27/05/2026
श्रीरामचरितमानस नित्य पाठ 27/05/2026
कृपया रामायण अवश्य पढ़े।
🌷 सियावर राम जय जय राम
🌷 मेरे प्रभु राम जय जय राम
🌷 करो कल्याण जय जय राम
🌷 मंगल भवन अमंगल हारी द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी
🌷 रघुनंदन राघव राम हरे सियाराम हरे सियाराम हरे।
🌷 कवन सो काज कठिन जग माही जो नहीं होई तात तुम पाही।
🌷 दीन दयाल बिरिदु संभारी, हरहु नाथ मम संकट भारी।
🌷 कथा प्रारंभ होत है सुनहू वीर हनुमान। राम लक्ष्मण जानकी कराहू सदा कल्याण।।
🌷 रामायण तुलसी कृत काहु कथा अनुसार। प्रेम सहित आसान गाहू आवाहू पवन कुमार।।
🌷 गणपति शिव गिरा महावीर बजरंग। विघन रहित पूरण करऔ रघुवर कथा ।।
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भयउ रसोई भूसुर माँसू । सब द्विज उठे मानि बिस्वासू ।। भूप बिकल मति मोहँ भुलानी । भावी बस न आव मुख बानी ।।
🌷 रसोईमें ब्राह्मणोंका मांस बना है। [ आकाशवाणीका] विश्वास मानकर सब ब्राह्मण उठ खड़े हुए। राजा व्याकुल हो गया। [ परंतु ] उसकी बुद्धि मोहमें भूली हुई थी। होनहारवश उसके मुँहसे [एक ] बात [भी] न निकली ॥ ४ ॥
दो० - बोले बिप्र सकोप तब नहिं कछु कीन्ह बिचार । जाइ निसाचर होहु नृप मूढ़ सहित परिवार ॥ १७३ ॥
🌷 तब ब्राह्मण क्रोधसहित बोल उठे- उन्होंने कुछ भी विचार नहीं किया - अरे मूर्ख राजा ! तू जाकर परिवारसहित राक्षस हो ॥ १७३ ॥
छत्रबंधु तैं बिप्र बोलाई । घालै लिए सहित समुदाई॥ ईस्वर राखा धरम हमारा। जैहसि तैं समेत परिवारा।।
१६० * रामचरितमानस *
🌷 रे नीच क्षत्रिय ! तूने तो परिवारसहित ब्राह्मणोंको बुलाकर उन्हें नष्ट करना चाहा था, ईश्वरने हमारे धर्मकी रक्षा की। अब तू परिवारसहित नष्ट होगा ॥ १ ॥
संबत मध्य नास तव होऊ । जलदाता न रहिहि कुल कोऊ ॥ नृप सुनि श्राप बिकल अतित्रासा । भै बहोरि बर गिरा अकासा॥
🌷 एक वर्षके भीतर तेरा नाश हो जाय, तेरे कुलमें कोई पानी देनेवालातक न रहेगा। शाप सुनकर राजा भयके मारे अत्यन्त व्याकुल हो गया। फिर सुन्दर आकाशवाणी हुई - ॥ २ ॥
बिप्रहु श्राप बिचारि न दीन्हा। नहिं अपराध भूप कछु कीन्हा॥ चकित बिप्र सब सुनि नभबानी। भूप गयउ जहँ भोजन खानी॥
🌷 हे ब्राह्मणो ! तुमने विचारकर शाप नहीं दिया। राजाने कुछ भी अपराध नहीं किया। आकाशवाणी सुनकर सब ब्राह्मण चकित हो गये। तब राजा वहाँ गया, जहाँ भोजन बना था ॥ ३ ॥
तहँ न असन नहिं बिप्र सुआरा। फिरेउ राउ मन सोच अपारा॥ सब प्रसंग महिसुरन्ह सुनाई। त्रसित परेउ अवनीं अकुलाई॥
🌷 [ देखा तो ] वहाँ न भोजन था, न रसोइया ब्राह्मण ही था। तब राजा मनमें अपार चिन्ता करता हुआ लौटा। उसने ब्राह्मणोंको सब वृत्तान्त सुनाया और [ बड़ा ही] भयभीत और व्याकुल होकर वह पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ४ ॥
दो० - भूपति भावी मिटइ नहिं जदपि न दूषन तोर । किएँ अन्यथा होइ नहिं बिप्रश्राप अति घोर ॥ १७४ ॥
🌷 हे राजन् ! यद्यपि तुम्हारा दोष नहीं है, तो भी होनहार नहीं मिटता। ब्राह्मणोंका शाप बहुत ही भयानक होता है, यह किसी तरह भी टाले टल नहीं सकता ॥ १७४ ॥
अस कहि सब महिदेव सिधाए । समाचार पुरलोगन्ह पाए॥ सोचहिं दूषन दैवहि देहीं। बिरचत हंस काग किय जेहीं।
🌷 ऐसा कहकर सब ब्राह्मण चले गये। नगरवासियोंने [जब यह समाचार पाया, तो वे चिन्ता करने और विधाताको दोष देने लगे, जिसने हंस बनाते-बनाते कौआ कर दिया (ऐसे पुण्यात्मा राजाको देवता बनाना चाहिये था, सो राक्षस बना दिया) ॥ १ ॥
उपरोहितहि भवन पहुँचाई। असुर तापसहि खबरि जनाई॥ तेहिं खल जहँ तहँ पत्र पठाए। सजि सजि सेन भूप सब धाए॥
🌷 पुरोहितको उसके घर पहुँचाकर असुर (कालकेतु) ने [कपटी] तपस्वीको खबर दी। उस दुष्टने जहाँ-तहाँ पत्र भेजे, जिससे सब [वैरी] राजा सेना सजा-सजाकर [ चढ़ ] दौड़े ॥ २ ॥
* बालकाण्ड * १६१
घेरेन्हि नगर निसान बजाई। बिबिध भाँति नित होइ लराई ।। जूझे सकल सुभट करि करनी। बंधु समेत परेउ नृप धरनी ।।
🌷 और उन्होंने डंका बजाकर नगरको घेर लिया। नित्यप्रति अनेक प्रकारसे लड़ाई होने लगी। [ प्रतापभानुके] सब योद्धा [ शूरवीरोंकी] करनी करके रणमें जूझ मरे। राजा भी भाईसहित खेत रहा ॥ ३ ॥
सत्यकेतु कुल कोउ नहिं बाँचा। बिप्रश्राप किमि होइ असाँचा।। रिपु जिति सब नृप नगर बसाई । निज पुर गवने जय जसु पाई॥
🌷 सत्यकेतुके कुलमें कोई नहीं बचा। ब्राह्मणोंका शाप झूठा कैसे हो सकता था। शत्रुको जीतकर, नगरको [ फिरसे] बसाकर सब राजा विजय और यश पाकर अपने-अपने नगरको चले गये ॥ ४ ॥
दो० - भरद्वाज सुनु जाहि जब होइ बिधाता बाम । धूरि मेरुसम जनक जम ताहि ब्यालसम दाम ॥ १७५ ॥
🌷 [ याज्ञवल्क्यजी कहते हैं- हे भरद्वाज! सुनो, विधाता जब जिसके विपरीत होते हैं, तब उसके लिये धूल सुमेरुपर्वतके समान (भारी और कुचल डालनेवाली), पिता यमके समान (कालरूप) और रस्सी साँपके समान (काट खानेवाली) हो जाती है ॥ १७५ ॥
काल पाइ मुनि सुनु सोइ राजा । भयउ निसाचर सहित समाजा।। दस सिर ताहि बीस भुजदंडा। रावन नाम बीर बरिबंडा ।।
🌷 हे मुनि ! सुनो, समय पाकर वही राजा परिवारसहित रावण नामक राक्षस हुआ। उसके दस सिर और बीस भुजाएँ थीं और वह बड़ा ही प्रचण्ड शूरवीर था ॥ १ ॥
भूप अनुज अरिमर्दन नामा। भयउ सो कुंभकरन बलधामा ।। सचिव जो रहा धरमरुचि जासू । भयउ बिमात्र बंधु लघु तासू।।
🌷 अरिमर्दन नामक जो राजाका छोटा भाई था, वह बलका धाम कुम्भकर्ण हुआ। उसका जो मन्त्री था, जिसका नाम धर्मरुचि था, वह रावणका सौतेला छोटा भाई हुआ ॥ २ ॥
नाम बिभीषन जेहि जग जाना। बिष्नुभगत बिग्यान निधाना।। रहे जे सुत सेवक नृप केरे। भए निसाचर घोर घनेरे।।
🌷 उसका विभीषण नाम था, जिसे सारा जगत् जानता है। वह विष्णुभक्त और ज्ञान-विज्ञानका भण्डार था और जो राजाके पुत्र और सेवक थे, वे सभी बड़े भयानक राक्षस हुए ॥ ३ ॥
१६२ * रामचरितमानस *
कामरूप खल जिनस अनेका। कुटिल भयंकर बिगत बिबेका॥ कृपा रहित हिंसक सब पापी । बरनि न जाहिं बिस्व परितापी।।
🌷 वे सब अनेकों जातिके, मनमाना रूप धारण करनेवाले, दुष्ट, कुटिल, भयंकर, विवेकरहित, निर्दयी, हिंसक, पापी और संसारभरको दुःख देनेवाले हुए; उनका वर्णन नहीं हो सकता ॥४॥
दो० - उपजे जदपि पुलस्त्यकुल पावन अमल अनूप । तदपि महीसुर श्राप बस भए सकल अघरूप ॥ १७६ ॥
🌷 यद्यपि वे पुलस्त्य ऋषिके पवित्र, निर्मल और अनुपम कुलमें उत्पन्न हुए, तथापि ब्राह्मणोंके शापके कारण वे सब पापरूप हुए ॥ १७६ ॥
कीन्ह बिबिध तप तीनिहुँ भाई। परम उग्र नहिं बरनि सो जाई। गयउ निकट तप देखि बिधाता । मागहु बर प्रसन्न मैं ताता।।
🌷 तीनों भाइयोंने अनेकों प्रकारकी बड़ी ही कठिन तपस्या की, जिसका वर्णन नहीं हो सकता। [ उनका उग्र ] तप देखकर ब्रह्माजी उनके पास गये और बोले- हे तात! मैं प्रसन्न हूँ, वर माँगो ॥ १ ॥
करि बिनती पद गहि दससीसा । बोलेउ बचन सुनहु जगदीसा॥ हम काहू के मरहिं न मारें। बानर मनुज जाति दुइ बारें।
🌷 रावणने विनय करके और चरण पकड़कर कहा- हे जगदीश्वर ! सुनिये, वानर और मनुष्य - इन दो जातियोंको छोड़कर हम और किसीके मारे न मरें [ यह वर दीजिये ॥ २ ॥
एवमस्तु तुम्ह बड़ तप कीन्हा। मैं ब्रह्माँ मिलि तेहि बर दीन्हा॥ पुनि प्रभु कुंभकरन पहिं गयऊ । तेहि बिलोकि मन बिसमय भयऊ॥
🌷 [ शिवजी कहते हैं कि मैंने और ब्रह्माने मिलकर उसे वर दिया कि ऐसा ही हो, तुमने बड़ा तप किया है। फिर ब्रह्माजी कुम्भकर्णके पास गये। उसे देखकर उनके मनमें बड़ा आश्चर्य हुआ ॥ ३ ॥
जौं एहिं खल नित करब अहारू । होइहि सब उजारि संसारू॥ सारद प्रेरि तासु मति फेरी। मागेसि नीद मास षट केरी॥
🌷 जो यह दुष्ट नित्य आहार करेगा, तो सारा संसार ही उजाड़ हो जायगा। [ ऐसा विचारकर ] ब्रह्माजीने सरस्वतीको प्रेरणा करके उसकी बुद्धि फेर दी। [जिससे] उसने छः महीनेकी नींद माँगी ॥ ४ ॥
दो० - गए बिभीषन पास पुनि कहेउ पुत्र बर मागु । तेहिं मागेउ भगवंत पद कमल अमल अनुरागु ।। १७७॥
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🙏🙏:- नम्र याचना :-🙏🙏
मो सम दीन न दीन हित, तुम समान रघुवीर । अस विचारि रघुवंश मणि, हरहु विषम भव पीर ।। 1 ।।
बार बार वर माँगहु - हरिषि देहु श्री रंग । पद सरोज अनपायनी, भक्ति सदा सत्संग ।। 2 ।।
अर्थ न धर्म, का काम रुचि, गति न चहों निर्वाण । जन्म जन्म रति राम पद, यह वरदान न आन ।। ३।।
स्वामी मोहि न विसारियो, लाख लोग मिलि जाहि । हम से तुम को बहुत हैं, तुम से हम को नाहि ।। 4 ।।
नांहि विद्या नंहि वाहुवल, नंहि खर्चन को दाम । मोह से पतित अपंग की, तुम पत राखहु राम ।। 5।।
श्रवण सुयश सुनि आयह, प्रभु भजन भवपीर । त्राहि त्राहि आरति हरण, शरण सुखद रघुवीर ।। 6 ।।
कामिहि नारि पियारि जिमि, लोभिहि प्रिय जिमि दाम । तिमिहि रघुनाथ निरन्तर, प्रिय लागहु मोहि राम ।। 7 ।।
मैं अपराधी जन्म का, नत शिख भरा विकास । तुम दात दुख भंजना, मेरी सुनहु पुकार ।। 8 ।।
क्या मुख ले विनती करूँ, लाज लगत है मोहि । तुम देखत अबगुन कीए, कैसे भावु तोहि ।।9।।
जय जय कागभुशुण्डि की, जय गिरी उमा महेश। जय ऋषि भारद्वाज की, जय तुलसी अवधेश ।।10।।
कहेउ दंडवत प्रभुहि सन, तुमहि कहउँ कर जोरि। बार बार रघुनायकहि, सुरति करायहु मोरि ।।11।।
एक घड़ी आधी घड़ी, आधी मह पुनि आध। तुलसी चर्चा राम की, हरे कोटि अपराध ।।12 ।।
प्रनतपाल रघुवंश मनि, करुना सिन्धु खरारि। गहे सरन प्रभु राखिहैं, सब अपराध विसारि ।।13।।
राम चरन रति जो चहे, अथवा पद निर्वान। भाव सहित सो यह कथा, करे श्रवन पुट पान ।।14।।
मुनि दुर्लभ हरि भक्ति नर, पावहि बिनहि प्रयास। जो यह कथा निरंतर, सुनहि मानि विश्वास ।।15।।
कथा विसर्जन होत है, सुनउ वीर हनुमान। जो जन जंह से आए हैं, सो तंह करहि पयान ।।16।।
श्रोता सब आश्रम गए, शंभू गए कैलाश। रामायण मम हृदय मँह, सदा करहुँ तुम वास ।।17।।
रावणारि जसु पावन, गावहि सुनहि जे लोग। राम भगति दृढ़ पावहि, बिन बिराग जपजोग ।।18।।
राम लखन सिया जानकी, सदा करहुँ कल्याण। रामायण बैकुंठ की, विदा होत हनुमान ।।19।।
सबका भला करो भगवान, सब पर दया करो भगवान, सब पर कृपा करो भगवान, सब का सब विधि कल्याण हो , धर्म की जय, अधर्म का नाश हो, प्राणियों में सद भावना हो, विश्व का कल्याण हो।
🌷 सियावर राम जय जय राम
🌷 मेरे प्रभु राम जय जय राम
🌷 करो कल्याण जय जय राम
🌷 मंगल भवन अमंगल हारी द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी
🌷 रघुनंदन राघव राम हरे सियाराम हरे सियाराम हरे।
🌷 कवन सो काज कठिन जग माही जो नहीं होई तात तुम पाही।
🌷 दीन दयाल बिरिदु संभारी, हरहु नाथ मम संकट भारी।
🌷 श्री राम जय राम जय जय राम।
🌷 श्री राम जय राम जय जय राम
🌷 सियावर श्रीरामचन्द्र की जय
🌷 राधावर श्री कृष्ण भगवान की जय
🌷 गोंरावर भोलेनाथ की जय
🌷 पवनसुत हनुमान की जय
🌷 श्री राम दरबार की जय
🌷 हारे के सहारे की जय
🌷 सब भक्तन की जय
🌷 सब सन्तन की जय
🌷 गऊ माता की जय
🌷 गंगा माता की जय
🌷 भारत माता की जय
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