श्री ललिताअलोपशङ्करी शक्तिपीठ - Shri Lalita Alop Shankari Shaktipeeth

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श्री ललिताअलोपशङ्करी शक्तिपीठ - Shri Lalita Alop Shankari Shaktipeeth प्रयागे सङ्गमात् क्रोशं प्रतीच्यामंनगुलिर्गताः।
ललितालोप-देवी या राजते भव भैरवः।।
प्रयागे माधवेश्वरी So, there is no statue in this temple.

Shri Lalita Alop Sankari Devi Shakti Peeth Temple

The Lalita Alop Shankari Devi Temple is situated next to the confluence of the Ganga, Yamuna, and Saraswati rivers, the Triveni Sangam, in Prayagraj. It is said that a finger of Goddess Sati fell here and immediately vanished into a pit. Madhaveswari Devi is the main deity in this Ashtadasa Shaktipeeth temple.

पूर्ण महाकुम्भ प्रयागराज - Purna Mahakumbh Prayagraj २०२४-२०२५
02/11/2024

पूर्ण महाकुम्भ प्रयागराज - Purna Mahakumbh Prayagraj २०२४-२०२५

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10/04/2024

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तीन शक्तिपीठों में प्रमुख आलोक शंकरी देवी मंदिर प्रयागराज के आलोप बाग चुंगी में स्थित है. यहां नवरात्रि में नौ दिन...

20/02/2024

!! जय मां अलोपिन !!

21/10/2023

चन्द्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहना।
कात्यायनी शुभं दद्यादेवी दानवघातिनी॥

माँ दुर्गा के छठवें स्वरूपका नाम कात्यायनी है। इनका कात्यायनी नाम पड़नेकी कथा इस प्रकार है—कत नामक एक प्रसिद्ध महर्षि थे। उनके पुत्र ऋषि कात्य हुए। इन्हीं कात्यके गोत्रमें विश्वप्रसिद्ध महर्षि कात्यायन उत्पन्न हुए थे। इन्होंने भगवती पराम्बाकी उपासना करते हुए बहुत वर्षोंतक बड़ी कठिन तपस्या की थी। उनकी इच्छा थी कि माँ भगवती उनके घर पुत्रीके रूपमें जन्म लें। माँ भगवतीने उनकी यह प्रार्थना स्वीकार कर ली थी।

कुछ काल पश्चात् जब दानव महिषासुरका अत्याचार पृथ्वीपर बहुत बढ़ गया तब भगवान् ब्रह्मा, विष्णु, महेश तीनोंने अपने-अपने तेजका अंश देकर महिषासुरके विनाशके लिये एक देवीको उत्पन्न किया । महर्षि कात्यायनने सर्वप्रथम इनकी पूजा की। इसी कारणसे यह कात्यायनी कहलायीं।

ऐसी भी कथा मिलती है कि ये महर्षि कात्यायनके वहाँ पुत्रीरूपसे उत्पन्न भी हुई थीं। आश्विन कृष्ण चतुर्दशीको जन्म लेकर शुक्ल सप्तमी, अष्टमी तथा नवमी- तक-तीन दिन - इन्होंने कात्यायन ऋषिकी पूजा ग्रहण कर दशमीको महिषासुरका वध किया था।

माँ कात्यायनी अमोघ फलदायिनी हैं। भगवान् कृष्णको पतिरूपमें पानेके लिये व्रजकी गोपियोंने इन्हींकी पूजा कालिन्दी-यमुनाके तटपर की थी। ये व्रजमण्डलकी अधिष्ठात्री देवीके रूपमें प्रतिष्ठित हैं। इनका स्वरूप अत्यन्त ही भव्य और दिव्य है। इनका वर्ण स्वर्णके समान चमकीला और भास्वर हैं। इनकी चार भुजाएँ हैं। माताजीका दाहिनी तरफका ऊपरवाला हाथ अभयमुद्रामें है तथा नीचेवाला वरमुद्रामें है। बायीं तरफके ऊपरवाले हाथमें तलवार और नीचेवाले हाथमें कमल पुष्प सुशोभित है। इनका वाहन सिंह है।

दुर्गापूजाके छठवें दिन इनके स्वरूपकी उपासना की जाती है। उस दिन साधकका मन 'आज्ञा' चक्रमें स्थित होता है। योगसाधनामें इस आज्ञा चक्रका अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान है। इस चक्रमें स्थित मनवाला साधक माँ कात्यायनीके चरणोंमें अपना सर्वस्व निवेदित कर देता है। परिपूर्ण आत्मदान करनेवाले ऐसे भक्तको सहज भावसे माँ कात्यायनीके दर्शन प्राप्त हो जाते हैं। माँ कात्यायनीकी भक्ति और उपासनाद्वारा मनुष्यको बड़ी सरलतासे अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष चारों फलोंकी प्राप्ति हो जाती है। वह इस लोकमें स्थित रहकर भी अलौकिक तेज और प्रभावसे युक्त हो जाता है। उसके रोग, शोक, संताप, भय आदि सर्वथा विनष्ट हो जाते हैं। जन्म-जन्मान्तरके पापोंको विनष्ट करनेके लिये माँकी उपासनासे अधिक सुगम और सरल मार्ग दूसरा नहीं है। इनका उपासक निरन्तर इनके सान्निध्यमें रहकर परमपदका अधिकारी बन जाता है। अतः हमें सर्वतोभावेन माँके शरणागत होकर उनकी पूजा-उपासनाके लिये तत्पर होना चाहिये।।

*ओम् नमश्चण्डिकायै।।💐*

15/10/2023

।। अथ अलोपशङ्करी स्तोत्रम् ।।

सुतीर्थराज पश्चिमे वटस्य वायुकोणगाम्।
प्रयागराजवासिनीं नमाम्यलोपशङ्करीम् ||१||

भावार्थ- सुन्दर तीर्थराज त्रिवेणी संगम से पश्चिम तथा अक्षयवट से वायु कोण में स्थित, प्रयाग राज में वास करने वाली अलोपशङ्करी को मैं प्रणाम करता हूँ।

शिवेन सङ्गतां सतीं गतां पुनर्हिमाद्रिजाम् ।
सुभैरवैर्भवैर्युतां नमाम्यलोपशङ्करीम् ||२||

भावार्थ- भगवान शिव के साथ रहने वाली भगवती सती तथा जन्मान्तर में पार्वती स्वरूप वाली, सुन्दर भवनामक भैरव से युत इन अलोप शङ्करी देवी को मैं प्रणाम करता हूँ।

सुरैः सदा प्रवन्दितां विघातिनीं सुरगुहाम् ।
अनेक रूपधारिणीं नमाम्यलोपशङ्करीम् ॥३॥
भावार्थ- देवताओं से विशेष रूप से वन्दित तथा असुरों का विनाश करने वाली अनेक रूप धारण करने वाली भगवती अलोप शङ्करी को मैं प्रणाम करता हूँ।

रणे निशुम्भघातिनीं सुशुम्भदण्डदायिनीम् ।
प्रचण्डरूपधारिणीं नामम्यलोपशङ्करीम् ।। ४।।

भावार्थ - रण में शुम्भ तथा निशुम्भ का वध करने वाली, उग्ररूप धारण करने वाली भगवती अलोप शङ्करी को मैं प्रणाम करता हूँ।

निहत्य माहिषं बलं सरक्तधूम्रलोचनम् ।
प्रचण्डमुण्डनाशिनीं नमाम्यलोपशङ्करीम् ।।५।।

भावार्थ- सेना सहित महिषासुर, रक्तबीज तथा धूम्रलोचनादि का वध कर चण्डमुण्ड का विनाश करने वाली माँ अलोपशङ्करी को मैं प्रणाम करता हूँ।

उमान्तु दिव्यरूपिणीमनादितत्त्वबोधिनीम्।
सुकैटभादिघातिनीं नमाम्यलोपशङ्करीम् ।।६।।
भावार्थ- अलौकिक रूप युक्त आप भगवती उमा हैं तथा अनादि तत्त्व का ज्ञान देने वाली, मधु, कैटभादि दानवों का दलन करने वाली हैं एवम्भूता भगवती अलोपशङ्करी को भूयोभूयः प्रणाम करता हूँ।

सुयक्षरूपधारिणीं शचीन्द्रतोषदायिनीम् ।
अहड् कृतेविनाशिनीं नमाम्यलोपशङ्करीम् ।।७।।

भावार्थ- सुन्दर यक्ष का रूप धारण करके अग्नि, वायु आदि के सामर्थ्य को नष्ट कर शची तथा इन्द्र को उत्तम ज्ञान देकर अहंकार को नष्ट करने वाली माँ अलोपशङ्करी को मैं प्रणाम करता हूँ।

सुसृष्टिकारिणीं शिवां जनेष्टकामपूरिणीम्।
ऋणादिरोगहारिणीं नमाम्यलोपशङ्करीम्॥८॥

भावार्थ- शिवस्वरूपिणी, सुन्दर सृष्टि सर्जिका, भक्तों को मनोवाञ्छित फल देने वाली ऋण रोगादि कष्टों को दूर करने वाली माँ अलोपशङ्करी देवी को मैं प्रणाम करता हूँ।

कृतन्त्वलोपशङ्करीप्रणीतमष्टकन्त्विदम्।
पठन्मनः समाहितः प्रयाति शङ्करम्पदम् ।।९।।

भावार्थ- इस भगवती ललिता लोप शङ्करी अष्टक का एकाग्रचित्त होकर नित्यप्रति जो पाठ करता है उसे उत्तम कल्याणकारी पद तथा शिव सानिध्य प्राप्त होता है।।

18/09/2023

आबालगोपविदिता सर्वानुल्लङ्घयशासना।
श्रीचक्रराजनिलया श्रीमत्त्रिपुरसुन्दरी॥
श्रीशिवा शिवशक्त्यैक्यरूपिणी ललिताम्बिका।

जय मां श्री ललिताअलोपशङ्करी शक्तिपीठ - Shri Lalita Alop Shankari Shaktipeeth

https://youtu.be/cEzGS-dgTM4?feature=sharedतीर्थराज प्रयाग स्थित मां के दाहिने हाथ की उंगलियां गिरने से प्रादुर्भावित दि...
14/09/2023

https://youtu.be/cEzGS-dgTM4?feature=shared

तीर्थराज प्रयाग स्थित मां के दाहिने हाथ की उंगलियां गिरने से प्रादुर्भावित दिव्य ऊर्जा सम्पन्न शक्तिपीठ। दर्शन

प्रयागे सङ्गमात क्रोशं प्रतीच्यामंगुलिर्गता।
ललितालोप-देवी या राजते भव - भैरवः।।

सुतीर्थराज पश्चिमे वटस्य वायु कोणगाम्।
प्रयागराज वासिनीं नमाम्यलोप शङ्करीम्।।

जय मां आद्यशक्ति जगज्जननी जगदम्बा।।💐

श्री ललिता अलोप शंकरी शक्तिपीठ, प्रयागराज।।श्री आद्य शक्ति मां भगवती के दाहिने हाथ की उंगलियां गिरने से इस दिव्य ....

10/09/2023

१८ वाँ सूत्र -

न देहिनां सुखं किञ्चिद्विद्यते विदुषामपि।
तथा च दुःखं मूढानां वृथाहङ्करणं परम्।।

(यदि यह कहा जाय कि जो भलीभाँति कर्म करना जानते हैं, वे सुखी रहते हैं, और जो नहीं जानते उन्हें दुःख भोगना पड़ता है तो यह कहना भी ठीक नहीं; क्योंकि) ऐसा देखा जाता है कि बड़े-बड़े कर्मकुशल विद्वानोंको भी कुछ सुख नहीं मिलता और कई मूढोंका भी कभी दुःख से पाला नहीं पड़ता। इसलिये जो लोग अपनी बुद्धि या कर्मसे सुख पाने का घमंड करते हैं, उनका वह अभिमान व्यर्थ है।।

पुण्यप्रद पवित्र दर्शन -
तीर्थराज प्रयाग स्थित मां भगवती का दाहिना कर कमल निपातित होने से प्रकट हुआ शक्तिपीठ मां ललिता अलोप शङ्करी।।

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211006

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