरात, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, बिहार, दिल्ली, कर्नाटक, बंगाल, आंध्रप्रदेश, उड़ीसा, लगभग प्रत्येक राज्य से रामभक्तों ने उस कब्जे को हटाने के लिए, अपने अपनों को त्यागा, अपने घर, अपने गांव, अपनी ज़मीन, अपनी भाषाई अंतर को त्यागा, जात पात, एकज द्विज के भेदभाव को त्यागा... क्योंकि मंदिर को बनाना था... ढांचे को हटाना था...

उसी मंदिर में अपने प्रभु श्री राम लला को बैठाना था...

तब न आज के स्मार्ट मोबाइल फोन का आविष्कार हुआ था, ना आज की भांति सोशल मीडिया से एकजुट करने वाले माध्यम का अस्तित्व था, बस दूरदर्शन और अखबार था, जो पूरी तरह सरकारों के और सरकारों के सेक्युलर अधिकारियों के कब्जे में था, लेकिन तब भी राम काज की गूंज सैकड़ों किलोमीटर तक पहुंची और लोग निकल पड़े, गुड़ चना लिए, पता नहीं था, पहुंचेंगे भी कि नहीं, पहुंचेंगे भी तो, जो काज करने का प्रण लिया है, वो पूरा कर पाएंगे या नहीं, पर ये सब सोचने का समय ही कहां था? बस जब भी मन में कोई नकारात्मक विचार आता, कारसेवक "जय जय श्री राम" के नारे या सीताराम सीताराम का जाप करने लग जाते, ट्रेन में, बस में, ट्रकों में सामूहिक रूप से हनुमान चालीसा का पाठ हो रहा था।

हर सनातनी के पास तब कोई कैमरा नहीं था, उस सबको रिकॉर्ड करने हेतु, नहीं तो वो आज के दौर के सोशल मीडिया पर, नंबर वन ट्रेंडिंग कर रहा होता। उन् रामभक्तों को आज के लाइक्स के इस आभासी संसार का कोई अंदाजा नहीं था, उन्हें तो तबके अखबारों और नेशनल न्यूज में भी अपना नाम नहीं चाहिए था, उन्हें किसी पार्टी में सीट नहीं चाहिए थी, उन्हें पैसा और प्रसिद्धि नहीं चाहिए थी, उन्हें चाटुकारों से चरणवंदना नहीं चाहिए थी, उन्हें गले में माला फूल नहीं चाहिए थे...

उन्हें बस, उनके राम चाहिए थे...
उनके राम, जो सबके राम थे...

उन रामभक्तों में बस एक चाह थी, उनके राजा श्री राम लला को उनका अधिकार पुनः वापस दिलाने की चाह, उनके राजा राम को उन्हीं की अयोध्या में पुनः सम्मान सहित, लाने की चाह, श्री राम को पाने की चाह, श्री राम का हो जाने की चाह...

सनातनी हिन्दू राकेश, [13/01/2024, 19:54]
उनके विरुद्ध मल्लेच्छ भी थे, मल्लेच्छ प्रेमी पार्टियां, सिस्टम और सरकारें भी थीं, मल्लेछों के प्रभाव को बढ़ावा देने वाली मकैले शिक्षा व्यवस्था द्वारा फैलाया भ्रमजाल भी था, और सनातन विरोधी एजेंडे के तहत काम करती बॉलीवुड इंडस्ट्री का वर्षों से किया ब्रेनवॉश भी, एक ऐसा मीठा ज़हर जो सेक्युलर हिंदुओं की रग रग में इतना रच बस गया था, कि वो अपने ही आराध्य की जन्मभूमि को पाने के इच्छुक ही न थे।

वो हिंदू मुस्लिम, भाई भाई के उसी आत्मघाती नैरेटिव की गुलामी कर रहे थे, जो सुसाइडल नैरेटिव मुगल प्रेमी कांग्रेस सरकारों ने उनकी रगों में, भर दिया था, इतना भर दिया था, कि अयोध्या के सेक्युलर हिंदू बाबरी के ढांचे के नीचे मौजूद साक्ष्य होने की बातों को ही नकारते थे और कहते थे, वहां मंदिर कभी था ही नहीं, हम तो सालों से हिंदू मुस्लिम साथ साथ खुशी खुशी रह रहे हैं।

परंतु उन भ्रमित हो चुके हिंदुओं से कोई ये नहीं पूछता था कि, हिंदुओं की आस्था के इन तीन प्रमुख केंद्रों, काशी, मथुरा और अयोध्या जी में उनके इन मुस्लिम भाईजानों की भारी भरकम संख्या, आई कहां से और कब?

क्यों इनकी मस्जिदें उन्हीं स्थानों पर बनी, जहां मुगल और अंग्रेज़ इतिहासकारों ने भी मंदिर होने की बातों को तथ्यों एवं चित्रों सहित लिखा था?

जहां ये लिखा था, कि मल्लेच्छों के आकाओं ने इन तीनों प्रमुख स्थानों पर मौजूद भव्य मंदिरों पर बारंबार आक्रमण किया, और कहीं मंदिरों के गर्भ गृह के ऊपर मस्जिद बनाई, कहीं मुख्य मंदिरों की मूर्तियों को तोड़कर, निकालकर अपनी मस्जिदों की सीढ़ियों में दबा दिया। कहीं शिव लिंग के पास पैखाना बना दिया और उसे डुबो कर, हाथ पैर धोने, कुल्ला करने का स्थान बना दिया!

वो अपमान पर अपमान करते रहे और हम अपने ही कसाइयों को भाई भाई और "बाबर द ग्रेट", "अकबर द ग्रेट" "औरंगजेब द ग्रेट", "ग्लोरियस मुगल पीरियड" कहते रहे...!

ये लोग सच तब भी नहीं पढ़ते थे, ये ही लोग सच अब भी पढ़ने से कतराते हैं...!

दिग्भ्रमित सेक्युलर हिंदू समाज तब इस अभियान के ही विरुद्ध खड़ा हो चुका था, वो कहता था ये एक शत प्रतिशत राजनीतिक मुद्दा है, जिसके चलते दंगे होंगे और हिंदू मारे जाएंगे, उनको अपने अधिकारों के लिए लड़ना फिज़ूल लगता था, वो अपने आराध्यों की जन्मभूमि में मुस्लिम आधिपत्य को स्वीकार कर चुके थे और कांग्रेस को ही अपना माई बाप समझते थे, उस समय की सरकारों के चाटुकार पत्रकारों ने ऐसे दिग्भ्रमित हिदुओं का इंटरव्यू लेकर, कई ऐसी डॉक्यूमेंट्री, लेख और खबरें बनाई जो सीधे सीधे जागृत हिंदुओं को मूर्ख, अंधा और एक पार्टी के इशारों पर नाचता, लड़ता, मारने की बात करता हिंदू आतंकवादी बताने का प्रयास करती थीं। वो खबरें, लेख और वीडियो कोई आज का युवा भी पढ़, देख ले, तो उसे जागृत हिंदुओं की ये गौरव यात्रा, बेकार की लगेगी और "मुझे हिंदू होने पर शर्म आती है" जैसे नैरेटीव को नव खाद मिलेगी।

ये वही हिंदुओं में शत्रुबोध को सुला कर, अपराधबोध जगाने वाले नैरेटिव था, जो तब का सारा मल्लेछ समाज फैलाता था, वही नैरेटिव, जो आज का ओवैसी और ओवैसी प्रेमी छिपा हुआ कांग्रेसी हिंदू फैलाता रहता है।

सेक्युलर हिंदुओं और आत्मघाती अपराधबोध से ग्रस्त हिंदुओं को तब भी बस ये एक राजनीतिक मुद्दा लग रहा था, परंतु ये मात्र एक राजनीतिक मुद्दा नहीं था, ना है, ना होगा, ये वो काज था, जो अपने होने की वर्षों से प्रतीक्षा कर रहा था, और एक राजनैतिक पार्टी का उदय उस शक्ति की एक लीला भर थी... ये राजनीतिक पार्टी बस एक माध्यम बनी, ये संगठन, ये जागृत सनातन एकता बस एक माध्यम बने, इस रामकाज के जो होना ही होना था...

20 अक्टूबर 1990
गाज़ियाबाद, उत्तरप्रदेश

सुबह सीकर से निकले 252 राम भक्त चले थे, किसी तरह गाजियाबाद पहुंचे, चारों तरफ पुलिस लगी हुई थी, जिसके पास भी गुड़ चना, तुलसी माला या राम नामी मिलती उन्हें खुली जेलों में, विद्यालयों में भर दिया जाता, गायब कर दिया जाता। कारसेवकों को विश्व हिंदू परिषद के श्री अशोक सिंघल जी का आदेश था, जो उस समय राजस्थान के क्षेत्र प्रचारक सोहन सिंह जी ने दोहराया "चाहे सो कर जाना, बैठकर जाना, लेटकर जाना, जाना अयोध्या जी है। रास्ते में अनेक बाधाएं आएंगी, उन सबको पार करते हुए आपको अयोध्या जी पहुंचना है।" इस आदेश का पालन करने हेतु, प्रत्येक कारसेक ने कोई कसर नहीं छोड़ी...

22 अक्टूबर 1990
लखनऊ, उत्तरप्रदेश

सीकर से चले 252 कारसेवकों में से मात्र 64 कारसेवक ही लखनऊ पहुंच पाए, बाकी 200 कब कहां पुलिस द्वारा, कौन से स्टेशन पर पकड़ लिए गए, पता नहीं चला...

सनातनी हिन्दू राकेश, [13/01/2024, 19:54]
बचे 64 कारसेवक किसी तरह छुपते छिपाते लखनऊ भाजपा के कमलापति त्रिपाठी के यहां किसी तरह ठहरे, वहां से निकले अलग अलग जत्थों में, फिर गिरफ्तार हुए, कौन कहां कब गिरफ्तार कर लिया जा रहा था, किसी को खबर ही नहीं पहुंच रही थी, एक एक करके सैनिक जैसे युद्ध में गिरते जाते हैं, और बाकी बचे युद्ध लड़ते जाते हैं, बस वैसा ही माहौल था उस समय, पूरे देश में, खासकर उत्तर प्रदेश में।

मुलायम ने अपने कोर वोटर विधर्मी पक्ष को खुश रखने के लिए, ऐलान कर रखा था कि अयोध्या जी में "एक परिंदा भी पर नहीं मार सकता", पर ये राम भक्त कहां सुनने वाले थे? ये वानर सेना कहां डरने वाली थी, उन्होंने तो अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया था, अपने प्रभु को, अब जो होगा, उनकी इच्छा, एक ही भावना थी, उनका काज करने में प्राण भी चले जाएं तो जाएं, किसी का वध करना पड़े तो करेंगे, जेल जाना पड़े तो जाएंगे, फांसी पर चढ़ जाएंगे, गोली खाएंगे पर अयोध्या जी जाएंगे, जो प्रण लिया है वो पूरा करेंगे। सारे यात्री वाहन बंद हो चुके थे, कोई साधन नहीं था, चारों तरफ़ फोर्स लगी हुई थी, गांवों से, खेतों से पैदल पैदल, सब अपने लक्ष्य की ओर भूखे प्यासे, बिना रुके, चलते हुए ये ही जयकारा, बार बार अपनी और बाकी बचे सबकी हिम्मत बढ़ाने को लगाते थे, "राम लला हम आएंगे, मंदिर वहीं बनाएंगे..!"

"बाधा सभी हटाएंगे, मंदिर वहीं बनाएंगे...!"
"राम लला हम आएंगे, मंदिर वहीं बनाएंगे...!"

29 अक्टूबर 1990

100–100 किलोमीटर पैदल चल कर ये जत्था, तमसा नदी पार करके अकबरपुर के आगे के गांवों तक पहुंचा, कुछ जागृत गांव वाले रामभक्तों के रक्त में उबाल लाने वाले नारों को सुन, कई किलोमीटर से भूखे प्यासे, पैदल चले आ रहे राम जी के इन कारसेवकों को पूड़ी आलू, पूड़ी हलवा खिला देते थे, बड़े बुजुर्ग गांव वाले युवा कारसेवकों के पैर छूते थे और उसमें सरसों के तेल से मालिश करते थे, महिलाएं लगातार कारसेवकों के जत्थों के लिए पूड़ी सब्जी बनाए जा रही थीं, आरती उतारी जा रही थी, तिलक लगाया जा रहा था, अपने गांव से भर्ती हुए पुलिस के सिपाहियों को उन्हें पकड़ने और उनकी सूचना देने से रोक लेते थे, उन्हें अपने अपने घरों में सुलाते थे, पर कुछ ऐसे भी थे जो इस समय भी मुखबरी कर राम जी के कारसेवकों को पकड़वा रहे थे, क्योंकि उन्हें लगता था कि मुगल प्रेमी सरकारों और अधिकारियों को खुश करके उन्हें कोई पद, कुछ पैसा और सेक्युलर समाज में सम्मान मिलेगा, और सेक्युलर हिंदू समाज ने इन गद्दारों को, वो सबकुछ दिया भी...

अपनों के इस विश्वासघात के कारण, सीकर से चले 252 कारसेवकों में से मात्र 24 ही सुरक्षित अयोध्या जी के बॉर्डर पर पहुंचे, अब पहुंचना था अयोध्या जी, पुलिस पहरा चहुं ओर था, सरकारी मुखबिर लकड़बग्घों की भांति घात लगाए बैठे थे, किसी ने कहा उन्हें मिट्टी में जाना है, किसी ने कहा विवाह में, किसी ने कहा पंचकोसी परिक्रमा करने जाना है, अयोध्या जी के कुछ जागृत सनातनियों ने इन अंजान रामभक्तों को अपना बेटा बताया, किसी ने मामा चाचा बताया और अपने घरों में आश्रय दिया, तब न भाषाई अंतर देखा गया, ना ये देखा गया कि कौन किस जाति का है, अगड़ा है कि पिछड़ा, सब बराबर थे तब, सनातनी पहले, हिंदू पहले, जाति बाद में...

30 अक्टूबर 1990

"मारेंगे मर जाएंगे
"मंदिर वहीं बनाएंगे"

"तेल लगाकर डाबर का
नाम मिटा दो बाबर का"

देव उठावनी एकादशी की सुबह 8 बजे तक, तब के उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव को ये सूचना दी गई थी कि सन्नाटा है अयोध्या में।

और उसके तुरंत बाद, डॉक्टर की वेशभूषा में अयोध्या जी की भूमि में प्रवेश कर चुके श्रद्धेय अशोक सिंघल, ऊमा भारती समेत साध्वी ऋतम्भरा और पूर्व डीजीपी श्री चंद्र दीक्षित जी की अगुवाई में, हज़ारों राम भक्तों का जुलूस इन्हीं नारों को लगाता हुआ, श्री राम जन्मभूमि की ओर कूच करने लगा...

पुलिस जहां रोकती, वहीं ज़मीन पर बैठ, हनुमान चालीसा का पाठ शुरू कर देते कारसेवक, और पुलिस वालों के पैर छूने लगते, पुलिस पीछे हटती, कारसेवक, "जय श्री राम" का नारा लगाकर आगे बढ़ते जाते।

कई कारसेवकों को पुलिस द्वारा बसों में भरा जाने लगा, तभी कहीं से एक साधु जी पुलिस की बस पर कब्ज़ा किया और बैरिकेड तोड़ते हुए बस को राम जन्मभूमि के पास तक ले गए, जहां वो ढांचा सनातनियों का अपना करता खड़ा था, कोठरी बंधुओं ने देखते देखते 30 फीट ऊंचे गुम्बद पर, वानर की भांति चढ़ाई करी और भगवा ध्वज फहरा दिया।

चहुं ओर "जय जय सियाराम" का उद्घोष हुआ, सांकेतिक कारसेवा सम्पूर्ण हुई, शाम तक चहुं ओर उत्सव का माहौल था, हर घर पर दीप जल रहे थे...

पूरी अयोध्या राम मय थी...

31 अक्टूबर और 1 नवंबर 1990

सनातनी हिन्दू राकेश, [13/01/2024, 19:54]
मुलायम सिंह क्रोध से तिलमिला रहा था, उसने कारसेवकों की खाद्य सामग्री की आपूर्ति को न सिर्फ़ बंद करवाया, अपितु हज़ारों खाद्य सामग्री के पैकेट से भरी ट्रक को सरयू के पुल पर जलवा दिया, ताकि कारसेवक भूखें रहें और उनका मनोबल टूट जाए, पर वो कहां टूटने वाला था, वो तो और बढ़ गया। महंत नित्य गोपालदास जी, सत्यमित्रानंद गिरी जी, राम चंद्र परमहंस जी और अशोक सिंघल जी सहित कई पूज्य संतों ने मनोबल गिरने नहीं दिया अपने व्यक्तव्यों से, और निर्णय हुआ कि आगामी 2 नवंबर को शासन से पुनः कार सेवा करने की अनुमति मांगी जाएगी, पता था हिंसा होगी क्योंकि मुख्यमंत्री मुलायम सिंह की प्रवृति से सभी परिचित थे और उन्हें पता था, विधर्मी पक्ष को प्रसन्न करने हेतु वो किसी भी हद्द तक जा सकता है। सीकर से चले इस जत्थे के प्रमुख कारसेवक रवींद्र जाजू जब सरयू नदी में अपने साथियों संग स्नान कर रहे थे, तो उनके पैरों से कुछ टकराया, देखा तो साधुओं के शव थे, उन्हें किसी तरह निकाल कर, ठेले पर ले जाकर उनका दाहसंस्कार किया गया, कितनी लाशें सरयू जी में दबा दी गई थीं इस बीच, कहना मुश्किल था...!

2 नवंबर 1990

श्री राम जी के कारसेवकों के दो जत्थे, मणिराम जी की छावनी, लालकोठी और हनुमानगढ़ी चौक होते हुए श्री राम जन्मभूमि की ओर प्रस्थान कर चुके थे, कि लाल कोठी के पास एक जत्थे के ऊपर आंसू गैस के गोलों से वार होना और लाठियों से पीछे खदेड़ना आरंभ हो गया, कारसेवक भी अपने नेताओं के आदेश अनुसार गोलों को पकड़ते और पास की नाली में डूबो देते ताकि उसका प्रभाव कम हो जाए, आंसू गैस के गोलों से सांस लेना मुश्किल हो रहा था तो आस पास के घर वाली महिलाएं और बच्चे इस जत्थे को पानी दे रहे थे, कि तभी मदद कर रही अयोध्या जी की इन निर्दोष महिलाओं और बच्चों पर मुलायम की पुलिस ने फायरिंग शुरू कर दी, कई महिलाएं घायल हुईं, कई महिलाओं बच्चों ने वहीं गली में अपने प्राण त्याग दिए।

सीआरपीएफ के डिप्टी कमांडेंट उस्मान अली ने सीआरपीएफ के जवानों को भड़काने के लिए, चिल्लाना शुरू कर दिया,"फोर्स फंस गई, फोर्स फंस गई" दूसरी ओर अयोध्या जी के डीएम रामशरण श्रीवास्तव कहते रह गए, "स्टॉप फायरिंग स्टॉप फायरिंग"। पर उस्मान अली के बहकावे में आकर, सीआरपीएफ ने मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के आदेश का पालन करना आरंभ कर दिया और पूरी अयोध्या गोलियों और कारसेवकों की चीत्कारों से, गूंज गई.!!

जोधपुर से आए सेठाराम परिहार की नृशंस हत्या की गई उनके मुंह में गोली चलाकर, अपनी बहन के विवाह में लौटने की बात कहकर सैकड़ों किलोमीटर से पैदल चलकर आए, ढांचे पर भगवा ध्वज फहराने वाले युवा कोठारी बंधुओं को पुलिस ने घरों से बाहर निकाला, और छतों से घात लगाकर शरद कोठारी और रामकुमार कोठारी की गोली मारकर हत्या कर दी, दोनों भाइयों के आखिरी शब्द थे... "जय सियाराम, जय सियाराम"

जोधपुर के कारसेवक प्रोफेसर महेंद्र नाथजी अरोड़ा की गोलियों के पेट में धसने के कारण आंतें बाहर आ गईं थीं, पर उनकी जिजीविषा थी कि अपनी आंतों को टी शर्ट से बांधे वो सीटी बजाकर बजाकर, साथी कारसेवकों को सुरक्षित करने का प्रयास करते रहे।

जो कारसेवक बचे, उनका शरीर काला नीला पड़ गया था, लाठियों की मार से, कितने मरे किसी को कोई अंदाज़ा नहीं, ना जाने कितने कारसेवकों के शव अकबरपुर में कुछ दिन बाद मिले और उनका गांव वालों ने अंतिम संस्कार कर दिया, कितनों का लावारिस शव के नाम पर, पुलिस ने सरयू किनारे ही रात के अंधेरे में सामूहिक रूप से जला दिया...

बेटे घर नहीं पहुंचे, पति लौटे नहीं, पिता की गोद को कई बच्चे तरसते रहे, ये बलिदान यहीं नहीं रुका, जो जो कारसेवक अपने अपने घर लौटे उन्हें मल्लेछों ने टारगेट करके, राजस्थान, आंधप्रदेश, उत्तरप्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात में मारा, पाकिस्तान और इंदिरा गांधी द्वारा बनाए इस्लामिक बांग्लादेश में कई मंदिर ध्वस्त कर दिए गए, हजारों सनातनियों को वहां भी मारा गया...

पर हम सब भूल गए... हमें सब भुला दिया गया...

हमें इन 33 वर्षों से अधिक समय में बार बार शर्मिंदा किया गया, अपमानित किया गया, हमें अपने अधिकारों की मांग करने के लिए, कोर्ट परिसर के चक्कर काटने पर कटाक्ष किया गया, हमें मंदिर की जगह स्कूल, कॉलेज, हॉस्पिटल और मस्जिद तक बनाने का सुझाव सुझाया गया, हमारे मन मस्तिष्क को इस अभियान से जुड़े नेताओं, कारसेवकों और साधु संतों के विरुद्ध भड़काया गया, ताकि हम बंट जाएं, पुनः जातीय, भाषाई, आर्थिक भेद के चलते एक दूसरे से दूर हो जाएं, एक दूसरे के विरोधी हो जाएं और उनका लक्ष्य वहां मंदिर तोड़ कर, पुनः बाबरी मस्जिद बनाने का पूरा हो... गज़वा ए हिंद का ख्वाब पूरा हो...

अब ये हम पर और हमारी अगली पीढ़ी पर निर्भर करता है, कि क्या हम पुनः अपने शत्रुओं के द्वारा ब्रेनवॉश होकर, अपनी ही संस्कृति, अपनी ही सनातन परंपरा अपने ही नायक श्री राम की जन्मभूमि के विरुद्ध खड़े होंगे?

सनातनी हिन्दू राकेश, [13/01/2024, 19:54]
या इस नारे को चरितार्थ करेंगे, और उन बलिदानी श्री राम जी के कारसेवकों के प्रण को पूर्ण करेंगे...

अयोध्या जी तो बस झांकी है... काशी मथुरा बाकी है...!

हर हर महादेव🚩
जय जय श्री राम🚩
जय जय श्री कृष्ण🚩

#साभार: तत्वज्ञ देवस्य

गुरुकुल में क्या पढ़ाया जाता था ??यह जान लेना अति आवश्यक है।◆ अग्नि विद्या ( metallergy )◆ वायु विद्या ( flight ) ◆ जल व...
29/09/2023

गुरुकुल में क्या पढ़ाया जाता था ??
यह जान लेना अति आवश्यक है।

◆ अग्नि विद्या ( metallergy )

◆ वायु विद्या ( flight )

◆ जल विद्या ( navigation )

◆ अंतरिक्ष विद्या ( space science )

◆ पृथ्वी विद्या ( environment )

◆ सूर्य विद्या ( solar study )

◆ चन्द्र व लोक विद्या ( lunar study )

◆ मेघ विद्या ( weather forecast )

◆ पदार्थ विद्युत विद्या ( battery )

◆ सौर ऊर्जा विद्या ( solar energy )

◆ दिन रात्रि विद्या ( day - night studies )

◆ सृष्टि विद्या ( space research )

◆ खगोल विद्या ( astronomy)

◆ भूगोल विद्या (geography )

◆ काल विद्या ( time )

◆ भूगर्भ विद्या (geology and mining )

◆ रत्न व धातु विद्या ( gems and metals )

◆ आकर्षण विद्या ( gravity )

◆ प्रकाश विद्या ( solar energy )

◆ तार विद्या ( communication )

◆ विमान विद्या ( plane )

◆ जलयान विद्या ( water vessels )

◆ अग्नेय अस्त्र विद्या ( arms and amunition )

◆ जीव जंतु विज्ञान विद्या ( zoology botany )

◆ यज्ञ विद्या ( material Sc)

● वैदिक विज्ञान
( Vedic Science )

◆ वाणिज्य ( commerce )

◆ कृषि (Agriculture )

◆ पशुपालन ( animal husbandry )

◆ पक्षिपालन ( bird keeping )

◆ पशु प्रशिक्षण ( animal training )

◆ यान यन्त्रकार ( mechanics)

◆ रथकार ( vehicle designing )

◆ रतन्कार ( gems )

◆ सुवर्णकार ( jewellery designing )

◆ वस्त्रकार ( textile)

◆ कुम्भकार ( pottery)

◆ लोहकार ( metallergy )

◆ तक्षक ( guarding )

◆ रंगसाज ( dying )

◆ आयुर्वेद ( Ayurveda )

◆ रज्जुकर ( logistics )

◆ वास्तुकार ( architect)

◆ पाकविद्या ( cooking )

◆ सारथ्य ( driving )

◆ नदी प्रबन्धक ( water management )

◆ सुचिकार ( data entry )

◆ गोशाला प्रबन्धक ( animal husbandry )

◆ उद्यान पाल ( horticulture )

◆ वन पाल ( horticulture )

◆ नापित ( paramedical )

इस प्रकार की विद्या गुरुकुल में दी जाती थीं।

इंग्लैंड में पहला स्कूल 1811 में खुला
उस समय भारत में 732000 गुरुकुल थे।
खोजिए हमारे गुरुकुल कैसे बन्द हुए ?

और मंथन जरूर करें वेद ज्ञान विज्ञान को चमत्कार छूमंतर व मनघड़ंत कहानियों में कैसे बदला या बदलवाया गया। वेदों के नाम पर वेद विरुद्ध हिंदी रूपांतरण करके मिलावट की ।

अपरा विधा- भेाैतिक विज्ञान को व अपरा विधा आध्यात्मिक विज्ञान को कहा गया है। इन दोनों में १६ कलाओं का ज्ञान होता है।

तैत्तिरीयोपनिषद , भ्रगुवाल्ली अनुवादक ,५, मंत्र १, में ऋषि भ्रगु ने बताया है कि-

विज्ञान॑ ब्रहोति व्यजानात्। विज्ञानाद्धयेव खल्विमानि भूतानि जायन्ते। विज्ञानेन जातानि जीवन्ति। विज्ञान॑ प्रयन्त्यभिस॑विशन्तीति।

अर्थ- तप के अनातर उन्होंने ( ऋषि ने) जाना कि वास्तव मैं विज्ञान से ही समस्त प्राणी उत्पन्न होते हैं। उत्पत्ति के बाद विज्ञान से ही जीवन जीते हैं। अंत में प्रायान करते हुए विज्ञान में ही प्रविष्ठ हो जाते हैं।

तैत्तिरीयोपनिषद ब्रह्मानन्दवल्ली अनुवादक ८, मंत्र ९ में लिखा है कि-

विज्ञान॑ यज्ञ॑ तनुते। कर्माणि तनुतेऽपि च। विज्ञान॑ देवा: सर्वे। ब्रह्म ज्येष्ठमुपासते। विज्ञान॑ ब्रह्म चेद्वेद।

अर्थ- विज्ञान ही यज्ञों व कर्मों की वृद्धि करता है। सम्पूर्ण देवगण विज्ञान को ही श्रेष्ठ ब्रह्म के रूप में उपासना करते हैं। जो विज्ञान को ब्रह्म स्वरूप में जानते हैं, उसी प्रकार से चिंतन में रत्त रहते हैं, तो वे इसी शरीर से पापों से मुक्त होकर सम्पूर्ण कामनाओं की सिद्धि प्राप्त करते हैं। उस विज्ञान मय देव के अंदर ही वह आत्मा ब्रह्म रूप है। उस विज्ञान मय आत्मा से भिन्न उसके अन्तर्गत वह आत्मा ही ब्रह्म स्वरूप है।

( संसार के सभी जीव शिल्प विज्ञान के द्वारा ही जीवन यापन करते हैं।)

★ वेद ज्ञान है शिल्प विज्ञान है

त्रिनो॑ अश्विना दि॒व्यानि॑ भेष॒जा त्रिः पार्थि॑वानि॒ त्रिरु॑ दत्तम॒द्भ्यः।
आ॒मान॑ श॒योर्ममि॑काय सू॒नवे त्रि॒धातु॒ शर्म॑ वहतं शुभस्पती॥

ऋग्वेद (1.34.6)

हे (शुभस्पती) कल्याणकारक मनुष्यों के कर्मों की पालना करने और (अश्विना) विद्या की ज्योति को बढ़ानेवाले शिल्पि लोगो ! आप दोनों (नः) हम लोगों के लिये (अद्भ्यः) जलों से (दिव्यानि) विद्यादि उत्तम गुण प्रकाश करनेवाले (भेषजा) रसमय सोमादि ओषधियों को (त्रिः) तीनताप निवारणार्थ (दत्तम्) दीजिये (उ) और (पर्थिवानि) पृथिवी के विकार युक्त ओषधी (त्रिः) तीन प्रकार से दीजिये और (ममकाय) मेरे (सूनवे) औरस अथवा विद्यापुत्र के लिये (शंयोः) सुख तथा (ओमानम्) विद्या में प्रवेश और क्रिया के बोध करानेवाले रक्षणीय व्यवहार को (त्रिः) तीन बार कीजिये और (त्रिधातु) लोहा ताँबा पीतल इन तीन धातुओं के सहित भूजल और अन्तरिक्ष में जानेवाले (शर्म) गृहस्वरूप यान को मेरे पुत्र के लिये (त्रिः) तीन बार (वहतम्) पहुंचाइये ॥

भावार्थ- मनुष्यों को चाहिये कि जो जल और पृथिवी में उत्पन्न हुई रोग नष्ट करनेवाली औषधी हैं उनका एक दिन में तीन बार भोजन किया करें और अनेक धातुओं से युक्त काष्ठमय घर के समान यान को बना उसमें उत्तम २ जव आदि औषधी स्थापन कर देश देशांतरों में आना जाना करें।

विश्वकर्मा कुल श्रेष्ठो धर्मज्ञो वेद पारगः।
सामुद्र गणितानां च ज्योतिः शास्त्रस्त्र चैबहि।।
लोह पाषाण काष्ठानां इष्टकानां च संकले।
सूत्र प्रास्त्र क्रिया प्राज्ञो वास्तुविद्यादि पारगः।।
सुधानां चित्रकानां च विद्या चोषिठि ममगः।
वेदकर्मा सादचारः गुणवान सत्य वाचकः।।

(शिल्प शास्त्र) अर्थववेद

भावार्थ – विश्वकर्मा वंश श्रेष्ठ हैं विश्वकर्मा वंशी धर्मज्ञ है, उन्हें वेदों का ज्ञान है। सामुद्र शास्त्र, गणित शास्त्र, ज्योतिष और भूगोल एवं खगोल शास्त्र में ये पारंगत है। एक शिल्पी लोह, पत्थर, काष्ठ, चान्दी, स्वर्ण आदि धातुओं से चित्र विचित्र वस्तुओं सुख साधनों की रचना करता है। वैदिक कर्मो में उन की आस्था है, सदाचार और सत्यभाषण उस की विशेषता है।

यजुर्वेद के अध्याय २९ के मंत्र 58 के ऋषि जमदाग्नि है इसमे बार्हस्पत्य शिल्पो वैश्वदेव लिखा है। वैश्वदेव में सभी देव समाहित है।

शुल्वं यज्ञस्य साधनं शिल्पं रूपस्य साधनम् ॥

(वास्तुसूत्रोपनिषत्/चतुर्थः प्रपाठकः - ४.९ ॥)

अर्थात - शुल्ब सूत्र यज्ञ का साधन है तथा शिल्प कौशल उसके रूप का साधन है।

शिल्प और कुशलता में बहुत बड़ा अन्तर है ( एक शिल्प विद्या द्वारा किसी प्रारूप को बनाना और दूसरा कुशलता पूर्वक उसका उपयोग करना , ये दोनो अलग अलग है

कुशलता

जैसे शिल्प द्वारा निर्मित ओजारो से नाई कुशलता से कार्य करता है , शिल्पी द्वारा निर्मित यातायन के साधन को एक ड्राईवर कुशलता पूर्वक चलता है आदि

सामान्यतः जिस कर्म के द्वारा विभिन्न पदार्थों को मिलाकर एक नवीन पदार्थ या स्वरूप तैयार किया जाता है उस कर्म को शिल्प कहते हैं । ( उणादि० पाद०३, सू०२८ ) किंतु विशेष रूप निम्नवत है

१- जो प्रतिरूप है उसको शिल्प कहते हैं "यद् वै प्रतिरुपं तच्छिल्पम" (शतपथ०- का०२/१/१५ )

२- अपने आप को शुद्ध करने वाले कर्म को शिल्प कहते हैं

(क)"आत्मा संस्कृतिर्वै शिल्पानि: " (गोपथ०-उ०/६/७)

(ख) "आत्मा संस्कृतिर्वी शिल्पानि: " (ऐतरेय०-६/२७)

३- देवताओं के चातुर्य को शिल्प कहकर सीखने का निर्देश है (यजुर्वेद ४ / ९, म० भा० )

४- शिल्प शब्द रूप तथा कर्म दोनों अर्थों में आया है -

(क)"कर्मनामसु च " (निघन्टु २ / १ )

(ख) शिल्पमिति रुप नाम सुपठितम्" (निरुक्त ३/७)

५ - शिल्प विद्या आजीविका का मुख्य साधन है। (मनुस्मृति १/६०, २/२४, व महाभारत १/६६/३३ )

६- शिल्प कर्म को यज्ञ कर्म कहा गया है।

( वाल्मि०रा०, १/१३/१६, व संस्कार विधि, स्वा० द० सरस्वती व स्कंद म०पु० नागर६/१३-१४ )

।।पांचाल_ब्राह्मण।।

शिल्पी ब्राह्मण नामान: पञ्चाला परि कीर्तिता:।
(शैवागम अध्याय-७)
अर्थात-पांच प्रकार के श्रेष्ठ शिल्पों के कर्ता होने से शिल्पी ब्राह्मणों का नाम पांचाल है।

पंचभि: शिल्पै:अलन्ति भूषयन्ति जगत् इति पञ्चाला:। (विश्वकर्म वंशीय ब्राह्मण व्यवस्था-भाग-३, पृष्ठ-७६-७७)
अर्थात- पांच प्रकार के शिल्पों से जगत को भूषित करने वाले शिल्पि ब्राह्मणों को पांचाल कहते हैं।

ब्रह्म विद्या ब्रह्म ज्ञान (ब्रह्मा को जानने वाला) जो की चारो वेदों में प्रमाणित है जो वैदिक गुरुकुलो में शिक्षा दी जाती थी ये (metallergy) जिसे अग्नि विद्या या लौह विज्ञान (धातु कर्म) कहते है , ये वेदों में सर्वश्रेष्ठ ब्रह्मकर्म ब्रह्मज्ञान है पृथ्वी के गर्भ से लौह निकालना और उसका चयन करना की किस लोहे से , या किस लोहे के स्वरूप से, सुई से लेकर हवाई जहाज, युद्ध पोत जलयान, थलयान, इलेक्ट्रिक उपकरण , इलेक्ट्रॉनिक उपकरण , रक्षा करने के आधुनिक हथियार , कृषि के आधुनिक उपकरण , आधुनिक सीएनसी मशीन, सिविल इन्फ्रास्ट्रक्चर सब (metallergy) अग्नि विद्या ऊर्फ लोहा विज्ञान की देन है हमारे वैदिक ऋषि सब वैज्ञानिक कार्य करते थे वेदों में इन्हीं विश्वकर्मा शिल्पियों को ब्राह्मण की उपाधि मिली है जो वेद ज्ञान विज्ञान से ही संभव है चमत्कारों से नहीं वेद ज्ञान विज्ञान से राष्ट्र निर्माण होता है पाखण्ड से नहीं, इसी को विज्ञान कहा गया है बिना शिल्प विज्ञान के हम सृष्टि विज्ञान की कल्पना भी नहीं कर सकते इसलिए सभी विज्ञानिंक कार्य इन्ही सुख साधनों से संभव है इसलिए वैदिक शिल्पी विश्वकर्मा ऋषियों द्वारा भारत की सनातन संस्कृति विश्वगुरु कहलाई
भगवान (विश्वकर्मा शिल्पी ब्राह्मणों) ने अपने रचनात्मक कार्यों से इस ब्रह्मांड का प्रसार किया है। जो सभी वैदिक ग्रंथों में प्रमाणित है

આઈ શ્રી ખોડીયાર યુવક મંડળ આયોજિત ગણેશ મહોત્સવ ૨૦૨૩ગણેશ વિસર્જન
28/09/2023

આઈ શ્રી ખોડીયાર યુવક મંડળ આયોજિત ગણેશ મહોત્સવ ૨૦૨૩
ગણેશ વિસર્જન

आर्य भट्ट ने शून्य की खोज की तो रामायण में रावण के दस सर की गणना कैसे की गयी..?रावण के दस सिर कैसे हो सकते हैं,जबकि शून्...
25/09/2023

आर्य भट्ट ने शून्य की खोज की तो रामायण में रावण के दस सर की गणना कैसे की गयी..?

रावण के दस सिर कैसे हो सकते हैं,जबकि शून्य की खोज आर्यभट्ट ने की..?? कुछ लोग हिन्दू धर्म व रामायण महाभारत गीता को काल्पनिक दिखाने के लिए यह प्रश्न करते है कि जब आर्यभट्ट ने लगभग 6 वी शताब्दी मे (शून्य/जीरो) की खोज की तो आर्यभट्ट की खोज से लगभग 5000 हजार वर्ष पहले रामायण मे रावण के 10 सिर की गिनती कैसे की गई और महाभारत मे कौरवो की 100 की संख्या की गिनीती कैसे की गई..जबकि उस समय लोग (जीरो) को जानते ही नही थे..तो लोगो ने गिनती को कैसे गिना...अब मै इस प्रश्न का उत्तर दे रही हुं...कृपया इसे पूरा ध्यान से पढे..आर्यभट्ट से पहले संसार 0(शुन्य) को नही जानता था..आर्यभट्ट ने ही (शुन्य / जीरो) की खोज की, यह एक सत्य है..लेकिन आर्यभट्ट ने 0( जीरो ) की खोज अंको मे की थी, शब्दों में खोज नहीं की थी, उससे पहले 0 (अंक को) शब्दो मे शुन्य कहा जाता था..उस समय मे भी हिन्दू धर्म ग्रंथो मे जैसे शिव पुराण,स्कन्द पुराण आदि मे आकाश को *शुन्य* कहा गया है..यहाँ पे शुन्य का मतलव अनंत से होता है...लेकिन रामायण व महाभारत काल मे गिनती अंको मे न होकर शब्दो मे होता था,और वह भी संस्कृत मे उस समय 1,2,3,4,5,6,7,8, 9,10 अंक के स्थान पे शब्दो का प्रयोग होता था वह भी संस्कृत के शव्दो का प्रयोग होता था...जैसे -

1 = प्रथम

2 = द्वितीय

3 = तृतीय

4 = चतुर्थ

5 = पंचम

6 = षष्टं

7 = सप्तम

8 = अष्टम

9 = नवंम

10 = दशम

दशम = दस

यानी दशम मे दस तो आ गया,लेकिन अंक का
0 (जीरो/शुन्य ) नही आया,‍‍रावण को दशानन कहा जाता है..दशानन मतलव दश+आनन =दश सिर वाला
अब देखो रावण के दस सिर की गिनती तो हो गई लेकिन अंको का 0 (जीरो) नही आया..इसी प्रकार महाभारत काल मे *संस्कृत* शब्द मे कौरवो की सौ की संख्या को शत-शतम बताया गया शत् एक संस्कृत का शब्द है,जिसका हिन्दी मे अर्थ सौ (100) होता है
सौ(100) "को संस्कृत मे शत् कहते है शत = सौ
इस प्रकार महाभारत काल मे कौरवो की संख्या गिनने मे सौ हो गई लेकिन इस गिनती मे भी अंक का 00(डबल जीरो) नही आया,और गिनती भी पूरी हो गई..महाभारत धर्मग्रंथ में कौरव की संख्या शत बताया गया है....रोमन मे भी 1-2-3-4-5-6-7-8-9-10 की जगह पे (¡)''(¡¡)"(¡¡¡)" पाँच को V कहा जाता है..दस को x कहा जाता है..रोमन मे x को दस कहा जाता है..X= दस..इस रोमन x मे अंक का (जीरो/0) नही आया..और हम" दश पढ भी लिएऔर गिनती पूरी हो गई इस प्रकार रोमन word मे कही 0 (जीरो) नही आता है..और आप भी रोमन मे एक से लेकर सौ की गिनती पढ लिख सकते है..आपको 0 या 00 लिखने की जरूरत भी नही पड़ती है..पहले के जमाने मे गिनती को शब्दो मेलिखा जाता था उस समय अंको का ज्ञान नही था..जैसे गीता,रामायण मे 1, 2, 3, 4, 5, 6, या बाकी पाठो (lesson ) को इस प्रकार पढा जाता है..जैसे (प्रथम अध्याय, द्वितीय अध्याय, पंचम अध्याय,दशम अध्याय... आदि )इनके दशम अध्याय मतलब दशवा पाठ (10 lesson) होता है..दशम अध्याय= दसवा पाठ..इसमे दश शब्द तो आ गया लेकिन इस दश मे अंको का 0 (जीरो)" का प्रयोग नही हुआ..बिना 0 आए पाठो (lesson) की गिनती दश हो गई...(हिन्दू Vi रोधी लोग सिर्फ अपने गलत kuतर्क द्वारा..हिन्दू धर्म व हिन्दू धर्मग्रंथो को काल्पनिक साबित करना चाहते है..जिससे हिन्दूओ के मन मे हिन्दू धर्म के प्रति नFरत भरकर और हिन्दू धर्म को काल्पनिक साबित करके,हिन्दू समाज को अन्य धर्मों में परिवर्तित किया जाए..लेकिन आज का हिन्दू समाज अपने धार्मिक शिक्षा को ग्रहण ना करने के कारण इन लोगो के झुठ को सही मान बैठता है
यह हमारे धर्म व संस्कृत के लिए हानि कारक है
अपनी सभ्यता पहचाने,गर्व करे की हम भारतीय है...

सनातन संस्कृति के कुछ नियम-धर्म जो हर हिन्दू को पता होना चाहिए🔸भैरव की पूजा में तुलसी स्वीकार्य नहीं है।🔹 भोजन प्रसाद को...
25/09/2023

सनातन संस्कृति के कुछ नियम-धर्म जो हर हिन्दू को पता होना चाहिए

🔸भैरव की पूजा में तुलसी स्वीकार्य नहीं है।
🔹 भोजन प्रसाद को लाघंना नहीं चाहिए।
🔸 देव प्रतिमा देखकर अवश्य प्रणाम करें।
🔹 किसी को भी कोई वस्तु या दान-दक्षिणा दाहिने हाथ से देना चाहिए।
🔸 एकादशी,अमावस्या,कृृष्ण चतुर्दशी,पूर्णिमा व्रत तथा श्राद्ध के दिन क्षौर-कर्म (दाढ़ी) नहीं बनाना चाहिए।
🔹 बिना यज्ञोपवित या शिखा बंधन के जो भी कार्य, कर्म किया जाता है, वह निष्फल हो जाता हैं।
🔸 शंकर जी को बिल्वपत्र, विष्णु जी को तुलसी, गणेश जी को दूर्वा, लक्ष्मी जी को कमल प्रिय हैं।
🔹 शंकर जी को शिवरात्रि के सिवाय कुमकुम नहीं चढ़ते।
🔸 शिवजी को कुंद, विष्णु जी को धतूरा,देवी जी को आक तथा मदार और सूर्य भगवानको तगर के फूल नहीं चढ़ावे।
🔹 अक्षत देवताओं को तीन बार तथा पितरों को एक बार धोकर चढ़ावे।
🔸 एक हाथ से प्रणाम नही करना चाहिए।
🔹 सोए हुए व्यक्ति का चरण स्पर्श नहीं करना चाहिए।
🔸 बड़ों को प्रणाम करते समय उनके दाहिने पैर पर दाहिने हाथ से और उनके बांये पैर को बांये हाथ से छू कर प्रणाम करें।
🔹 जप करते समय जीभ या होंठ को नहीं हिलाना चाहिए। इसे उपांशु जप कहते हैं।इसका फल सौगुणा फलदायक होता हैं।
🔸 जप करते समय दाहिने हाथ को कपड़े या गौमुखी से ढककर रखना चाहिए।
🔹 जप के बाद आसन के नीचे की भूमि को स्पर्श कर नेत्रों से लगाना चाहिए।
🔸 संक्रान्ति, द्वादशी, अमावस्या, पूर्णिमा, रविवार और सन्ध्या के समय तुलसी तोड़ना निषिद्ध हैं।
🔹 दीपक से दीपक को नही जलाना चाहिए।
🔸 यज्ञ,श्राद्ध आदि में काले तिल का प्रयोग करना चाहिए, सफेद तिल का नहीं।
🔹 शनिवार को पीपल पर जल चढ़ाना चाहिए। पीपल की सात परिक्रमा करनी चाहिए।परिक्रमा करना श्रेष्ठ है।
🔸 नये बिल्व पत्र नहीं मिले तो चढ़ाये हुए बिल्व पत्र धोकर फिर चढ़ाए जा सकते हैं।
🔹 विष्णु भगवान को चावल गणेश जी को तुलसी, दुर्गा जी और सूर्य नारायण को बिल्व पत्र नहीं चढ़ावें।
🔸 पत्र-पुष्प-फल का मुख नीचे करके नहीं चढ़ावें, जैसे उत्पन्न होते हों वैसे ही चढ़ावें।
🔹 बिल्वपत्र उलटा करके डंडी तोड़कर शंकर पर चढ़ावें।
🔸 पान की डंडी का अग्रभाग तोड़कर चढ़ावें।
🔹 सड़ा हुआ पान या पुष्प नहीं चढ़ावे।
🔸 गणेश को तुलसी भाद्र शुक्ल चतुर्थी को चढ़ती हैं।
🔹 पांच रात्रि तक कमल का फूल बासी नहीं होता है।
🔸 दस रात्रि तक तुलसी पत्र बासी नहीं होते हैं।
🔹 सभी धार्मिक कार्यो में पत्नी को दाहिने भाग में बिठाकर धार्मिक क्रियाएं सम्पन्न करनी चाहिए।
🔸 पूजन करने वाला ललाट पर तिलक लगाकर ही पूजा करें।
🔹 पूर्वाभिमुख बैठकर अपने बांयी ओर घंटा,धूप तथा दाहिनी ओर शंख, जलपात्र एवं पूजन सामग्री रखें।
🔸 घी का दीपक अपने बांयी ओर तथा देवता को दाहिने ओर रखें एवं चांवल पर दीपक रखकर प्रज्वलित करें।
🔹 गणेशजी को तुलसी का पत्र छोड़कर सब पत्र प्रिय हैं।
🔸 कुंद का पुष्प शिव को माघ महीने को छोड़कर निषेध है।
🔹 बिना स्नान किये जो तुलसी पत्र जो तोड़ता है उसे देवता स्वीकार नहीं करते।
🔸 रविवार को दूर्वा नहीं तोड़नी चाहिए।
🔹 केतकी पुष्प शिव को नहीं चढ़ाना चाहिए।
🔸 केतकी पुष्प से कार्तिक माह में विष्णु की पूजा अवश्य करें।
🔹 देवताओं के सामने प्रज्जवलित दीप को बुझाना नहीं चाहिए।
🔸 शालिग्राम का आवाह्न तथा विसर्जन नहीं होता।
🔹 जो मूर्ति स्थापित हो उसमें आवाहन और विसर्जन नहीं होता।
🔸 तुलसीपत्र को मध्यान्ह के बाद ग्रहण न करें।
🔹 पूजा करते समय यदि गुरुदेव,ज्येष्ठ व्यक्ति या पूज्य व्यक्ति आ जाए तो उनको उठ कर प्रणाम कर उनकी आज्ञा से शेष कर्म को समाप्त करें।
🔸 मिट्टी की मूर्ति का आवाहन और विसर्जन होता है और अंत में शास्त्रीयविधि से गंगा प्रवाह भी किया जाता है।
🔹 कमल को पांच रात,बिल्वपत्र को दस रात और तुलसी को ग्यारह रात बाद शुद्ध करके पूजन के कार्य में लिया जा सकता है।
🔸 पंचामृत में यदि सब वस्तु प्राप्त न हो सके तो केवल गाय के दुग्ध से स्नान कराने मात्र से पंचामृतजन्य फल जाता है।
🔹 शालिग्राम पर अक्षत नहीं चढ़ता। लाल रंग मिश्रित चावल चढ़ाया जा सकता है।
🔸 हाथ में धारण किये पुष्प, तांबे के पात्र में चन्दन और चर्म पात्र में गंगाजल अपवित्र हो जाते हैं।
🔹 पिघला हुआ घी और पतला चन्दन नहीं चढ़ाना चाहिए।
🔸 प्रतिदिन की पूजा में सफलता के लिए दक्षिणा अवश्य चढ़ाएं।
🔹 आसन, शयन, दान, भोजन, वस्त्र, संग्रह, विवाद और विवाह के समयों पर छींक शुभ मानी गई है।
🔸 जो मलिन वस्त्र पहनकर,मूषक आदि के काटे वस्त्र, केशादि बाल कर्तन युक्त और मुख दुर्गन्ध युक्त हो,जप आदि करता है उसे देवता नाश कर देते हैं।

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