25/10/2024
मुहब्बत की अलामत
लोग ताज महल को मुहब्बत की अलामत क़रार देते हैं, मगर उस्मानी दौर में मस्जिद-ए-नबवी (सलल्लाहु अलैहि व सल्लम) की तामीर,,,, तामीरात की दुनिया में मुहब्बत और अक़ीदत की मेराज है...।
ज़रा पढ़ीये! और अपने दिलों को इश्क़-ए-नबी (सल्लललाहु अलैहि व सल्लम) से मुनव्वर करिये...।
तुर्कों ने जब मस्जिद-ए-नबवी (सलल्लाहु अलैहि व सल्लम) की तामीर का इरादा किया तो उन्होंने अपनी वसीअ रियासत में ऐलान किया कि उन्हें इमारत साज़ी से मुताल्लिक़ फ़नून के माहिरीन दरकार हैं...। ऐलान करने की देर थी कि हर इल्म के माने हुए लोगों ने अपनी ख़िदमात पेश की... सुलतान के हुक्म से इस्तम्बोल के बाहर एक शहर बसाया गया जिसमें अतराफ़-ए-आलम से आने वाले इन माहिरीन को अलग अलग महलों में बसाया गया... इसके बाद अक़ीदत और हैरत का ऐसा बाब शुरू हुवा जिसकी नज़ीर मिलना मुश्किल है, ख़लीफ़ा-ए-वक़्त जो दुनिया का सबसे बड़ा फ़रमां रवा था, ख़ुद नए शहर में आया, और हर शोबे के माहिर को ताकीद की के अपने ज़हीन तरीन बच्चे को अपना फ़न इस तरह सिखाए कि उसे यकता-ओ-बेमिसाल कर दे... इसी अस्ना में तुर्क हुकूमत उस बच्चे को हाफ़िज़-ए-क़ुरआन और शह सवार बनाएगी... दुनिया की तारीख़ का ये अजीब-ओ-ग़रीब मंसूबा कई साल जारी रहा...।
25 साल बाद नौजवानों की ऐसी जमाअत तैयार हुई जो ना सिर्फ़ अपने शोबे में यकता-ए-रोज़गार थे, बल्कि हर शख़्स हाफ़िज़-ए-क़ुरआन और बा अमल मुसलमान भी था... ये लगभग 500 लोग थे... इसी दौरान तुर्कों ने पत्थरों की नई कोह दरयाफ्त की, नए जंगलों से लकड़ियाँ कटवाई, तख़्ते हासिल किए गए, और शीशे का सामान बाहम पहुंचाया गया, ये सारा सामान नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के शहर मदीना पहुंचाया गया...। अदब का तो ये आलम था कि उसे रखने के लिए मदीना से दूर एक बस्ती बसाई गई ताकि शोर से मदीना का माहोल ख़राब ना हो, नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के अदब की वजह से अगर किसी कटे हुवे पत्थर में भी तरमीम की ज़रूरत पड़ती तो उसे वापस उसी बस्ती भेजा जाता, माहेरीन को हुक्म था कि हर शख़्स काम के दौरान बा वुज़ू रहे, और दरूद शरीफ़ और तिलावत-ए-क़रान में मशग़ूल रहे, हुजरा मुबारक की जालियों को कपड़े से लपेट दिया गया कि गर्द-ओ-गुबार अंदर रौज़ा-ए-पाक में ना जाए...। सुतून लगाए गए कि रियाज़-उल-जन्ना और रौज़ा-ए-पाक पर मिट्टी ना गिरे... ये काम पंद्रह साल तक चलता रहा, और तारीख़-ए-आलम गवाह है, ऐसी मुहब्बत ऐसी अक़ीदत से कोई तामीर ना कभी पहले हुई और ना कभी मुस्तक़बिल में होगी...।
✍️ TanveerTayagi