Guru Rupaya Maa Narayani

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"जीव भाव कैसा है-- मैदान में घेरा लगाकर घर बनाने की तरह। घेरा बनाकर घर तैयार करने पर भी घर के भीतर मैदान है और बाहर भी म...
17/04/2026

"जीव भाव कैसा है-- मैदान में घेरा लगाकर घर बनाने की तरह। घेरा बनाकर घर तैयार करने पर भी घर के भीतर मैदान है और बाहर भी मैदान है। अगर घर तोड़ दो, तो मैदान फिर मैदान रहेगा।"--- श्री श्री मां आनंदमयी। " संयमित जीवन रहने से अन्तर की गांठ खुलती है। संसार के रास्ते से चलने पर आवरण पड़ जाता है।जैसी क्रिया करोगे वैसा गुण होगा।"--- श्री श्री आनंदमयी मां।

10/03/2026

त्रिपुरसुन्दरी साधना

माहेश्वरी शक्ति स्वरुपिणी षोडशी सबसे मनोहर श्रीविग्रह वाली सिद्ध देवी हैं। महाविद्याओं में भगवती षोडशी का चौथा स्थान है। षोडशी महाविद्या को श्रीविद्या भी कहा जाता है। षोडशी महाविद्या के ललिता, त्रिपुरा, राज राजेश्वरी, महात्रिपुरसुन्दरी, बालापञ्चदशी आदि अनेक नाम हैं। लक्ष्मी सरस्वती, ब्रह्माणी - तीनों लोकों की सम्पत्ति एवं शोभा का ही नाम श्री है। 'त्रिपुरा' शब्द का अर्थ बताते हुए-'शक्तिमहिम्न स्तोत्र' में कहा गया है
श्री माँ महाविद्या
'तिसृभ्यो मूर्तिभ्यः पुरातनत्वात् त्रिपुरा। अर्थात् जो ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश- इन तीनों से पुरातन हो वही त्रिपुरा हैं। 'त्रिपुरार्णव' ग्रन्थ में कहा गया है
नाडीत्रयं तु त्रिपुरा सुषुम्ना पिङ्गला विडा। मनो बुद्धिस्तथा चित्तं पुरत्रयमुदाहृतम्। तत्र तत्र वसत्येषा तस्मात् तु त्रिपुरा मता।। अर्थात् 'सुषुम्ना, पिंगला और इडा - ये तीनों नाडियां हैं और मन, बुद्धि एवं चित्त - ये तीन पुर हैं। इनमें रहने के कारण इनका नाम त्रिपुरा है।'
सोलह अक्षरों के मन्त्रवाली ललिता देवी की अङ्गकान्ति उदीयमान सूर्यमण्डल की आभा की भांति है। षोडशी माता की चार भुजाएं तीन नेत्र हैं। ये शान्तमुद्रा में लेटे हुए सदाशिव पर स्थित कमल के आसन पर आसीन हैं। भगवती षोडशी के चारों हाथों में क्रमश: पाश, अङ्कुश, धनुष और बाण सुशोभित हैं। वर देने के लिये सदा-सर्वदा तत्पर भगवती षोडशी का श्रीविग्रह सौम्य और हृदय दया से आपूरित है।
प्रशान्त हिरण्यगर्भ ही शिव हैं और उन्हीं की शक्ति षोडशी जी हैं। तन्त्रशास्त्रों में महाविद्या षोडशी देवी को पञ्चवक्त्रा अर्थात् पाँच मुखों वाली बताया गया है। चारों दिशाओं में चार मुख और एक ऊपर की ओर मुख होने से इन्हें पञ्चवक्त्रा कहा जाता है। देवी के पाँचों मुख तत्पुरुष, सद्योजात, वामदेव अघोर और ईशान शिव के पाँचों रूपों के प्रतीक हैं। पाँचों दिशाओं के रंग क्रमशः हरित, रक्त, धूम्र, नील और पीत होने से ये मुख भी इन्हीं रंगों के हैं । देवी षोडशी के दस हाथों में क्रमश: अभय, टंक, शूल, वज्र, पाश, खड्ग, अंकुश, 1. घण्टा, नाग और अग्नि हैं। षोडश कलाएँ पूर्णरूप से विकसित होने के कारण ये महाविद्या षोडशी कहलाती हैं।
त्रिपुरारहस्य में वर्णन है कि त्रिपुराम्बा ललिता भगवती ने भण्डासुर नामक असुर का वध किया था। ललिता मां को आद्याशक्ति माना जाता है। अन्य विद्याएँ भोग या मोक्ष में से एक ही देती हैं परंतु भगवती महात्रिपुरसुंदरी ललिता महाविद्या अपने उपासक को भुक्ति और मुक्ति दोनों प्रदान करती हैं। इन आद्याशक्ति षोडशी महाविद्या के स्थूल, सूक्ष्म, पर तथा तुरीय चार रूप हैं।
एक बार पराम्बा पार्वतीजी ने भगवान् शिव से पूछा- "भगवन्! आपके द्वारा प्रकाशित तन्त्रशास्त्र की साधना से जीव के आधि-व्याधि, शोक-संताप, दीनता-हीनता तो दूर हो जायेंगे किन्तु गर्भवास और मरण के असह्य दुःख की निवृति तो इससे नहीं होगी। कृपा करके इस दुःख से निवृत्ति और मोक्षपद की प्राप्ति का कोई उपाय बताइये ।"
परम कल्याणमयी पराम्बा के अनुरोध पर भगवान् शंकर ने षोडशी श्रीविद्यासाधना-प्रणाली को प्रकट किया। भगवान् शङ्कराचार्य ने भी श्रीविद्या के रूप में इन्हीं षोडशी देवी की उपासना की थी। इसीलिये आज भी सभी शाङ्कर पीठों में भगवती षोडशी राजराजेश्वरी त्रिपुरसुन्दरी की श्रीयन्त्र के रूप में आराधना करने की परम्परा चली आ रही
है।
भैरवयामल तथा शक्तिलहरी में षोडशी मां की उपासना का विस्तृत परिचय मिलता है। दुर्वासा ऋषि श्रीविद्याके परमाराधक हुए हैं। षोडशी महाविद्या की उपासना श्रीचक्र में होती है। श्रीयन्त्र को यन्त्रराज की संज्ञा दी गई है इसमें दसों महाविद्याओं का अर्चन सम्पन्न हो जाता है। यदि पूजा के लिए कोई विग्रह उपलब्ध न हो तो मान्यता है कि शालग्राम, पारद शिवलिंग और श्रीयन्त्र इन तीनों में से कोई एक विग्रह भी उपलब्ध हो तो उसमें ही समस्त देवी-देवताओं की आराधना सम्पन्न की जा सकती है।
इस लोक में श्रीविद्या का सामान्य ज्ञान रखने वाले कुछ साधक तो सुलभ हैं परंतु विशेष ज्ञाता अत्यन्त दुर्लभ हैं। कारण, श्रीविद्या रहस्यमयी गुप्तविद्या है, इसका मंत्रोपदेश गुरु परम्परा द्वारा योग्य साधकों को ही दिया जाता है। भगवती की आराधना खाली दिखावे के लिये नहीं होनी चाहिये। उत्तम तो यही है कि जिनके पास पर्याप्त समय हो, विश्वास हो, श्रद्धा हो, जो नित्य इसका जप आदि कर सकने में सक्षम हों वे ही योग्य गुरु से श्रीविद्या के मन्त्र की दीक्षा लें और नित्य जपादि करें। हालांकि योग्य गुरु न मिलने पर आगमोक्त "मन्त्र ग्रहण विधि" का आश्रय लेकर भी साधक स्वयमेव दीक्षित हो सकता है परन्तु मार्गदर्शन तो गुरु ही करता है। इस श्रीविद्या का प्रकाशन हर किसी के समक्ष नहीं करना चाहिये। सामान्य आराधकों को स्तोत्रों के पाठ से ही भगवती की आराधना करनी चाहिये।
श्रीविद्योपासक दुर्गुणों का सर्वथा त्याग करे, श्रीविद्या की आराधना में सुपात्र बनना अति आवश्यक है। गुणवानों की निरन्तर निन्दा करने वाले, आर्जवशून्य (जिसमें इंद्रियों का दासत्व, सीधेपन का अभाव हो,कुटिल), नित्य स्त्रीप्रसंग करने वाले, उद्दण्ड, मन-वाणी-कर्म से गुरूभक्तिहीनता आदि दोषों से युक्त व्यक्ति से श्रीविद्या की सदा रक्षा करनी
चाहिये। 'षोडशिकार्णव' में कहा गया है "पराये गुरु के शिष्यों, नास्तिकों को, सुनने की अनिच्छा वालों को एवं अर्थ का अनर्थ ढाने वालों को यह विद्या कभी नहीं देनी चाहिये। अन्यथा उपदेष्टा गुरु शिष्य के पापों से लिप्त हो जाता है।" ध्यान की महिमा मन्त्र जप से भी अधिक बतलाई गई है। आद्याशक्ति श्रीविद्या के ये तीन प्रकार के मुख्य स्वरूप हैं- श्री बाला त्रिपुरसुन्दरी, श्री षोडशी त्रिपुरसुन्दरी और श्री ललिता त्रिपुरसुन्दरी।
श्रीविद्या की विस्तृत पूजा के विधि-विधान बहुत समयसाध्य हैं, अतः खड्गमाला, अष्टोत्तरशत नाम, सहस्रनाम आदि स्तोत्रों के द्वारा भी श्री ललिता महाविद्या की आराधना की जाती है। तन्त्र ग्रन्थों में षोडशी महाविद्या के प्रातः स्मरण, शतनाम, सहस्रनाम, मानस पूजन, कवच, हृदय, खड्गमाला आदि बहुत से उत्तम स्तोत्र मिलते हैं जिनके माध्यम से भगवती षोडशी की स्तोत्रात्मक स्तुति उत्तम प्रकार से की जाती है। आद्य शंकराचार्य जी द्वारा रचित 'सौंदर्य लहरी' नामक स्तोत्र सौ श्लोकों का है।
श्रीविद्या के सामान्य आराधकों को भगवती के विविध स्तोत्रों का सहारा ले लेना चाहिये। धर्मग्रन्थों में भगवती महात्रिपुरसुन्दरी के विविध स्तोत्रों का विशाल संग्रह प्राप्त होता है। यहां भगवती ललिताम्बा का प्रातः स्मरण स्तोत्र प्रस्तुत है, शङ्कराचार्यजी के द्वारा रचित इस स्तोत्र को ललितापंचक स्तोत्र अथवा ललिता पञ्चरत्न स्तोत्र भी कहा जाता है।
श्रीललितापञ्चरत्नम्
प्रात: स्मरामि ललिता-वदनारविन्दं विम्बाधरं पृथुल-मौक्तिक-शोभिनासम्। आकर्णदीर्घनयनं मणिकुण्डलाढ्यं मन्दस्मितं मृगमदोज्ज्वलभालदेशम्॥१॥
प्रातःकाल ललितादेवी के उस मनोहर मुखकमल का स्मरण करता हूँ, जिनके बिम्बसमान रक्तवर्ण अधर, विशाल मौक्तिक(मोती के बुलाक) से सुशोभित नासिका और कर्णपर्यन्त फैले हुए विस्तीर्ण नयन हैं जो मणिमय कुण्डल और मन्द मुसकान से युक्त हैं तथा जिनका ललाट कस्तूरिकातिलक से सुशोभित है।
प्रातर्भजामि ललिताभुजकल्पवल्लीं रक्ताङ्गुलीय-लसदङ्गुलि-पल्लवाढ्याम्। माणिक्यहेम-वलयाङ्गद-शोभमानां पुण्ड्रेक्षुचाप-कुसुमेषु-सृणीदधानाम्॥२॥
मैं श्रीललिता देवी की भुजारूपिणी कल्पलता का प्रातःकाल स्मरण करता हूँ जो लाल अंगूठी से सुशोभित सुकोमल अंगुलिरूप पल्लवों वाली तथा रत्नखचित सुवर्णकंकण और अंगदादि से भूषित है एवं जिन्होंने पुण्डू-ईख के धनुष, पुष्पमय बाण और अंकुश धारण किये हैं।
प्रातर्नमामि ललिताचरणारविन्दं भक्तेष्टदाननिरतं भवसिन्धुपोतम्। पद्मासनादि-सुरनायकपूजनीयं पद्माङ्कुश-ध्वज-सुदर्शन-लाञ्च्छनाढ्यम्॥३॥
मैं श्रीललितादेवी के चरणकमलों को, जो भक्तों को अभीष्ट फल देने वाले और संसारसागर के लिये सुदृढ़ जहाजरूप हैं तथा कमलासन श्रीब्रह्माजी आदि देवेश्वरों से पूजित और पद्म, अंकुश, ध्वज एवं सुदर्शनादि मंगलमय चिह्नों से युक्त हैं, प्रातःकाल नमस्कार करता हूँ।
प्रात: स्तुवे परशिवां ललितां भवानी त्रय्यन्त-वेद्यविभवां करुणानवद्याम्।
विश्वस्य सृष्टिविलयस्थिति-हेतुभूतां विद्येश्वरीं निगम-वाङ्गनसातिदूराम्॥४॥
मैं प्रातःकाल परमकल्याणरूपिणी श्रीललिता भवानी की स्तुति करता हूँ जिनका वैभव वेदान्तवेद्य है जो करुणामयी होने से शुद्धस्वरूपा हैं, विश्व की उत्पत्ति, स्थिति और लय की मुख्य हेतु हैं, विद्याकी अधिष्ठात्री देवी हैं तथा वेद, वाणी और मन की गति से अति दूर हैं।
प्रातर्वदामि ललिते तव पुण्यनाम कामेश्वरीति कमलेति महेश्वरीति। श्रीशाम्भवीति जगतां जननी परेति वाग्देवतेति वचसा त्रिपुरेश्वरीति॥५॥
हे ललिते! मैं तेरे पुण्यनाम कामेश्वरी, कमला, महेश्वरी, शाम्भवी, जगज्जननी, परा, वाग्देवी तथा त्रिपुरेश्वरी आदि का प्रातःकाल अपनी वाणी द्वारा उच्चारण करता हूँ।
य: श्लोकपञ्चकमिदं ललिताम्बिकाया: सौभाग्यदं सुललितं पठति प्रभाते। तस्मै ददाति ललिता झटिति प्रसन्ना विद्यां श्रियं विमल-सौख्यमनन्तकीर्तिम्॥६॥
माता ललिता के अति सौभाग्यप्रद और सुललित इन पाँच श्लोकों को जो पुरुष प्रातःकाल पढ़ता है उसे शीघ्र ही प्रसन्न होकर ललितादेवी विद्या, धन, निर्मल सुख और अनन्त कीर्ति देती हैं।
॥श्रीमच्छङ्कराचार्यकृतं श्रीललितापञ्चरत्नम् तत्सत्॥
भगवान् आद्य शङ्कराचार्य ने सौन्दर्यलहरी में ललिताम्बा षोडशी श्रीविद्या की स्तुति करते हुए कहा है कि "अमृत के समुद्र में एक मणि का द्वीप है, जिसमें कल्पवृक्षों की बारी है, नवरत्नों के नौ परकोटे हैं उस वन में चिन्तामणि से निर्मित महल में ब्रह्ममय सिंहासन है जिसमें पञ्चकृत्य के देवता ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र और ईश्वर आसन के पाये हैं और सदाशिव फलक हैं। सदाशिव की नाभि से निर्गत कमल पर विराजमान भगवती षोडशी त्रिपुरसुन्दरी का जो ध्यान करते हैं वे धन्य हैं। भगवती ललिता के प्रभाव से उन्हें भोग और मोक्ष दोनों सहज ही उपलब्ध हो जाते हैं।" जो षोडशी माता का आश्रय ग्रहण कर लेते हैं उनमें और ईश्वर में कोई भेद नहीं रह जाता है। वस्तुत: ललिताम्बा भगवती षोडशी की महिमा अवर्णनीय है। श्रीचक्रवासिनी षोडशी महाविद्या सर्वत्र व्याप्त हैं। संसार के समस्त मन्त्र-तन्त्र इनकी ही आराधना किया करते हैं। वेद भी इन महात्रिपुरसुन्दरी मां का वर्णन कर सकने में असमर्थ हैं। भक्तों को ललिता महाविद्या प्रसन्न होकर सब कुछ दे देती हैं अभीष्ट तो सीमित अर्थवाच्य है।
आद्याशक्ति भगवती षोडशी महाविद्या की जयंती तिथि - माघ मास की पूर्णिमा तिथि को जगज्जननी ललिता माता की विशेष आराधना की जाती है।
श्री विद्या आत्म साधना का क्रमांश
श्री विद्या साधना
इस साधना का साधक भोग तथा मोक्ष दोनों प्राप्त करने में समर्थ होता है। तंत्र में इस साधना कि पूर्णता को सर्वोच्च स्थिति माना गया है। इसकी पूर्ण सिद्धि प्राप्त साधक फिर पुरुष न रह कर युगपुरुष हो जाता है। इस साधना के द्वारा निम्नलिखित लाभ प्राप्त किये जा सकते हैं। :-
1. विवाह बाधा का निवारण।
2. गृहस्थ सुख में पूर्णता।
3. पूर्ण पौरुष प्राप्ति।
4. संतान प्राप्ति।
5. पूर्ण ऐश्वर्य।
6. विद्वत्व, कवित्व तथा कला निपुणता।
7. पूर्ण कुण्डलिनी जागरण।
8. आध्यात्मिक पूर्णता।
षोडशी त्रिपुर सुंदरी मंत्र।
"ह्रीं क ए ई ल ह्रीं ह स क ह ल ह्रीं स क ल ह्रीं। "
यदि यह मंत्र न कर सकें तो निम्नलिखित बीज मंत्र का जाप भी कर सकते हैं।
षोडशी त्रिपुर सुंदरी बीज मंत्र
!ह्रीं!
1. साधना के रूप में इसका पुरश्चरण सवा लाख मन्त्रों का होगा।
2. रात्रि 9 से 1 बजे तक का समय श्रेस्ठ माना जाता है।
3. प्रतिदिन षोडशी स्तोत्र या श्री सूक्त का पाठ आर्थिक लाभ देगा।
4. अपनी क्षमता के अनुसार ताम्बा, चांदी या सोने से निर्मित श्री यन्त्र के सामने जाप करना लाभप्रद होगा। अभाव में जगदम्बा के चित्र, मूर्ति, यन्त्र या मंदिर में जाप करना लाभप्रद होगा।
5. यह जाप यदि यन्त्र के सामने कर रहे हों तो जाप के बाद यन्त्र को गुलाबी रंग के रेशमी कपडे में लपेट कर रखें। प्रयास करें कि इस यन्त्र को कोई देख या स्पर्श न कर सके।
6. यन्त्र देवता तथा आपके बीच का एक माध्यम है, इसे यथा सम्भव गोपनीय तथा सात्विकता के साथ रखें।
7. मंत्र या स्तोत्र का पाठ पूरे मन से करें। विश्वास तथा श्रद्धा के साथ किया गया जाप सदैव जापकर्ता के लिए लाभदायक होता है।
8. साधना काल में प्रत्येक स्त्री को सम्मान दें, क्यूंकि प्रत्येक स्त्री जगदम्बा का ही प्रतिरूप है।
9. साधना काल में सामने दीपक जलाएं। माघ पूर्णिमा या किसी पूर्णिमा से जाप प्रारम्भ करें।
10. सात्विक भोजन करें। साधना काल में क्रोध न करें।
11. यदि चाहें तो साधना के स्थान पर प्रतिदिन पूजन के साथ कुछ समय के लिए उपरोक्त मंत्र का जाप कर सकते हैं।
त्रिपुर सुंदरी की साधना तथा मंत्र जाप जिस घर में होता है वह घर सभी दृष्टियों से पूर्ण होता है। ऐसे घर में स्वयं माँ अपने साधकों कि भौतिक तथा आध्यात्मिक इच्छाओं की पूर्ती के लिए तत्पर रहती हैं।
भगवती षोडशी महात्रिपुरसुन्दरी के श्री चरणों में हमारा अनन्त बार प्रणाम है।
श्री महात्रिपुरसुन्दरी ललिता माँ के प्रादुर्भाव की कथा
भगवती राजराजेश्वरी त्रिपुरसुन्दरी की
श्रीयन्त्र के रूप में आराधना करने की परम्परा पुरातन काल से ही चली आ रही है। मान्यता है कि जगज्जननी माँ ललिता का प्रादुर्भाव माघमास की पूर्णिमा को हुआ था। आद्याशक्ति भगवती ललिताम्बा की जयंती तिथि को इन भगवती की विशेष आराधना की जाती है। श्रीयंत्र-निवासिनी भगवती षोडशी महाविद्या ही त्रिपुराम्बा, श्रीविद्या, ललिता, महात्रिपुरसुन्दरी, श्रीमाता, त्रिपुरा आदि नामों से सुविख्यात हैं। 'ललिता नाम की व्युत्पत्ति पद्मपुराण में कही गयी है।
'लोकानतीत्य ललते ललिता तेन चोच्यते।' जो संसार से अधिक शोभाशाली हैं, वही भगवती ललिता हैं।
श्रीविद्या के लीलाविग्रह तो अनन्त हैं। श्रीमत्रिपुरसुन्दरी ललिता महाविद्या के विषय में कुछ भी लिखना सूर्यदेव को दीप दिखाने जैसा हैं क्योंकि अनंत का जितना भी वर्णन करें कम ही है। परंतु ऐसा होने पर भी ललिताम्बा की जो महिमा वर्णित हुई है ब्रह्माण्डपुराण, त्रिपुरारहस्य आदि पुराणेतिहासों में, उसके माध्यम से इन महात्रिपुरसुन्दरी मां की भक्ति में हम लग जाएं तो निश्चय ही जीवन सफल है। ललिता मां के प्रादुर्भाव के सन्दर्भ में ब्रह्माण्डपुराण के उत्तरखण्ड में जो मुख्य कथा वर्णित की गई है यहां प्रस्तुत है।
पूर्वकाल में शिवजी की क्रोधाग्नि द्वारा दग्ध काम की उस भस्म से गणेशजी के साथ खेलने के लिये भगवती पार्वती जी ने एक पुतला बनाया और उसको प्राणयुक्त कर दिया। तब उस तमोगुणी पिण्ड में भगवती रमा के द्वारा शापित माणिक्यशेखर के जीवन का प्रवेश होने से पिण्ड ने भयंकर रूप धारण कर लिया। यही भण्डासुर की उत्पत्ति का निमित्त बना।
उस भण्ड नाम के असुर ने श्रीशिवशंकर जी की आराधना की और उनसे अभय वर प्राप्त कर त्रिलोक आधिपत्य करते हुए देवताओं के हविर्भाग का भी स्वयमेव भोग करना आरम्भ किया। दुष्ट भण्डासुर जब इन्द्राणी का हरण करने की सोचने लगा तो इन्द्राणी उस असुर के डर से गौरी के निकट आश्रयार्थ गयीं। इधर भण्ड ने विशुक्र को पृथिवी का और विषङ्ग को पाताल का आधिपत्य दिया। उस दुष्ट ने स्वयं इन्द्रासन पर आरूढ़ होकर इन्द्रादि देवताओं को अपनी पालकी ढोने पर नियुक्त किया। दैत्यगुरु शुक्राचार्यजी ने दयावश होकर इन्द्रादिकों को इस दुर्गति से मुक्त किया।
असुरों की मूल राजधानी शोणितपुर को ही मयासुर के द्वारा स्वर्ग से भी सुन्दर बनवाकर उसका नया नाम शून्यकपुर रखकर वहीं पर भण्ड दैत्य राज्य करने लगा। स्वर्ग को उसने नष्ट कर डाला। दिक्पालों के स्थान में अपने बनाये हुए दैत्यों को ही उसने बैठाया। इस प्रकार एक सौ पाँच ब्रह्माण्डों पर उसने आक्रमण किया और उनको अपने अधिकार में कर लिया।
अनन्तर भण्ड दैत्य ने फिर घोर तपस्या कर शिवजी से अमरत्व का वरदान पाया। इन्द्राणी ने गौरी का आश्रय पाया है, यह सुनकर दुष्ट भण्डासुर दैत्यसेना के साथ कैलास गया और गणेशजी की भर्त्सना कर उनसे इन्द्राणी को अपने लिये माँगने लगा। भण्डासुर की ऐसी दुष्टता देखकर गणेशजी क्रुद्ध होकर प्रमथादि गणों को साथ लेते हुए उससे युद्ध करने लगे। अपने पुत्र गणेश को युद्धप्रवृत्त देखकर गणेशजी की सहायता करने के लिये भगवती गौरी अपनी कोटि-कोटि शक्तियों के साथ युद्धस्थल में आकर दैत्यों से युद्ध करने लगीं। इधर गणेशजी की गदा के प्रहार से मूर्छित होकर पुन: प्रकृतिस्थ होते ही भण्डासुर ने उनको अङ्कुशाघांत से गिराया। माता गौरी यह देखकर बहुत क्रुद्ध हुईं और हुङ्कार से भण्डासुर को बाँधकर ज्यों ही मारने के लिये उद्यत हुईं त्यों ही ब्रह्माजी ने गौरी को शङ्करजी के दिये हुए अमरत्व-वर- प्रदान का स्मरण दिलाया। शिवजी के वरदान का मान रखने के लिये विवश होकर गौरी ने भण्डासुर को छोड़ दिया।
इस प्रकार भण्ड दैत्य से त्रस्त होकर इन्द्रादि देवों ने देवगुरु वृहस्पतिजी की आज्ञानुसार हिमाचल में त्रिपुरादेवी के उद्देश्य से 'तान्त्रिक महायाग' करना आरम्भ किया। अन्तिम दिन याग समाप्त कर जब देवगण श्रीमाता की स्तुति कर रहे थे, इतने ही में ज्वाला के बीच से महाशब्दपूर्वक अत्यन्त तेजस्विनी त्रिपुराम्बा प्रादुर्भूत हुईं। उस महाशब्द को सुनकर तथा उस लोकोत्तर प्रकाशपुञ्ज को देखकर देवगुरु वृहस्पति के सिवा सब देवतागण बधिर तथा अन्ध होते हुए मूर्च्छित हो गये।
साक्षात् ललिताम्बा को समक्ष देख देवगुरु तथा ब्रह्माजी ने हर्षगद्गद स्वर से श्रीमाता की स्तुति की। श्रीमाता ने प्रसन्न होकर उनका अभीष्ट पूछा। उन्होंने भी भण्डासुर की कथा सुनाकर उसके नाश की प्रार्थना की। माता ने भी उस दुष्ट असुर को मारना स्वीकार किया और मूर्च्छित इन्द्रादि देवों को अपनी अमृतमय कृपादृष्टि से चैतन्यत्रिपुरसुन्दरी साधना

माहेश्वरी शक्ति स्वरुपिणी षोडशी सबसे मनोहर श्रीविग्रह वाली सिद्ध देवी हैं। महाविद्याओं में भगवती षोडशी का चौथा स्थान है। षोडशी महाविद्या को श्रीविद्या भी कहा जाता है। षोडशी महाविद्या के ललिता, त्रिपुरा, राज राजेश्वरी, महात्रिपुरसुन्दरी, बालापञ्चदशी आदि अनेक नाम हैं। लक्ष्मी सरस्वती, ब्रह्माणी - तीनों लोकों की सम्पत्ति एवं शोभा का ही नाम श्री है। 'त्रिपुरा' शब्द का अर्थ बताते हुए-'शक्तिमहिम्न स्तोत्र' में कहा गया है
श्री माँ महाविद्या
'तिसृभ्यो मूर्तिभ्यः पुरातनत्वात् त्रिपुरा। अर्थात् जो ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश- इन तीनों से पुरातन हो वही त्रिपुरा हैं। 'त्रिपुरार्णव' ग्रन्थ में कहा गया है
नाडीत्रयं तु त्रिपुरा सुषुम्ना पिङ्गला विडा। मनो बुद्धिस्तथा चित्तं पुरत्रयमुदाहृतम्। तत्र तत्र वसत्येषा तस्मात् तु त्रिपुरा मता।। अर्थात् 'सुषुम्ना, पिंगला और इडा - ये तीनों नाडियां हैं और मन, बुद्धि एवं चित्त - ये तीन पुर हैं। इनमें रहने के कारण इनका नाम त्रिपुरा है।'
सोलह अक्षरों के मन्त्रवाली ललिता देवी की अङ्गकान्ति उदीयमान सूर्यमण्डल की आभा की भांति है। षोडशी माता की चार भुजाएं तीन नेत्र हैं। ये शान्तमुद्रा में लेटे हुए सदाशिव पर स्थित कमल के आसन पर आसीन हैं। भगवती षोडशी के चारों हाथों में क्रमश: पाश, अङ्कुश, धनुष और बाण सुशोभित हैं। वर देने के लिये सदा-सर्वदा तत्पर भगवती षोडशी का श्रीविग्रह सौम्य और हृदय दया से आपूरित है।
प्रशान्त हिरण्यगर्भ ही शिव हैं और उन्हीं की शक्ति षोडशी जी हैं। तन्त्रशास्त्रों में महाविद्या षोडशी देवी को पञ्चवक्त्रा अर्थात् पाँच मुखों वाली बताया गया है। चारों दिशाओं में चार मुख और एक ऊपर की ओर मुख होने से इन्हें पञ्चवक्त्रा कहा जाता है। देवी के पाँचों मुख तत्पुरुष, सद्योजात, वामदेव अघोर और ईशान शिव के पाँचों रूपों के प्रतीक हैं। पाँचों दिशाओं के रंग क्रमशः हरित, रक्त, धूम्र, नील और पीत होने से ये मुख भी इन्हीं रंगों के हैं । देवी षोडशी के दस हाथों में क्रमश: अभय, टंक, शूल, वज्र, पाश, खड्ग, अंकुश, 1. घण्टा, नाग और अग्नि हैं। षोडश कलाएँ पूर्णरूप से विकसित होने के कारण ये महाविद्या षोडशी कहलाती हैं।
त्रिपुरारहस्य में वर्णन है कि त्रिपुराम्बा ललिता भगवती ने भण्डासुर नामक असुर का वध किया था। ललिता मां को आद्याशक्ति माना जाता है। अन्य विद्याएँ भोग या मोक्ष में से एक ही देती हैं परंतु भगवती महात्रिपुरसुंदरी ललिता महाविद्या अपने उपासक को भुक्ति और मुक्ति दोनों प्रदान करती हैं। इन आद्याशक्ति षोडशी महाविद्या के स्थूल, सूक्ष्म, पर तथा तुरीय चार रूप हैं।
एक बार पराम्बा पार्वतीजी ने भगवान् शिव से पूछा- "भगवन्! आपके द्वारा प्रकाशित तन्त्रशास्त्र की साधना से जीव के आधि-व्याधि, शोक-संताप, दीनता-हीनता तो दूर हो जायेंगे किन्तु गर्भवास और मरण के असह्य दुःख की निवृति तो इससे नहीं होगी। कृपा करके इस दुःख से निवृत्ति और मोक्षपद की प्राप्ति का कोई उपाय बताइये ।"
परम कल्याणमयी पराम्बा के अनुरोध पर भगवान् शंकर ने षोडशी श्रीविद्यासाधना-प्रणाली को प्रकट किया। भगवान् शङ्कराचार्य ने भी श्रीविद्या के रूप में इन्हीं षोडशी देवी की उपासना की थी। इसीलिये आज भी सभी शाङ्कर पीठों में भगवती षोडशी राजराजेश्वरी त्रिपुरसुन्दरी की श्रीयन्त्र के रूप में आराधना करने की परम्परा चली आ रही
है।
भैरवयामल तथा शक्तिलहरी में षोडशी मां की उपासना का विस्तृत परिचय मिलता है। दुर्वासा ऋषि श्रीविद्याके परमाराधक हुए हैं। षोडशी महाविद्या की उपासना श्रीचक्र में होती है। श्रीयन्त्र को यन्त्रराज की संज्ञा दी गई है इसमें दसों महाविद्याओं का अर्चन सम्पन्न हो जाता है। यदि पूजा के लिए कोई विग्रह उपलब्ध न हो तो मान्यता है कि शालग्राम, पारद शिवलिंग और श्रीयन्त्र इन तीनों में से कोई एक विग्रह भी उपलब्ध हो तो उसमें ही समस्त देवी-देवताओं की आराधना सम्पन्न की जा सकती है।
इस लोक में श्रीविद्या का सामान्य ज्ञान रखने वाले कुछ साधक तो सुलभ हैं परंतु विशेष ज्ञाता अत्यन्त दुर्लभ हैं। कारण, श्रीविद्या रहस्यमयी गुप्तविद्या है, इसका मंत्रोपदेश गुरु परम्परा द्वारा योग्य साधकों को ही दिया जाता है। भगवती की आराधना खाली दिखावे के लिये नहीं होनी चाहिये। उत्तम तो यही है कि जिनके पास पर्याप्त समय हो, विश्वास हो, श्रद्धा हो, जो नित्य इसका जप आदि कर सकने में सक्षम हों वे ही योग्य गुरु से श्रीविद्या के मन्त्र की दीक्षा लें और नित्य जपादि करें। हालांकि योग्य गुरु न मिलने पर आगमोक्त "मन्त्र ग्रहण विधि" का आश्रय लेकर भी साधक स्वयमेव दीक्षित हो सकता है परन्तु मार्गदर्शन तो गुरु ही करता है। इस श्रीविद्या का प्रकाशन हर किसी के समक्ष नहीं करना चाहिये। सामान्य आराधकों को स्तोत्रों के पाठ से ही भगवती की आराधना करनी चाहिये।
श्रीविद्योपासक दुर्गुणों का सर्वथा त्याग करे, श्रीविद्या की आराधना में सुपात्र बनना अति आवश्यक है। गुणवानों की निरन्तर निन्दा करने वाले, आर्जवशून्य (जिसमें इंद्रियों का दासत्व, सीधेपन का अभाव हो,कुटिल), नित्य स्त्रीप्रसंग करने वाले, उद्दण्ड, मन-वाणी-कर्म से गुरूभक्तिहीनता आदि दोषों से युक्त व्यक्ति से श्रीविद्या की सदा रक्षा करनी
चाहिये। 'षोडशिकार्णव' में कहा गया है "पराये गुरु के शिष्यों, नास्तिकों को, सुनने की अनिच्छा वालों को एवं अर्थ का अनर्थ ढाने वालों को यह विद्या कभी नहीं देनी चाहिये। अन्यथा उपदेष्टा गुरु शिष्य के पापों से लिप्त हो जाता है।" ध्यान की महिमा मन्त्र जप से भी अधिक बतलाई गई है। आद्याशक्ति श्रीविद्या के ये तीन प्रकार के मुख्य स्वरूप हैं- श्री बाला त्रिपुरसुन्दरी, श्री षोडशी त्रिपुरसुन्दरी और श्री ललिता त्रिपुरसुन्दरी।
श्रीविद्या की विस्तृत पूजा के विधि-विधान बहुत समयसाध्य हैं, अतः खड्गमाला, अष्टोत्तरशत नाम, सहस्रनाम आदि स्तोत्रों के द्वारा भी श्री ललिता महाविद्या की आराधना की जाती है। तन्त्र ग्रन्थों में षोडशी महाविद्या के प्रातः स्मरण, शतनाम, सहस्रनाम, मानस पूजन, कवच, हृदय, खड्गमाला आदि बहुत से उत्तम स्तोत्र मिलते हैं जिनके माध्यम से भगवती षोडशी की स्तोत्रात्मक स्तुति उत्तम प्रकार से की जाती है। आद्य शंकराचार्य जी द्वारा रचित 'सौंदर्य लहरी' नामक स्तोत्र सौ श्लोकों का है।
श्रीविद्या के सामान्य आराधकों को भगवती के विविध स्तोत्रों का सहारा ले लेना चाहिये। धर्मग्रन्थों में भगवती महात्रिपुरसुन्दरी के विविध स्तोत्रों का विशाल संग्रह प्राप्त होता है। यहां भगवती ललिताम्बा का प्रातः स्मरण स्तोत्र प्रस्तुत है, शङ्कराचार्यजी के द्वारा रचित इस स्तोत्र को ललितापंचक स्तोत्र अथवा ललिता पञ्चरत्न स्तोत्र भी कहा जाता है।
श्रीललितापञ्चरत्नम्
प्रात: स्मरामि ललिता-वदनारविन्दं विम्बाधरं पृथुल-मौक्तिक-शोभिनासम्। आकर्णदीर्घनयनं मणिकुण्डलाढ्यं मन्दस्मितं मृगमदोज्ज्वलभालदेशम्॥१॥
प्रातःकाल ललितादेवी के उस मनोहर मुखकमल का स्मरण करता हूँ, जिनके बिम्बसमान रक्तवर्ण अधर, विशाल मौक्तिक(मोती के बुलाक) से सुशोभित नासिका और कर्णपर्यन्त फैले हुए विस्तीर्ण नयन हैं जो मणिमय कुण्डल और मन्द मुसकान से युक्त हैं तथा जिनका ललाट कस्तूरिकातिलक से सुशोभित है।
प्रातर्भजामि ललिताभुजकल्पवल्लीं रक्ताङ्गुलीय-लसदङ्गुलि-पल्लवाढ्याम्। माणिक्यहेम-वलयाङ्गद-शोभमानां पुण्ड्रेक्षुचाप-कुसुमेषु-सृणीदधानाम्॥२॥
मैं श्रीललिता देवी की भुजारूपिणी कल्पलता का प्रातःकाल स्मरण करता हूँ जो लाल अंगूठी से सुशोभित सुकोमल अंगुलिरूप पल्लवों वाली तथा रत्नखचित सुवर्णकंकण और अंगदादि से भूषित है एवं जिन्होंने पुण्डू-ईख के धनुष, पुष्पमय बाण और अंकुश धारण किये हैं।
प्रातर्नमामि ललिताचरणारविन्दं भक्तेष्टदाननिरतं भवसिन्धुपोतम्। पद्मासनादि-सुरनायकपूजनीयं पद्माङ्कुश-ध्वज-सुदर्शन-लाञ्च्छनाढ्यम्॥३॥
मैं श्रीललितादेवी के चरणकमलों को, जो भक्तों को अभीष्ट फल देने वाले और संसारसागर के लिये सुदृढ़ जहाजरूप हैं तथा कमलासन श्रीब्रह्माजी आदि देवेश्वरों से पूजित और पद्म, अंकुश, ध्वज एवं सुदर्शनादि मंगलमय चिह्नों से युक्त हैं, प्रातःकाल नमस्कार करता हूँ।
प्रात: स्तुवे परशिवां ललितां भवानी त्रय्यन्त-वेद्यविभवां करुणानवद्याम्।
विश्वस्य सृष्टिविलयस्थिति-हेतुभूतां विद्येश्वरीं निगम-वाङ्गनसातिदूराम्॥४॥
मैं प्रातःकाल परमकल्याणरूपिणी श्रीललिता भवानी की स्तुति करता हूँ जिनका वैभव वेदान्तवेद्य है जो करुणामयी होने से शुद्धस्वरूपा हैं, विश्व की उत्पत्ति, स्थिति और लय की मुख्य हेतु हैं, विद्याकी अधिष्ठात्री देवी हैं तथा वेद, वाणी और मन की गति से अति दूर हैं।
प्रातर्वदामि ललिते तव पुण्यनाम कामेश्वरीति कमलेति महेश्वरीति। श्रीशाम्भवीति जगतां जननी परेति वाग्देवतेति वचसा त्रिपुरेश्वरीति॥५॥
हे ललिते! मैं तेरे पुण्यनाम कामेश्वरी, कमला, महेश्वरी, शाम्भवी, जगज्जननी, परा, वाग्देवी तथा त्रिपुरेश्वरी आदि का प्रातःकाल अपनी वाणी द्वारा उच्चारण करता हूँ।
य: श्लोकपञ्चकमिदं ललिताम्बिकाया: सौभाग्यदं सुललितं पठति प्रभाते। तस्मै ददाति ललिता झटिति प्रसन्ना विद्यां श्रियं विमल-सौख्यमनन्तकीर्तिम्॥६॥
माता ललिता के अति सौभाग्यप्रद और सुललित इन पाँच श्लोकों को जो पुरुष प्रातःकाल पढ़ता है उसे शीघ्र ही प्रसन्न होकर ललितादेवी विद्या, धन, निर्मल सुख और अनन्त कीर्ति देती हैं।
॥श्रीमच्छङ्कराचार्यकृतं श्रीललितापञ्चरत्नम् तत्सत्॥
भगवान् आद्य शङ्कराचार्य ने सौन्दर्यलहरी में ललिताम्बा षोडशी श्रीविद्या की स्तुति करते हुए कहा है कि "अमृत के समुद्र में एक मणि का द्वीप है, जिसमें कल्पवृक्षों की बारी है, नवरत्नों के नौ परकोटे हैं उस वन में चिन्तामणि से निर्मित महल में ब्रह्ममय सिंहासन है जिसमें पञ्चकृत्य के देवता ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र और ईश्वर आसन के पाये हैं और सदाशिव फलक हैं। सदाशिव की नाभि से निर्गत कमल पर विराजमान भगवती षोडशी त्रिपुरसुन्दरी का जो ध्यान करते हैं वे धन्य हैं। भगवती ललिता के प्रभाव से उन्हें भोग और मोक्ष दोनों सहज ही उपलब्ध हो जाते हैं।" जो षोडशी माता का आश्रय ग्रहण कर लेते हैं उनमें और ईश्वर में कोई भेद नहीं रह जाता है। वस्तुत: ललिताम्बा भगवती षोडशी की महिमा अवर्णनीय है। श्रीचक्रवासिनी षोडशी महाविद्या सर्वत्र व्याप्त हैं। संसार के समस्त मन्त्र-तन्त्र इनकी ही आराधना किया करते हैं। वेद भी इन महात्रिपुरसुन्दरी मां का वर्णन कर सकने में असमर्थ हैं। भक्तों को ललिता महाविद्या प्रसन्न होकर सब कुछ दे देती हैं अभीष्ट तो सीमित अर्थवाच्य है।
आद्याशक्ति भगवती षोडशी महाविद्या की जयंती तिथि - माघ मास की पूर्णिमा तिथि को जगज्जननी ललिता माता की विशेष आराधना की जाती है।
श्री विद्या आत्म साधना का क्रमांश
श्री विद्या साधना
इस साधना का साधक भोग तथा मोक्ष दोनों प्राप्त करने में समर्थ होता है। तंत्र में इस साधना कि पूर्णता को सर्वोच्च स्थिति माना गया है। इसकी पूर्ण सिद्धि प्राप्त साधक फिर पुरुष न रह कर युगपुरुष हो जाता है। इस साधना के द्वारा निम्नलिखित लाभ प्राप्त किये जा सकते हैं। :-
1. विवाह बाधा का निवारण।
2. गृहस्थ सुख में पूर्णता।
3. पूर्ण पौरुष प्राप्ति।
4. संतान प्राप्ति।
5. पूर्ण ऐश्वर्य।
6. विद्वत्व, कवित्व तथा कला निपुणता।
7. पूर्ण कुण्डलिनी जागरण।
8. आध्यात्मिक पूर्णता।
षोडशी त्रिपुर सुंदरी मंत्र।
"ह्रीं क ए ई ल ह्रीं ह स क ह ल ह्रीं स क ल ह्रीं। "
यदि यह मंत्र न कर सकें तो निम्नलिखित बीज मंत्र का जाप भी कर सकते हैं।
षोडशी त्रिपुर सुंदरी बीज मंत्र
!ह्रीं!
1. साधना के रूप में इसका पुरश्चरण सवा लाख मन्त्रों का होगा।
2. रात्रि 9 से 1 बजे तक का समय श्रेस्ठ माना जाता है।
3. प्रतिदिन षोडशी स्तोत्र या श्री सूक्त का पाठ आर्थिक लाभ देगा।
4. अपनी क्षमता के अनुसार ताम्बा, चांदी या सोने से निर्मित श्री यन्त्र के सामने जाप करना लाभप्रद होगा। अभाव में जगदम्बा के चित्र, मूर्ति, यन्त्र या मंदिर में जाप करना लाभप्रद होगा।
5. यह जाप यदि यन्त्र के सामने कर रहे हों तो जाप के बाद यन्त्र को गुलाबी रंग के रेशमी कपडे में लपेट कर रखें। प्रयास करें कि इस यन्त्र को कोई देख या स्पर्श न कर सके।
6. यन्त्र देवता तथा आपके बीच का एक माध्यम है, इसे य

Sadvani 071“जो होना है वह होगा", सम्पूर्ण सत्य है। अपने और दूसरे के जीवन का इतिहास उलट कर देखने से ज्ञात होगा कि मनुष्य ...
12/01/2026

Sadvani 071

“जो होना है वह होगा", सम्पूर्ण सत्य है।

अपने और दूसरे के जीवन का इतिहास उलट कर देखने से ज्ञात होगा कि मनुष्य स्वयं (ही) कितना कर सकता है एवं अलक्ष्य शक्ति के अदृश्य विधान से (ही) कितना संघटित होता है!

यह जगत् उसी परम पिता की इच्छा से सुचारु रूप से नियमित है; और 'वे हमें जिस अवस्था में रखेंगे व लायेंगे वही हमें स्वीकार करना होगा।

इस सिद्धान्त को जितना अपना सकोगे उतना ही निर्भरता का भाव दृढ होगा एवं ईश्वरी-शक्ति के प्रति भक्ति और विश्वास से प्रेम-नेत्र उन्मीलित होंगे।

“जगत् का प्रकाश आता-जाता है, वह अस्थिर है। जो प्रकाश शाश्वत है, उसे कभी बुझाया नहीं जा सकता।इसी प्रकाश से तुम बाहरी प्रक...
27/11/2025

“जगत् का प्रकाश आता-जाता है, वह अस्थिर है। जो प्रकाश शाश्वत है, उसे कभी बुझाया नहीं जा सकता।
इसी प्रकाश से तुम बाहरी प्रकाश को और विश्व की समस्त वस्तुओं को देखते हो; यही प्रकाश सदा तुम्हारे भीतर चमकता रहता है, इसी कारण तुम बाहरी प्रकाश को देख पाते हो।
विश्व में जो कुछ भी तुम्हें दिखलाई देता है, वह केवल तुम्हारे भीतर विराजमान उस महाप्रकाश के कारण ही संभव है, और क्योंकि वस्तुओं के तत्त्व का परम ज्ञान तुम्हारे स्वभाव की गहराइयों में छिपा हुआ है, इसी कारण तुम किसी भी प्रकार का ज्ञान अर्जित कर सकते हो।”
~ श्री आनन्दमयी माँ

17/09/2025

काँटों और झाड़ियों से भरे जंगल में नंगे पैर चलना असंभव है। ऐसा तभी संभव है जब पूरा जंगल चमड़े से ढका हो, या अपने पैरों को चमड़े के जूतों से सुरक्षित रखा हो। पूरे जंगल को चमड़े से ढकना असंभव है, इसलिए अपने पैरों को जूतों से सुरक्षित रखना ही समझदारी है। इसी प्रकार, इस संसार में मनुष्य असंख्य इच्छाओं और कामनाओं से ग्रस्त है, और इनसे मुक्ति के केवल दो ही उपाय हैं, या तो उन सभी इच्छाओं को पूरा कर लिया जाए, या उन सभी का त्याग कर दिया जाए। लेकिन सभी मानवीय इच्छाओं को पूरा करना असंभव है; क्योंकि उन्हें पूरा करने के प्रत्येक प्रयास के साथ, नई इच्छाएँ उत्पन्न होती हैं। इसलिए संतोष और सत्य के ज्ञान द्वारा अपनी इच्छाओं को कम करना ही समझदारी है।

भगवान श्री रामकृष्ण
(श्री रामकृष्ण के वचन)

15/09/2025
श्री हरि              श्रीवृंदावन में ताडवाली कुंज में पूज्य पंडित श्रीजगन्नाथदास भक्तमाली जी का उत्सव चल रहा था और रसिक...
05/09/2025

श्री हरि
श्रीवृंदावन में ताडवाली कुंज में पूज्य पंडित श्रीजगन्नाथदास भक्तमाली जी का उत्सव चल रहा था और रसिक जी के सुपुत्र का पाटी पूजन होना था तो पूज्य बक्सर वाले मामा जी महाराज , पूज्य सद्गुरुदेव श्री गणेशदास भक्तमाली जी महाराज और अनेक महापुरुष वहाँ उपस्थित थे ।ऋषि पंचमी की तिथि थी ।बालक का पाटीपूजन अक्षरारंभ होना था ।पूज्य भक्तमाली जी महाराज जी से निवेदन किया गया कि पहले पाटी पर आप अपने करकमल से कुछ लिख दे , इसके बाद बालक से बत्ती पकड़ कर कुछ लिखवाया जाएगा । पूज्य मामा जी ने ये सब प्रार्थना की । तो पूज्य भक्तमाली जी ने हाथ में बत्ती ली और स्लेट के ऊपर लिखा “ श्री राधा “ । फिर नीचे उर्दू में लिखा “ श्री राधा “ , फिर उसके नीचे अंग्रेज़ी में लिखा “ श्री राधा “ , फिर बंग्ला में लिखा “ श्री राधा “ , फिर उड़िया में लिखा “ श्री राधा “ और फिर तमिल , तेलुगू , कन्नड़ इन सब भाषाओं में “ श्री राधा “ “श्री राधा “ “श्री राधा “ ऐसे लिख रहे थे जैसे इन भाषा में महाराज जी पूर्ण पारंगत हो । अनेकों भाषाओं में “श्री राधा “ “श्री राधा “ “श्री राधा “ लिख दिया । पूज्य बक्सर वाले महाराज जी चश्मा लगाकर बड़ी गौर से देख रहे थे । ये सब अचरज देखकर पूज्य बक्सर वाले मामा जी पूज्य भक्तमाली जी से बोले - “ सरकार _ आप जिस जमाने में पढ़े हैं , उस जमाने में उर्दू चलती थी _ तो यहाँ तक तो समझ में आ गया आपने उर्दू में “श्री राधा “ लिखा _ आप बताइए सरकार आप अंग्रेज़ी कब पढ़े ? या अंग्रेज़ी भी पढ़े हैं ? “। तो पूज्य भक्तमाली जी महाराज जी ने ना में सिर हिला दिया कि नहीं अंग्रेज़ी नहीं पढ़े हैं । बक्सर वाले महाराज जी बोले _ “ आप अंग्रेज़ी भी नहीं पढ़े और अन्य अन्य लिपियों में “ श्री राधा “ “श्री राधा “ “श्री राधा “ लिखा _ इन लिपियों को आपने सरकार कब सीखा ?“ ।तो पूज्य भक्तमाली महाराज जी मुस्कुरा दिए और जितना लिखा था , ऊपर एक “श्री राधा “ छोड़कर कर के सब अपने गमछा से पोंछ दिया और मामा जी की और देखकर कर के मुस्कुराए ।
पूज्य मामा जी ने गदगद हो कर कहा - “ सरकार _ जहां से सारी भाषाएँ प्रकट हुई हैं , उन्हें आपने पढ़ लिया है _ इसलिए आपके लिये कोई आश्चर्य नहीं “ ।

"पालधी महाशय की जीवंत अनुभूति"[गोपीनाथ कविराज जी की उपस्थिति में एक निराश साधक को अपने जीवन के अनुभव से प्रेरक धैर्य बंध...
04/09/2025

"पालधी महाशय की जीवंत अनुभूति"
[गोपीनाथ कविराज जी की उपस्थिति में एक निराश साधक को अपने जीवन के अनुभव से प्रेरक धैर्य बंधाते पालधी महाशय, स्रोत : मनीषी की लोकयात्रा]

"बेटा, घबराओ नहीं। निष्ठा के साथ गुरु-आज्ञा पालन करते रहो। कभी न कभी फल अवश्य मिलेगा। देखो! मैं भी गुरु से साधन लेकर 11 वर्ष तक उनके सान्निध्य में साधन करता रहा। उस समय गुरु के सत्संग का आनंद अवश्य था किंतु अपनी साधन-लब्ध अनुभूति कुछ भी नहीं थी। 1895 ई. में जब गुरुदेव का देहांत हुआ तब मैं अभिभूत हो गया था। समझने लगा कि अब मेरा आध्यात्मिक उत्कर्ष असंभव है। जब इतने महान् गुरु के सामने रहकर कुछ भी न प्राप्त कर सका तो अब आशा ही क्या है! कभी-कभी मेरे मन में अत्यंत विषाद और अवसाद का संचार होता था। साधन छोड़ देने की इच्छा भी होती थी। इसी समय मन में विवेक की वाणी उठी कि साधना करना न छोड़ो। उसके आधार पर मैं पूर्ववत् साधनरत रहा। सोचा, कुछ फल-लाभ हो या न हो, मैं साधना से विरक्त न हूॅंगा। इस प्रकार से गुरु के तिरोधान के बाद 13 वर्ष तक मैंने नियमित रूप से साधना की।
उसके बाद एक दिन प्रातःकाल मैं नित्यक्रिया के लिए बाथरूम में गया था। अकस्मात् स्नानागार में ही समाधिस्थ हो गया। मेरा देहात्मबोध, बाह्यज्ञान सब कुछ एक क्षण के भीतर मिट गया और एक विराट् सत्ता के प्रकाश का अनुभव होने लगा। मेरे गुरुदेव श्री लाहिड़ी महाशय की चिन्मय मूर्ति प्रत्यक्ष हुई। यह जो प्रकाश हुआ फिर उस पर आवरण कभी नहीं पड़ा। मैं कई घंटे तक इसी अवस्था में पड़ा रहा। घर के लोग मेरी यह स्थिति देखकर चकित हो गये परंतु मुझे स्पर्श नहीं किया। बहुत देर के बाद मेरा उत्थान हुआ। उसके साथ ही शोक-दुःखादि सर्वदा के लिए अंतर्हित हो गये। इसीलिए मैं कहता हूॅं कि किसके लिए कब महाक्षण आयेगा, यह कोई नहीं जानता। अतः साधक को किसी भी स्थिति में निराश होकर अपना कर्तव्य नहीं छोड़ना चाहिए।"

(स्रोत : मनीषी की लोकयात्रा)

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