Jai Radha Madhav

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श्रीरामचरितमानस नित्य पाठ 27/08/2026कृपया रामायण अवश्य पढ़े।🌷 सियावर राम जय जय राम 🌷 मेरे प्रभु राम जय जय राम 🌷 करो कल्य...
28/08/2026

श्रीरामचरितमानस नित्य पाठ 27/08/2026
कृपया रामायण अवश्य पढ़े।
🌷 सियावर राम जय जय राम
🌷 मेरे प्रभु राम जय जय राम
🌷 करो कल्याण जय जय राम
🌷 मंगल भवन अमंगल हारी द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी
🌷 रघुनंदन राघव राम हरे सियाराम हरे सियाराम हरे।
🌷 कवन सो काज कठिन जग माही जो नहीं होई तात तुम पाही।
🌷 दीन दयाल बिरिदु संभारी, हरहु नाथ मम संकट भारी।
🌷 कथा प्रारंभ होत है सुनहू वीर हनुमान। राम लक्ष्मण जानकी कराहू सदा कल्याण।।
🌷 रामायण तुलसी कृत काहु कथा अनुसार। प्रेम सहित आसान गाहू आवाहू पवन कुमार।।
🌷 गणपति शिव गिरा महावीर बजरंग। विघन रहित पूरण करऔ रघुवर कथा ।।
🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷

जे हरषहिं पर संपति देखी। दुखित होहिं पर बिपति बिसेषी।। जिन्हहि राम तुम्ह प्रानपिआरे । तिन्ह के मन सुभ सदन तुम्हारे।।

🌷 जो दूसरेकी सम्पत्ति देखकर हर्षित होते हैं और दूसरेकी विपत्ति देखकर विशेष रूपसे दुखी होते हैं, और हे रामजी ! जिन्हें आप प्राणोंके समान प्यारे हैं, उनके मन आपके रहनेयोग्य शुभभवन हैं ॥ ४ ॥

दो० - स्वामि सखा पितु मातु गुर जिन्ह के सब तुम्ह तात । मन मंदिर तिन्ह कें बसहु सीय सहित दोउ भ्रात ॥ १३० ॥

🌷 हे तात ! जिनके स्वामी, सखा, पिता, माता और गुरु सब कुछ आप ही हैं, उनके मनरूपी मन्दिरमें सीतासहित आप दोनों भाई निवास कीजिये ॥ १३० ॥

अवगुन तजि सब के गुन गहहीं। बिप्र धेनु हित संकट सहहीं॥ नीति निपुन जिन्ह कइ जगलीका । घर तुम्हार तिन्ह कर मनु नीका ॥
* अयोध्याकाण्ड * ४३७

🌷 जो अवगुणोंको छोड़कर सबके गुणोंको ग्रहण करते हैं, ब्राह्मण और गौके लिये संकट सहते हैं, नीति-निपुणतामें जिनकी जगत्में मर्यादा है, उनका सुन्दर मन आपका घर है ॥ १ ॥

गुन तुम्हार समुझइ निज दोसा । जेहि सब भाँति तुम्हार भरोसा ।। राम भगत प्रिय लागहिं जेही। तेहि उर बसहु सहित बैदेही ।।

🌷 जो गुणोंको आपका और दोषोंको अपना समझता है, जिसे सब प्रकारसे आपका ही भरोसा है, और रामभक्त जिसे प्यारे लगते हैं, उसके हृदयमें आप सीतासहित निवास कीजिये ॥ २ ॥

जाति पाँति धनु धरमु बड़ाई। प्रिय परिवार सदन सुखदाई॥ सब तजि तुम्हहि रहइ उर लाई। तेहि के हृदयँ रहहु रघुराई ।।

🌷 जाति, पाँति, धन, धर्म, बड़ाई, प्यारा परिवार और सुख देनेवाला घर - सबको छोड़कर जो केवल आपको ही हृदयमें धारण किये रहता है, हे रघुनाथजी ! आप उसके हृदयमें रहिये ॥ ३ ॥

सरगु नरकु अपबरगु समाना। जहँ तहँ देख धरें धनु बाना।। करम बचन मन राउर चेरा। राम करहु तेहि कें उर डेरा ।।

🌷 स्वर्ग, नरक और मोक्ष जिसकी दृष्टिमें समान हैं, क्योंकि वह जहाँ-तहाँ (सब जगह) केवल धनुष-बाण धारण किये आपको ही देखता है; और जो कर्मसे, वचनसे और मनसे आपका दास है, हे रामजी ! आप उसके हृदयमें डेरा कीजिये ॥ ४ ॥ के कह-ए ভাড়

दो० - जाहि न चाहिअ कबहुँ कछु तुम्ह सन सहज सनेहु । बसहु निरंतर तासु मन सो राउर निज गेहु ॥ १३१ ॥

🌷 जिसको कभी कुछ भी नहीं चाहिये और जिसका आपसे स्वाभाविक प्रेम है, आप उसके मनमें निरन्तर निवास कीजिये; वह आपका अपना घर है ॥ १३१ ॥ एमएन क्रि

एहि बिधि मुनिबर भवन देखाए। बचन सप्रेम राम मन भाए। कह मुनि सुनहु भानुकुलनायक । आश्रम कहउँ समय सुखदायक ।।

🌷 इस प्रकार मुनिश्रेष्ठ वाल्मीकिजीने श्रीरामचन्द्रजीको घर दिखाये। उनके प्रेमपूर्ण वचन श्रीरामजीके मनको अच्छे लगे। फिर मुनिने कहा- हे सूर्यकुलके स्वामी! सुनिये, अब मैं इस समयके लिये सुखदायक आश्रम कहता हूँ (निवासस्थान बतलाता हूँ) ॥ १ ॥

चित्रकूट गिरि करहु निवासू । तहँ तुम्हार सब भाँति सुपासू ।। सैलु सुहावन कानन चारू । करि केहरि मृग बिहग बिहारू ।।

🌷 आप चित्रकूट पर्वतपर निवास कीजिये, वहाँ आपके लिये सब प्रकारकी सुविधा है। सुहावना पर्वत है और सुन्दर वन है। वह हाथी, सिंह, हिरन और पक्षियोंका विहारस्थल है॥ २ ॥
४३८ * रामचरितमानस

नदी पुनीत पुरान बखानी। अत्रिप्रिया निज तप बल आनी ।। सुरसरि धार नाउँ मंदाकिनि । जो सब पातक पोतक डाकिनि ।।

🌷 वहाँ पवित्र नदी है, जिसकी पुराणोंने प्रशंसा की है, और जिसको अत्रि ऋषिकी पत्नी अनसूयाजी अपने तपोबलसे लायी थीं। वह गङ्गाजीकी धारा है, उसका मन्दाकिनी नाम है। वह सब पापरूपी बालकोंको खा डालनेके लिये डाकिनी (डाइन) रूप है ॥ ३ ॥

अत्रि आदि मुनिबर बहु बसहीं। करहिं जोग जप तप तन कसहीं।। चलहु सफल श्रम सब कर करहू। राम देहु गौरव गिरिबरहू।।

🌷 अत्रि आदि बहुत-से श्रेष्ठ मुनि वहाँ निवास करते हैं, जो योग, जप और तप करते हुए शरीरको कसते हैं। हे रामजी ! चलिये, सबके परिश्रमको सफल कीजिये और पर्वतश्रेष्ठ चित्रकूटको भी गौरव दीजिये।

दो० - चित्रकूट महिमा अमित कही महामुनि गाइ । आइ नहाए सरित बर सिय समेत दोउ भाइ ॥ १३२ ॥

🌷 महामुनि वाल्मीकिजीने चित्रकूटकी अपरिमित महिमा बखानकर कही। तब सीताजीसहित दोनों भाइयोंने आकर श्रेष्ठ नदी मन्दाकिनीमें स्नान किया ॥ १३२ ॥

रघुबर कहेउ लखन भल घाटू । करहु कतहुँ अब ठाहर ठाटू।। लखन दीख पय उतर करारा । चहुँ दिसि फिरेउ धनुष जिमि नारा ।।

🌷 श्रीरामचन्द्रजीने कहा- लक्ष्मण ! बड़ा अच्छा घाट है। अब यहीं कहीं ठहरनेकी व्यवस्था करो। तब लक्ष्मणजीने पयस्विनी नदीके उत्तरके ऊँचे किनारेको देखा [ और कहा कि इसके चारों ओर धनुषके-जैसा एक नाला फिरा हुआ है ॥ १ ॥

नदी पनच सर सम दम दाना । सकल कलुष कलि साउज नाना।। चित्रकूट जनु अचल अहेरी । चुकइ न घात मार मुठभेरी॥

🌷 नदी (मन्दाकिनी) उस धनुषकी प्रत्यञ्चा (डोरी) है और शम, दम, दान बाण हैं। कलियुगके समस्त पाप उसके अनेकों हिंसक पशु [ रूप निशाने] हैं। चित्रकूट ही मानो अचल शिकारी है, जिसका निशाना कभी चूकता नहीं, और जो सामनेसे मारता है ॥ २ ॥

अस कहि लखन ठाउँ देखरावा । थलु बिलोकि रघुबर सुखु पावा।। रमेउ राम मनु देवन्ह जाना। चले सहित सुर थपति प्रधाना ।।

🌷 ऐसा कहकर लक्ष्मणजीने स्थान दिखलाया। स्थानको देखकर श्रीरामचन्द्रजीने सुख पाया। जब देवताओंने जाना कि श्रीरामचन्द्रजीका मन यहाँ रम गया तब वे देवताओंके प्रधान थवई (मकान बनानेवाले) विश्वकर्माको साथ लेकर चले ॥ ३ ॥
* अयोध्याकाण्ड * ४३९

कोल किरात बेष सब आए। रचे परन तृन सदन सुहाए।। बरनि न जाहिं मंजु दुइ साला । एक ललित लघु एक बिसाला।।

🌷 सब देवता कोल-भीलोंके वेषमें आये और उन्होंने [दिव्य] पत्तों और घासोंके सुन्दर घर बना दिये। दो ऐसी सुन्दर कुटियाँ बनायीं जिनका वर्णन नहीं हो सकता। उनमें एक बड़ी सुन्दर छोटी-सी थी और दूसरी बड़ी थी ॥४॥

दो० - लखन जानकी सहित प्रभु राजत रुचिर निकेत । सोह मदनु मुनि बेष जनु रति रितुराज समेत ॥ १३३ ॥

🌷 लक्ष्मणजी और जानकीजीसहित प्रभु श्रीरामचन्द्रजी सुन्दर घास-पत्तोंके घरमें शोभायमान हैं। मानो कामदेव मुनिका वेष धारण करके पत्नी रति और वसन्तऋतुके साथ सुशोभित हो ॥ १३३ ॥

मासपारायण, सत्रहवाँ विश्राम

अमर नाग किंनर दिसिपाला । चित्रकूट आए तेहि काला ।। राम प्रनामु कीन्ह सब काहू। मुदित देव लहि लोचन लाहू।।

🌷 उस समय देवता, नाग, किन्नर और दिक्पाल चित्रकूटमें आये और श्रीरामचन्द्रजीने सब किसीको प्रणाम किया। देवता नेत्रोंका लाभ पाकर आनन्दित हुए ॥ १ ॥

बरषि सुमन कह देव समाजू । नाथ सनाथ भए हम आजू।। करि बिनती दुख दुसह सुनाए । हरषित निज निज सदन सिधाए ।।

🌷 फूलोंकी वर्षा करके देवसमाजने कहा- हे नाथ! आज [ आपका दर्शन पाकर] हम सनाथ हो गये। फिर विनती करके उन्होंने अपने दुःसह दुःख सुनाये और [ दुःखोंके नाशका आश्वासन पाकर] हर्षित होकर अपने-अपने स्थानोंको चले गये ॥ २ ॥

चित्रकूट रघुनंदनु छाए । समाचार सुनि सुनि मुनि आए ।। आवत देखि मुदित मुनिबृंदा । कीन्ह दंडवत रघुकुल चंदा।।

🌷 श्रीरघुनाथजी चित्रकूटमें आ बसे हैं, यह समाचार सुन-सुनकर बहुत-से मुनि आये। रघुकुलके चन्द्रमा श्रीरामचन्द्रजीने मुदित हुई मुनिमण्डलीको आते देखकर दण्डवत् प्रणाम किया ॥ ३ ॥

मुनि रघुबरहि लाइ उर लेहीं। सुफल होन हित आसिष देहीं।। सिय सौमित्रि राम छबि देखहिं । साधन सकल सफल करि लेखहिं ॥

🌷 मुनिगण श्रीरामजीको हृदयसे लगा लेते हैं और सफल होनेके लिये आशीर्वाद देते हैं। वे सीताजी, लक्ष्मणजी और श्रीरामचन्द्रजीकी छवि देखते हैं और अपने सारे साधनोंको सफल हुआ समझते हैं ॥ ४ ॥

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🙏🙏:- नम्र याचना :-🙏🙏

मो सम दीन न दीन हित, तुम समान रघुवीर । अस विचारि रघुवंश मणि, हरहु विषम भव पीर ।। 1 ।।

बार बार वर माँगहु - हरिषि देहु श्री रंग । पद सरोज अनपायनी, भक्ति सदा सत्संग ।। 2 ।।

अर्थ न धर्म, का काम रुचि, गति न चहों निर्वाण । जन्म जन्म रति राम पद, यह वरदान न आन ।। ३।।

स्वामी मोहि न विसारियो, लाख लोग मिलि जाहि । हम से तुम को बहुत हैं, तुम से हम को नाहि ।। 4 ।।

नांहि विद्या नंहि वाहुवल, नंहि खर्चन को दाम । मोह से पतित अपंग की, तुम पत राखहु राम ।। 5।।

श्रवण सुयश सुनि आयह, प्रभु भजन भवपीर । त्राहि त्राहि आरति हरण, शरण सुखद रघुवीर ।। 6 ।।

कामिहि नारि पियारि जिमि, लोभिहि प्रिय जिमि दाम । तिमिहि रघुनाथ निरन्तर, प्रिय लागहु मोहि राम ।। 7 ।।

मैं अपराधी जन्म का, नत शिख भरा विकास । तुम दात दुख भंजना, मेरी सुनहु पुकार ।। 8 ।।

क्या मुख ले विनती करूँ, लाज लगत है मोहि । तुम देखत अबगुन कीए, कैसे भावु तोहि ।।9।।

जय जय कागभुशुण्डि की, जय गिरी उमा महेश। जय ऋषि भारद्वाज की, जय तुलसी अवधेश ।।10।।

कहेउ दंडवत प्रभुहि सन, तुमहि कहउँ कर जोरि। बार बार रघुनायकहि, सुरति करायहु मोरि ।।11।।

एक घड़ी आधी घड़ी, आधी मह पुनि आध। तुलसी चर्चा राम की, हरे कोटि अपराध ।।12 ।।

प्रनतपाल रघुवंश मनि, करुना सिन्धु खरारि। गहे सरन प्रभु राखिहैं, सब अपराध विसारि ।।13।।

राम चरन रति जो चहे, अथवा पद निर्वान। भाव सहित सो यह कथा, करे श्रवन पुट पान ।।14।।

मुनि दुर्लभ हरि भक्ति नर, पावहि बिनहि प्रयास। जो यह कथा निरंतर, सुनहि मानि विश्वास ।।15।।

कथा विसर्जन होत है, सुनउ वीर हनुमान। जो जन जंह से आए हैं, सो तंह करहि पयान ।।16।।

श्रोता सब आश्रम गए, शंभू गए कैलाश। रामायण मम हृदय मँह, सदा करहुँ तुम वास ।।17।।

रावणारि जसु पावन, गावहि सुनहि जे लोग। राम भगति दृढ़ पावहि, बिन बिराग जपजोग ।।18।।

राम लखन सिया जानकी, सदा करहुँ कल्याण। रामायण बैकुंठ की, विदा होत हनुमान ।।19।।

सबका भला करो भगवान, सब पर दया करो भगवान, सब पर कृपा करो भगवान, सब का सब विधि कल्याण हो , धर्म की जय, अधर्म का नाश हो, प्राणियों में सद भावना हो, विश्व का कल्याण हो।

🌷 सियावर राम जय जय राम
🌷 मेरे प्रभु राम जय जय राम
🌷 करो कल्याण जय जय राम
🌷 मंगल भवन अमंगल हारी द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी
🌷 रघुनंदन राघव राम हरे सियाराम हरे सियाराम हरे।
🌷 कवन सो काज कठिन जग माही जो नहीं होई तात तुम पाही।
🌷 दीन दयाल बिरिदु संभारी, हरहु नाथ मम संकट भारी।
🌷 श्री राम जय राम जय जय राम।
🌷 श्री राम जय राम जय जय राम
🌷 सियावर श्रीरामचन्द्र की जय
🌷 राधावर श्री कृष्ण भगवान की जय
🌷 गोंरावर भोलेनाथ की जय
🌷 पवनसुत हनुमान की जय
🌷 श्री राम दरबार की जय
🌷 हारे के सहारे की जय
🌷 सब भक्तन की जय
🌷 सब सन्तन की जय
🌷 गऊ माता की जय
🌷 गंगा माता की जय
🌷 भारत माता की जय

कमेन्ट में " जय श्री राम " लिखकर अपनी हाजरी लगाए।

#जयश्रीराम



#श्रीराम_दरबार ीयाराम
#रामनगरी_अयोध्या

श्रीरामचरितमानस नित्य पाठ 26/08/2026कृपया रामायण अवश्य पढ़े।🌷 सियावर राम जय जय राम 🌷 मेरे प्रभु राम जय जय राम 🌷 करो कल्य...
27/08/2026

श्रीरामचरितमानस नित्य पाठ 26/08/2026
कृपया रामायण अवश्य पढ़े।
🌷 सियावर राम जय जय राम
🌷 मेरे प्रभु राम जय जय राम
🌷 करो कल्याण जय जय राम
🌷 मंगल भवन अमंगल हारी द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी
🌷 रघुनंदन राघव राम हरे सियाराम हरे सियाराम हरे।
🌷 कवन सो काज कठिन जग माही जो नहीं होई तात तुम पाही।
🌷 दीन दयाल बिरिदु संभारी, हरहु नाथ मम संकट भारी।
🌷 कथा प्रारंभ होत है सुनहू वीर हनुमान। राम लक्ष्मण जानकी कराहू सदा कल्याण।।
🌷 रामायण तुलसी कृत काहु कथा अनुसार। प्रेम सहित आसान गाहू आवाहू पवन कुमार।।
🌷 गणपति शिव गिरा महावीर बजरंग। विघन रहित पूरण करऔ रघुवर कथा ।।
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सोइ जानइ जेहि देहु जनाई। जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई।। तुम्हरिहि कृपाँ तुम्हहि रघुनंदन । जानहिं भगत भगत उर चंदन ।।

🌷 वही आपको जानता है जिसे आप जना देते हैं और जानते ही वह आपका ही स्वरूप बन जाता है। हे रघुनन्दन ! हे भक्तोंके हृदयके शीतल करनेवाले चन्दन ! आपकी ही कृपासे भक्त आपको जान पाते हैं ॥ २ ॥

चिदानंदमय देह तुम्हारी । बिगत बिकार जान अधिकारी ।। नर तनु धरेहु संत सुर काजा । कहहु करहु जस प्राकृत राजा ।।

🌷 आपकी देह चिदानन्दमय है (यह प्रकृतिजन्य पञ्चमहाभूतोंकी बनी हुई कर्मबन्धनयुक्त, त्रिदेह-विशिष्ट मायिक नहीं है) और [ उत्पत्ति-नाश, वृद्धि-क्षय आदि ] सब विकारोंसे रहित है; इस रहस्यको अधिकारी पुरुष ही जानते हैं। आपने देवता और संतोंके कार्यके लिये [ दिव्य ] नर-शरीर धारण किया है और प्राकृत (प्रकृतिके तत्त्वोंसे निर्मित देहवाले, साधारण) राजाओंकी तरहसे कहते और करते हैं।

रा०म० १५-
४३४ * रामचरितमानस *

राम देखि सुनि चरित तुम्हारे । जड़ मोहहिं बुध होहिं सुखारे। तुम्ह जो कहहु करहु सबु साँचा । जस काछिअ तस चाहिअ नाचा।।

🌷 हे राम ! आपके चरित्रोंको देख और सुनकर मूर्ख लोग तो मोहको प्राप्त होते हैं और ज्ञानीजन सुखी होते हैं। आप जो कुछ कहते, करते हैं, वह सब सत्य (उचित) ही है; क्योंकि जैसा स्वाँग भरे वैसा ही नाचना भी तो चाहिये (इस समय आप मनुष्यरूपमें हैं, अतः मनुष्योचित व्यवहार करना ठीक ही है) ॥ ४ ॥

दो० - पूँछेहु मोहि कि रहौं कहँ मैं पूँछत सकुचाउँ । जहँ न होहु तहँ देहु कहि तुम्हहि देखावौं ठाउँ ॥ १२७॥

🌷 आपने मुझसे पूछा कि मैं कहाँ रहूँ ? परन्तु मैं यह पूछते सकुचाता हूँ कि जहाँ आप न हों, वह स्थान बता दीजिये। तब मैं आपके रहनेके लिये स्थान दिखाऊँ ॥ १२७ ॥

सुनि मुनि बचन प्रेम रस साने। सकुचि राम मन महुँ मुसुकाने ।। बालमीकि हँसि कहहिं बहोरी। बानी मधुर अमिअ रस बोरी।।

🌷 मुनिके प्रेमरससे सने हुए वचन सुनकर श्रीरामचन्द्रजी [ रहस्य खुल जानेके डरसे] सकुचाकर मनमें मुसकराये। वाल्मीकिजी हँसकर फिर अमृत-रसमें डुबोयी हुई मीठी वाणी बोले - ॥ १ ॥

सुनहु राम अब कहउँ निकेता। जहाँ बसहु सिय लखन समेता ।। जिन्ह के श्रवन समुद्र समाना । कथा तुम्हारि सुभग सरि नाना।।

🌷 हे रामजी ! सुनिये, अब मैं वे स्थान बताता हूँ जहाँ आप सीताजी और लक्ष्मणजी समेत निवास करिये। जिनके कान समुद्रकी भाँति आपकी सुन्दर कथारूपी अनेकों सुन्दर नदियोंसे - ॥ २ ॥

भरहिं निरंतर होहिं न पूरे। तिन्ह के हिय तुम्ह कहुँ गृह रूरे ।। लोचन चातक जिन्ह करि राखे । रहहिं दरस जलधर अभिलाषे।।

🌷 निरन्तर भरते रहते हैं, परन्तु कभी पूरे (तृप्त) नहीं होते, उनके हृदय आपके लिये सुन्दर घर हैं और जिन्होंने अपने नेत्रोंको चातक बना रक्खा है, जो आपके दर्शनरूपी मेघके लिये सदा लालायित रहते हैं; ॥ ३ ॥

निदरहिं सरित सिंधु सर भारी। रूप बिंदु जल होहिं सुखारी ॥ तिन्ह के हृदय सदन सुखदायक । बसहु बंधु सिय सह रघुनायक ॥

🌷 तथा जो भारी-भारी नदियों, समुद्रों और झीलोंका निरादर करते हैं और आपके सौन्दर्य [ रूपी मेघ] के एक बूँद जलसे सुखी हो जाते हैं (अर्थात् आपके दिव्य सच्चिदानन्दमय स्वरूपके किसी एक अङ्गकी जरा-सी भी झाँकीके सामने स्थूल, सूक्ष्म और कारण तीनों जगत्‌के, अर्थात् पृथ्वी,
* अयोध्याकाण्ड * ४३५

🌷 स्वर्ग और ब्रह्मलोकतकके सौन्दर्यका तिरस्कार करते हैं), हे रघुनाथजी ! उन लोगोंके हृदयरूपी सुखदायी भवनोंमें आप भाई लक्ष्मणजी और सीताजीसहित निवास कीजिये ॥ ४ ॥

दो० - जसु तुम्हार मानस बिमल हंसिनि जीहा जासु । मुकताहल गुन गन चुनइ राम बसहु हियँ तासु ॥ १२८ ॥

🌷 आपके यशरूपी निर्मल मानसरोवरमें जिसकी जीभ हंसिनी बनी हुई आपके गुणसमूहरूपी मोतियोंको चुगती रहती है, हे रामजी! आप उसके हृदयमें बसिये ॥ १२८ ॥

प्रभु प्रसाद सुचि सुभग सुबासा । सादर जासु लहइ नित नासा ।। तुम्हहि निबेदित भोजन करहीं। प्रभु प्रसाद पट भूषन धरहीं।।

🌷 जिसकी नासिका प्रभु (आप) के पवित्र और सुगन्धित [पुष्पादि सुन्दर प्रसादको नित्य आदरके साथ ग्रहण करती (सूँघती) है, और जो आपको अर्पण करके भोजन करते हैं और आपके प्रसादरूप ही वस्त्राभूषण धारण करते हैं; ॥ १ ॥

सीस नवहिं सुर गुरु द्विज देखी। प्रीति सहित करि बिनय बिसेषी।। कर नित करहिं राम पद पूजा। राम भरोस हृदयँ नहिं दूजा।

🌷 जिनके मस्तक देवता, गुरु और ब्राह्मणोंको देखकर बड़ी नम्रताके साथ प्रेमसहित झुक जाते हैं; जिनके हाथ नित्य श्रीरामचन्द्रजी (आप) के चरणोंकी पूजा करते हैं, और जिनके हृदयमें श्रीरामचन्द्रजी (आप) का ही भरोसा है, दूसरा नहीं; ॥ २ ॥

चरन राम तीरथ चलि जाहीं। राम बसहु तिन्ह के मन माहीं ।। मंत्रराजु नित जपहिं तुम्हारा। पूजहिं तुम्हहि सहित परिवारा।।

🌷 तथा जिनके चरण श्रीरामचन्द्रजी (आप) के तीर्थोंमें चलकर जाते हैं; हे रामजी ! आप उनके मनमें निवास कीजिये। जो नित्य आपके [ रामनामरूप] मन्त्रराजको जपते हैं और परिवार (परिकर) सहित आपकी पूजा करते हैं ॥ ३ ॥

तरपन होम करहिं बिधि नाना। बिप्र जेवाँइ देहिं बहु दाना ।। तुम्ह तें अधिक गुरहि जियँ जानी। सकल भायँ सेवहिं सनमानी।।

🌷 जो अनेकों प्रकारसे तर्पण और हवन करते हैं, तथा ब्राह्मणोंको भोजन कराकर बहुत दान देते हैं; तथा जो गुरुको हृदयमें आपसे भी अधिक (बड़ा) जानकर सर्वभावसे सम्मान करके उनकी सेवा करते हैं; ॥ ४ ॥

दो० - सबु करि मागहिं एक फलु राम चरन रति होउ। तिन्ह के मन मंदिर बसहु सिय रघुनंदन दोउ ॥ १२९ ॥
४३६ * रामचरितमानस *

🌷 और यें सब कर्म करके सबका एकमात्र यही फल माँगते हैं कि श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें हमारी प्रीति हो; उन लोगोंके मनरूपी मन्दिरोंमें सीताजी और रघुकुलको आनन्दित करनेवाले आप दोनों बसिये ॥ १२९ ॥

काम कोह मद मान न मोहा । लोभ न छोभ न राग न द्रोहा।। जिन्ह कें कपट दंभ नहिं माया। तिन्ह कें हृदय बसहु रघुराया।।

🌷 जिनके न तो काम, क्रोध, मद, अभिमान और मोह है; न लोभ है, न क्षोभ है; न राग है, न द्वेष है; और न कपट, दम्भ और माया ही है- हे रघुराज ! आप उनके हृदयमें निवास कीजिये ॥ १ ॥

सब के प्रिय सब के हितकारी । दुख सुख सरिस प्रसंसा गारी॥ कहहिं सत्य प्रिय बचन बिचारी। जागत सोवत सरन तुम्हारी ।।

🌷 जो सबके प्रिय और सबका हित करनेवाले हैं; जिन्हें दुःख और सुख तथा प्रशंसा (बड़ाई) और गाली (निन्दा) समान हैं, जो विचारकर सत्य और प्रिय वचन बोलते हैं तथा जो जागते-सोते आपकी ही शरण हैं, ॥ २ ॥

तुम्हहि छाड़ि गति दूसरि नाहीं । राम बसहु तिन्ह के मन माहीं।। जननी सम जानहिं परनारी। धनु पराव बिष तें बिष भारी ॥

🌷 और आपको छोड़कर जिनके दूसरी कोई गति (आश्रय) नहीं है, हे रामजी! आप उनके मनमें बसिये। जो परायी स्त्रीको जन्म देनेवाली माताके समान जानते हैं और पराया धन जिन्हें विषसे भी भारी विष है; ॥ ३ ॥

जे हरषहिं पर संपति देखी। दुखित होहिं पर बिपति बिसेषी।। जिन्हहि राम तुम्ह प्रानपिआरे । तिन्ह के मन सुभ सदन तुम्हारे ।।

🌷 जो दूसरेकी सम्पत्ति देखकर हर्षित होते हैं और दूसरेकी विपत्ति देखकर विशेष रूपसे दुखी होते हैं, और हे रामजी ! जिन्हें आप प्राणोंके समान प्यारे हैं, उनके मन आपके रहनेयोग्य शुभभवन हैं ॥ ४ ॥

दो० - स्वामि सखा पितु मातु गुर जिन्ह के सब तुम्ह तात । मन मंदिर तिन्ह कें बसहु सीय सहित दोउ भ्रात ॥ १३० ॥

🌷 हे तात ! जिनके स्वामी, सखा, पिता, माता और गुरु सब कुछ आप ही हैं, उनके मनरूपी मन्दिरमें सीतासहित आप दोनों भाई निवास कीजिये ॥ १३० ॥

अवगुन तजि सब के गुन गहहीं। बिप्र धेनु हित संकट सहहीं। नीति निपुन जिन्ह कइ जगलीका । घर तुम्हार तिन्ह कर मनु नीका।।

🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷
🙏🙏:- नम्र याचना :-🙏🙏

मो सम दीन न दीन हित, तुम समान रघुवीर । अस विचारि रघुवंश मणि, हरहु विषम भव पीर ।। 1 ।।

बार बार वर माँगहु - हरिषि देहु श्री रंग । पद सरोज अनपायनी, भक्ति सदा सत्संग ।। 2 ।।

अर्थ न धर्म, का काम रुचि, गति न चहों निर्वाण । जन्म जन्म रति राम पद, यह वरदान न आन ।। ३।।

स्वामी मोहि न विसारियो, लाख लोग मिलि जाहि । हम से तुम को बहुत हैं, तुम से हम को नाहि ।। 4 ।।

नांहि विद्या नंहि वाहुवल, नंहि खर्चन को दाम । मोह से पतित अपंग की, तुम पत राखहु राम ।। 5।।

श्रवण सुयश सुनि आयह, प्रभु भजन भवपीर । त्राहि त्राहि आरति हरण, शरण सुखद रघुवीर ।। 6 ।।

कामिहि नारि पियारि जिमि, लोभिहि प्रिय जिमि दाम । तिमिहि रघुनाथ निरन्तर, प्रिय लागहु मोहि राम ।। 7 ।।

मैं अपराधी जन्म का, नत शिख भरा विकास । तुम दात दुख भंजना, मेरी सुनहु पुकार ।। 8 ।।

क्या मुख ले विनती करूँ, लाज लगत है मोहि । तुम देखत अबगुन कीए, कैसे भावु तोहि ।।9।।

जय जय कागभुशुण्डि की, जय गिरी उमा महेश। जय ऋषि भारद्वाज की, जय तुलसी अवधेश ।।10।।

कहेउ दंडवत प्रभुहि सन, तुमहि कहउँ कर जोरि। बार बार रघुनायकहि, सुरति करायहु मोरि ।।11।।

एक घड़ी आधी घड़ी, आधी मह पुनि आध। तुलसी चर्चा राम की, हरे कोटि अपराध ।।12 ।।

प्रनतपाल रघुवंश मनि, करुना सिन्धु खरारि। गहे सरन प्रभु राखिहैं, सब अपराध विसारि ।।13।।

राम चरन रति जो चहे, अथवा पद निर्वान। भाव सहित सो यह कथा, करे श्रवन पुट पान ।।14।।

मुनि दुर्लभ हरि भक्ति नर, पावहि बिनहि प्रयास। जो यह कथा निरंतर, सुनहि मानि विश्वास ।।15।।

कथा विसर्जन होत है, सुनउ वीर हनुमान। जो जन जंह से आए हैं, सो तंह करहि पयान ।।16।।

श्रोता सब आश्रम गए, शंभू गए कैलाश। रामायण मम हृदय मँह, सदा करहुँ तुम वास ।।17।।

रावणारि जसु पावन, गावहि सुनहि जे लोग। राम भगति दृढ़ पावहि, बिन बिराग जपजोग ।।18।।

राम लखन सिया जानकी, सदा करहुँ कल्याण। रामायण बैकुंठ की, विदा होत हनुमान ।।19।।

सबका भला करो भगवान, सब पर दया करो भगवान, सब पर कृपा करो भगवान, सब का सब विधि कल्याण हो , धर्म की जय, अधर्म का नाश हो, प्राणियों में सद भावना हो, विश्व का कल्याण हो।

🌷 सियावर राम जय जय राम
🌷 मेरे प्रभु राम जय जय राम
🌷 करो कल्याण जय जय राम
🌷 मंगल भवन अमंगल हारी द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी
🌷 रघुनंदन राघव राम हरे सियाराम हरे सियाराम हरे।
🌷 कवन सो काज कठिन जग माही जो नहीं होई तात तुम पाही।
🌷 दीन दयाल बिरिदु संभारी, हरहु नाथ मम संकट भारी।
🌷 श्री राम जय राम जय जय राम।
🌷 श्री राम जय राम जय जय राम
🌷 सियावर श्रीरामचन्द्र की जय
🌷 राधावर श्री कृष्ण भगवान की जय
🌷 गोंरावर भोलेनाथ की जय
🌷 पवनसुत हनुमान की जय
🌷 श्री राम दरबार की जय
🌷 हारे के सहारे की जय
🌷 सब भक्तन की जय
🌷 सब सन्तन की जय
🌷 गऊ माता की जय
🌷 गंगा माता की जय
🌷 भारत माता की जय

कमेन्ट में " जय श्री राम " लिखकर अपनी हाजरी लगाए।

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