पवित्र बाइबिल के वचन

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जय मसीह की! 🙏
आप सभी का हमारे नए पेज 'पवित्र बाइबिल के वचन' पर स्वागत है। 📖✨

इस पेज का मक़सद प्रभु के वचन को हर एक दिल तक पहुँचाना है। रोज़ाना पवित्र वचन और आशीष पाने के लिए इस पेज को फॉलो करें और दोस्तों के साथ शेयर करें।

प्रभु यीशु आप सभी को आशीष दे

26/08/2026

सबसे पहली चीज़ जिसे ख़ुदा नया करना चाहता है, वह हैं आप।

*"अगर कोई मसीह में है, तो वह नई सृष्टि है। पुरानी बातें बीत गई हैं। देखो, सब कुछ नया हो गया है।" - २ कुरिन्थियों ५:१७

और

*"तुम्हें अपनी पुरानी ज़िंदगी को उतार देना है, जो अपनी धोकेबाज़ ख़्वाहिशों की वजह बिगड़ता चला जाता है। अपने मन की सोच में नए बनते जाओ और नए स्वभाव को पहन लो, जो ख़ुदा के स्वरूप के अनुसार हक़ीक़ी रास्तबाज़ी और पाकीज़गी में रचा गया है।" - इफ़िसियों ४:२२-२४ HINOVBSI

आने वाले दिनों में हम, हमारी ज़िंदगी के उन अलग-अलग हिस्सों के बारे में बात करेंगे जिन्हें ख़ुदा नया करना सबसे पहली चीज़ जिसे ख़ुदा नया करना चाहता है, वह हैं आप।

*"अगर कोई मसीह में है, तो वह नई सृष्टि है। पुरानी बातें बीत गई हैं। देखो, सब कुछ नया हो गया है।" - २ कुरिन्थियों ५:१७

और

*"तुम्हें अपनी पुरानी ज़िंदगी को उतार देना है, जो अपनी धोकेबाज़ ख़्वाहिशों की वजह बिगड़ता चला जाता है। अपने मन की सोच में नए बनते जाओ और नए स्वभाव को पहन लो, जो ख़ुदा के स्वरूप के अनुसार हक़ीक़ी रास्तबाज़ी और पाकीज़गी में रचा गया है।" - इफ़िसियों ४:२२-२४ HINOVBSI

आने वाले दिनों में हम, हमारी ज़िंदगी के उन अलग-अलग हिस्सों के बारे में बात करेंगे जिन्हें ख़ुदा नया करना चाहता है।

ग़ौर करें कि यहाँ यह नहीं लिखा कि नया बनने के लिए आपको बहुत मेहनत करनी है या बहुत से नेक काम करके इसे कमाना है।

यह करना बहुत आसान हैं:

मसीह में बने रहे।
ख़ुदको नया बनने दे। (अपनी कोशिशों से नहीं।)
अपने नए स्वभाव को पहने। (बस उसे क़बूल कर लो।)
यह इतना ही आसान है और यह कितना अद्भुत तोहफ़ा है! है। लेकिन आज मैं चाहता हूँ कि आप ऊपर दी गई आयतों को फ़िर से पढ़ें और इस बात पर मनन करें कि नए बनाए हुए स्वभाव की हक़ीक़त में कितनी अहमियत होती है।

ग़ौर करें कि यहाँ यह नहीं लिखा कि नया बनने के लिए आपको बहुत मेहनत करनी है या बहुत से नेक काम करके इसे कमाना है।

यह करना बहुत आसान हैं:

मसीह में बने रहे।
ख़ुदको नया बनने दे। (अपनी कोशिशों से नहीं।)
अपने नए स्वभाव को पहने। (बस उसे क़बूल कर लो।)
यह इतना ही आसान है और यह कितना अद्भुत तोहफ़ा है!

26/08/2026

क्या कभी इस दुनिया की हालत देखकर आपका हौसला टूटता है? मेरा हौसला तो कई बार टूटा है। जब मैं जंगो, गुनाहों और आपदाओं की ख़बरें देखता हूँ, तो दिल में यह सवाल उठता है, "आख़िर यह दुनिया किस तरफ़ जा रही है?"

ऐसे वक़्त, मुझे ख़ुदा का वह वादा याद आता है कि एक दिन वह सब कुछ नया कर देगा।

*"वह उनकी आँखों से हर आँसू पोंछ देगा। फ़िर न मौत रहेगी, न मातम, न रोना और न दर्द, क्योंकि पुरानी बातें बीत गई हैं। जो सिंहासन पर बैठा था, उसने कहा, 'देखो, मैं सब कुछ नया कर रहा हूँ!'" - प्रकाशित वाक्य २१:४-५ HINOVBSI

ख़ुदा ने जिस नई दुनिया का वादा किया है, वह अद्भुत होगी। लेकिन अच्छी ख़बर यह है कि वह नया करने का काम अभी से शुरू हो चुका है। यहीं और अभी, हमारे अंदर!

पौलुस सिखाता है कि जिन सबसे अहम बातों को ख़ुदा हमारे अंदर नया करना चाहता है, उनमें से एक हमारा मन है:

*"इस जहान के सदृश न बनो, बल्कि अपने मन के नए हो जाने से बदलते जाइए, ख़ुदा की नेक और पसंदीदा और कामिल मर्ज़ी क्या है, जो अच्छी, भली और सिद्ध है।" - रोमियों १२:२

तो फ़िर एक बदला हुआ और नया मन कैसा होता है?

वह उन बातों पर ग़ौर करता है जो सच्ची, नेक, सही, पाक, सुंदर, सराहने योग्य, उत्तम और तारीफ़ के योग्य हैं। फिलिप्पियों ४:८ दूसरे अल्फ़ाज़ में कहें, तो ऐसा मन उम्मीद और भरोसे से भरा होता है।

ऐसा मन सुक़ून से भी भरा होता है, क्योंकि वह ख़ुदा पर भरोसा रखता है। यशायाह २६:३

और आख़िर में, नया किया हुआ ज़हन अनचाहे ख़यालात में नहीं उलझता, बल्कि ख़ुदा की फ़रमाबरदारी पर ग़ौर करता है। - २ कुरिन्थियों १०:३-६

क्या आप भी ऐसा मन चाहेंगे?

आओ, मिलकर दुआ करें।

ऐ आसमानी पिता, हम ऐसे संसार में जी रहे हैं जो गुनाह, दर्द और ग़म से भरा हुआ है। फ़िर भी, एक नए मन के वादे के लिए तेरा शुक्रिया। मेरे मन को मेरे ख़यालों से नहीं, बल्कि तेरे ख़यालों से भर दे। मेरी फ़िक्र की जगह तेरा सुक़ून मुझे दे। मैं अपना मन तेरे हवाले करता हूँ। मेरी ज़िंदगी में तेरी मर्ज़ी पूरी कर। यीशु मसीह के नाम में, आमीन।

26/08/2026

क्या आपने कभी 'पत्थर का दिल' यह कहावत सुनी है?

इसका इस्तेमाल ऐसे इंसान के लिए किया जाता है, जिसका दिल सख़्त हो गया हो, जिस पर दूसरों के दर्द और जज़्बात का कोई असर नही होता हो।

क्या आप किसी ऐसे इंसान को जानते हैं? मैं जानता हूँ... वह मैं ख़ुद हूँ। 🫢

वैसे पूरी तरह नहीं, मैं अपने आपको बे-रहम या बे-दिल नहीं कहूँगा। लेकिन मेरा मतलब यह है कि हम सबके दिल कभी न कभी सख़्त हो जाते हैं।

ऐसा लगता है कि इस दुनिया में रहते हुए अपने दिल को सख़्त होने से बचाना लगभग नामुमक़िन है।

हम सभी ने कभी न कभी दिल टूटने या दर्द का अनुभव किया है। शायद किसी ने आपका भरोसा तोड़ा हो या आपको धोखा दिया हो। हो सकता है आपको तंग किया गया हो या आपके साथ भेदभाव हुआ हो। शायद आपको ठुकराया गया हो या आपकी बेइज़्ज़ती की गई हो। हमारे चारों ओर दिखाई देने वाले दर्द और तकलीफ़ की तो बात ही अलग है। हर दिन हम नाइंसाफ़ी, बीमारी, ग़रीबी और ज़बरदस्ती को अपनी आँखों से देखतें है।

असल मुद्दा यह है कि हमें इसका एहसास भी नहीं होता, और हम जाने-अनजाने ख़ुद को और अपने दिल को बचाने के लिए उसे सख़्त बना लेते हैं।

लेकिन ख़ुदा ने हमारे लिए इससे कहीं बेहतर रास्ता रखा है:

*"मैं तुम्हे नया दिल दूँगा और तुम्हारे अंदर नई रूह डालूँगा। मैं तुम्हारा पत्थर का दिल निकालकर आपको मांस का दिल दूँगा।" - यहेज़केल ३६:२६

अपने दिल को दर्द से बचाने के लिए उसे सख़्त बनाने के बजाय, ख़ुदा चाहता है कि आपका दिल ज़िंदा रहे, जो इस दुनिया के लिए उसकी मोहब्बत और रहम से धड़कता रहे।

और जब भी आपको महसूस हो कि आपके दिल का कोई हिस्सा फ़िर से पत्थर सा हो गया है, तो आप बस ख़ुदा के पास आओ। वह उसे बदलकर आपको फ़िर से एक नया और सेहतमंद दिल देगा।

सिर्फ़ नया दिल ही नहीं, ख़ुदा आपको नई रूह भी देना चाहता है।

*"क्योंकि ख़ुदा ने हमें डर की रूह नहीं, बल्कि सामर्थ, मोहब्बत और सब्र की रूह दी है।" - २ तीमुथियुस १:७

ज़रा सोचें, पत्थर के दिल और डर की रूह के बजाय, मांस का दिल और मोहब्बत व सामर्थ से भरी नई रूह कितनी बेहतर है?

आज अपने सारे दर्द और डर ख़ुदा को सौंपकर उसे अपने दिल और अपनी रूह के अंदर से नया करने दे।

13/08/2026

प्रेरितों के काम अध्याय १५ में हम पढ़ते हैं, अन्यजातियों में बढ़ती हुई मसीहीयों की संख्या प्रेरितों के काम की क़िताब में एक अहम सवाल खड़ा करती है: क्या गैर-यहूदी विश्वासियों को यहूदी व्यवस्था का पालन करना चाहिए, जिसमें ख़तना भी शामिल है?

इस विषय पर गहरी बहस होती है। क्या उद्धार सिर्फ़ फ़ज़्ल से मिलता है, या फ़ज़्ल के साथ धार्मिक क़ानूनों का पालन भी ज़रूरी है?

यरूशलेम में प्रेरित और बुज़ुर्ग इकट्ठा होते हैं। पतरस उन्हें याद दिलाता है कि ख़ुदा ने अन्यजातियों को भी बिना किसी भेदभाव के पवित्र आत्मा दिया। *“तुम क्यों ख़ुदा की परीक्षा लेते हो और उन लोगों के गले में ऐसा जूआ रखना चाहते हो, जिसे न हम और न हमारे पूर्वज उठा सके?” (प्रेरितों के काम १५:१०) याक़ूब भी पक्का करता है कि यह बात नबियों की शिक्षाओं के अनुसार है।

नतीजा साफ़ दिखता है: उद्धार यीशु मसीह के फ़ज़्ल से मिलता है, बिना किसी इज़ाफ़ी शर्त के। एकता बनाए रखने के लिए कुछ व्यावहारिक निर्देश दिए गए, लेकिन आधार फ़ज़्ल ही रहा।

प्रेरितों के काम अध्याय १५ सुसमाचार की बुनियादी सिख की हिफ़ाज़त करता है। जैसे ही हम ख़ुदा की नज़र में क़बूल किए जाने के लिए फ़ज़्ल के साथ अपनी शर्तें जोड़ने लगते हैं, हम मसीह में मिली आज़ादी को खो बैठते हैं।

आज भी हम अनजाने में अपने लिए और दूसरों के लिए नए “क़ानून” बना लेते हैं, सांस्कृतिक उम्मीदें, अनकहे उसूल और धार्मिक रीतिरिवाज़। सवाल यह है: क्या हम आज भी वाक़ई फ़ज़्ल के सहारे ज़िंदगी गुज़ार रहे हैं?

किन क्षेत्रों में कानूनपरस्ती मसीह में मिलने वाली आपकी ख़ुशी को कमज़ोर कर सकती है?

ख़ुद से इन सवालों को पूछें:

क्या आप सुसमाचार के असली संदेश और इंसानी रिवाज़ों के बीच फ़र्क़ कर सकते हैं?
क्या आपको यक़ीन है कि ख़ुदा का फ़ज़्ल ही आपके लिए काफ़ी है, या फ़िर सोचते हैं कि उसकी मंज़ूरी पाने के लिए नेक काम करने की ज़रूरत है?

13/08/2026

एक और शख़्स था, जो ज़िंदगी के ऐसे अजीब मोड़ों से अच्छी तरह वाक़िफ़ था: वह है पौलुस।

प्रेरितों के काम अध्याय १६ में हम पढ़ते हैं, पौलुस अपनी दूसरे मिशनरी सफ़र पर निकलता है और तीमुथियुस उसके साथ जुड़ जाता है। वह जवान है, लेकिन समर्पित है। वे दोनों उन नगरों में जाते हैं जहाँ पहले से कलीसियाएँ स्थापित की जा चुकी थीं। उनके लिए यह ख़ुदा के काम का मुनासिब विस्तार था।

लेकिन फ़िर एक हैरान कर देनेवाली बात होती है। पवित्र आत्मा उन्हें कुछ क्षेत्रों में जाकर कलाम सुनाने से रोक देता है। दो बार उनकी योजनाएँ रुक जाती हैं। कोई वजह नहीं बताई जाती, कोई खुलासा नहीं दिया जाता। बस पैग़ाम इतना है: “यहाँ नहीं।”

फिर एक रात पौलुस को एक दर्शन मिलता है। मकिदुनिया का एक शख़्स ज़ोर से कहता है: *“मकिदुनिया में आकर हमारी मदद करो।” (प्रेरितों के काम १६:९) यहीं से रास्ता साफ़ हो जाता है। जो दरवाज़ा पहले बंद नज़र आ रहा था, वही आगे चलकर यूरोप की ओर खुलने वाला रास्ता बनता है। लेकिन उससे पहले उन्हें फिलिप्पी जाना था।

फिलिप्पी में उनकी मुलाक़ात लुदिया से होती है, जो एक व्यापार करने वाली स्त्री थी। फ़िर पौलुस एक लड़की को जो दासी थी, उसे दुष्ट आत्मा से आज़ाद करता है। इसी वजह से पौलुस और सीलास को जेल में डाल दिया जाता है। लेकिन जेल में भी, आधी रात के समय, वे ख़ुदा की इबादत करतें हैं। फ़िर एक भूकंप आता है, जेल के दरवाज़े खुल जाते हैं और जेलर यह सब देखकर पौलुस के द्वारा मसीही ईमान में आता है।

एक ही अध्याय। तीन बिल्कुल अलग-अलग लोग। एक ही सुसमाचार।

ख़ुदा की अगुवाई कई बार सीधे रास्तों से नहीं, बल्कि घुमावदार रास्तों के ज़रिए आती है। बंद दरवाज़े असफ़लता की निशानी नहीं होते, बल्कि वे दिशा-संकेत होते हैं।

शायद आप भी समझ नहीं पातें की कुछ बातें आगे क्यों नहीं बढ़ रही हैं या ये रुकावटें क्यों आ रही हैं। लेकिन यह याद रखें: ख़ुदा सिर्फ़ “हाँ” में ही नहीं, बल्कि “नहीं” में भी काम कर रहा होता है।

पीछे मुड़कर देखने पर, क्या आपकी ज़िंदगी में ऐसे मौके दिखाई देते हैं जहाँ एक बंद दरवाज़ा आख़िरकार आपको किसी बेहतर चीज़ की तरफ़ ले गया?

13/08/2026

अगर आप लोगों से जुड़ना चाहते हैं, तो उनकी संस्कृति को समझना बहुत ज़रूरी है। पौलुस यह बात अच्छी तरह जानता था।

थिस्सलुनीके और बिरीया में हम सुसमाचार के प्रति दो तरह के रवैये देखते हैं: विरोध और तहक़ीक़। कुछ लोग ग़ुस्सा हो जाते हैं, जबकि कुछ लोग रोज़ाना पाक कलाम की जाँच-पड़ताल करने लगते हैं कि क्या पौलुस जो कह रहा है, वह सच है। (प्रेरितों के काम अध्याय १७)

फ़िर पौलुस एथेंस पहुँचता है, जो विरोध और तहज़ीब का एक बड़ा मरकज़ था। वह हर तरफ़ वेदियाँ और मूर्तियाँ देखता है। उसका ज़हन कार्यशील हो जाता है। लेकिन वह नफ़रत से जवाब नहीं देता। वह लोगों के साथ बातचीत करने में मशगुल हो जाता है।

अरियुपगुस में वह उस “अनजान ख़ुदा” के बारे में बोलता है जिसकी वे इबादत करते थे। वह उनकी सोच और नज़रिए को समझते हुए, यहाँ तक कि उनके शायरों के कथन भी बोलता है, लेकिन संदेश के मूल सच्चाई से भटकता नहीं: ख़ुदा सृष्टिकर्ता है, कोई मूर्ति या प्रतिमा नहीं। वह लोगों को पश्चाताप करने के लिए बुलाता है, क्योंकि ख़ुदा ने न्याय का एक दिन ठहराया है और यह न्याय उस शख़्स के द्वारा होगा जिसे उसने मरे हुओं में से जिलाया।

पुनरुत्थान फ़िर भी एक निर्णायक मुद्दा बना रहा। कुछ लोग मज़ाक उड़ाते थे, कुछ और सुनना चाहते थे और कुछ मसीही ईमान में शामिल हो गए।

प्रेरितों के काम अध्याय १७ हमें दिखाता है कि सुसमाचार तहज़ीब से अलग नहीं है, लेकिन उसकी पहचान भी तहज़ीब से तय नहीं होती। लोगों से जुड़ने के लिए बुद्धिमान होना चाहिए, मगर संदेश को कमज़ोर या बदले बिना।

हम भी आज ऐसे समाज में रहते हैं जहाँ तरह-तरह के ख़यालात और मान्यताएँ मौजूद हैं। सवाल यह है: क्या हमें इसके बारे में पता है? और क्या हम यीशु मसीह के बारे में साफ़ समझ रखते हैं?

यीशु मसीह की गवाही तब असरदार होती है, जब आप उसे अच्छी तरह जानते हैं। क्या आप रोज़ाना बाइबल पढ़ते हैं और उस पर ग़ौर करते हैं?

और, क्या आप अपने आसपास की तहज़ीब को इतना समझते हैं कि सुसमाचार लोगों तक आसान अंदाज़ में पहुँचा सकें?

आओ मिलकर दुआ करें:

ऐ आसमानी पिता, मेरी मदद कर कि मैं तेरी तलाश करने वालों के लिए तेरी गवाह बन सकूँ। मुझे मदद कर, ताकि मैं सांस्कृतिक मान्यताओं और तुझ पर ईमान के बीच एक सही रास्ता बन सकूँ। यीशु मसीह के नाम में, आमीन।

13/08/2026

बहुत-से लोग मानते हैं कि ख़ुदा की सेवा करने का सबसे बेहतरीन, या शायद एक ही तरीका, फुल-टाइम मिनिस्ट्री है। लेकिन यह सच नहीं है। महान प्रेरित पौलुस भी तंबू बनाने का काम करता था।

कुरुन्थियुस में पौलुस की मुलाक़ात अक्विला और प्रिस्किल्ला से होती है। वे दोनों एक ही पेशे से जुड़े थे और वे तंबू बनाने का काम मिलकर करते थे। पौलुस की सेवकाई उसके रोज़ाना ज़िंदगी से अलग नहीं थी। दोनों का काम और मिशन एक-दूसरे से जुड़ा हुआ था। (प्रेरितों के काम १८)

आराधनालय में विरोध बढ़ता गया, लेकिन नए मसीहीयों की संख्या भी बढ़ती गई। यहाँ तक कि आराधनालय का एक अगुवा, क्रिस्पुस, भी मसीही ईमान में आ गया था। तब ख़ुदा ने एक दर्शन में पौलुस को प्रोत्साहित किया: *“डर मत ... क्योंकि मैं तेरे साथ हूँ।” (प्रेरितों के काम १८:९-१० HINOVBSI)

यह वादा बहुत अहम है। ख़ुदा की मौजूदगी ही सब्र की बुनियाद है।

बाद में हम देखते हैं कि अक्विला और प्रिस्किल्ला, अपुल्लोस को सिखातें हैं। वह बड़े जोश के साथ बोलता था, लेकिन अभी तक सुसमाचार को पूरी तरह नहीं समझता था। उसे सबके सामने सुधारने के बजाय, वे उसे वहाँ से अलग जगह ले गए और उन्होंने उसे ख़ुदा के मार्ग को बेहतर तरीक़े से समझाया।

प्रेरितों के काम अध्याय १८ हमें यह सिखाता है कि ख़ुदा का राज्य साथ में काम करने से आगे बढ़ता है। प्रेरित, व्यवसायी, शिक्षक और नए मसीही, हर किसी की एक अहम भूमिका है।

कोई भी शख़्स अकेले कलीसिया का निर्माण नहीं कर सकता।

शायद हम पूरे कार्य में अपनी भूमिका को कम समझतें होंगे। लेकिन ख़ुदा का काम उन लोगों के ज़रिए बढ़ता है जो वफ़ादारी के साथ मिलकर काम करते हैं, एक-दूसरे की कमियों को पूरा करते हैं और एक-दूसरे को बेहतर बनने में मदद करते हैं।

क्या आपका काम आपको उत्साहित करता है? या फ़िर आपकी नौकरी आपको सिर्फ़ पैसे कमाने का एक ज़रिया लगती है?

अगर हाँ, तो आप यह दुआ कर सकतें हैं:

“ऐ आसमानी पिता, मेरी मदद कर कि मैं दृढ़ रहूँ और ईमान में बना रहूँ, भले ही मिशन का कार्य अनदेखा और साधारण सा लगने लगे। मुझे हर दिन में तेरी पुकार को पहचानने में मदद कर। यीशु मसीह के नाम में, आमीन।”

01/08/2026

क्या आपकी ज़िंदगी में कोई ऐसी बात है, जो आपकी पहचान बन गई हो? कोई ऐसी चीज़, जिससे लोग आपको जानते हैं? शायद आपकी शख़्सियत की कोई ख़ास बात? या आपकी ज़िंदगी का कोई ऐसा पहलू जो आपको दूसरों से अलग बनाता हो?

यूहन्ना ९ में हम एक जन्म से अंधे आदमी की कहानी पढ़ते हैं। उसका नाम नहीं बताया गया है और न ही उसके बारे में कोई और ख़ास बात, सिवाय इसके कि वह जन्म से अंधा था। यही उसकी पहचान बन गई थी। लोग उसे देखकर यह सवाल करते थे, *“किसने ग़ुनाह किया, इस आदमी ने या उसके माता-पिता ने, कि यह अंधा पैदा हुआ?” (आयत ३)।

लेकिन इस इल्ज़ाम लगाने वाले रवैये को साफ़ तौर पर ख़ारिज करके, यीशु मसीह एक गहरी सच्चाई की ओर इशारा करता हैं और चेलों से कहता हैं..

*“न इसका कोई ग़ुनाह है और न ही इसके माता-पिता का। यह अंधा इसलिए हुआ ताकि इसकी ज़िंदगी में ख़ुदा का काम ज़ाहिर हो सके।” - यूहन्ना ९:३

कभी-कभी जिन चीज़ों को हम अपनी पहचान मान बैठते हैं; हमारा दर्द, हमारी टूटन, हमारी कमज़ोरियाँ और सीमाएँ, असल में वही जगहें होती हैं जहाँ ख़ुदा अपने सबसे बड़े चमत्कार ज़ाहिर करता है। जो बात किसी की ज़िंदगी में बदक़िस्मती, हार, या कभी न बदलने वाली हक़ीक़त लगती है, वही ख़ुदा के हाथों एक अद्भुत गवाही और चमत्कार की शुरुआत बन सकती है।

और यीशु मसीह ने बिल्कुल कुछ अप्रत्याशित किया। और फ़िर, जहाँ यीशु मसीह उस अंधे आदमी को सिर्फ़ एक ही लफ़्ज़ कहकर शिफ़ा दे सकता था, जैसे ‘चंगा हो जा!’ और वह देखने लगे।

उसके बजाय *”उसने ज़मीन पर थूका, लार और मिट्टी मिलाकर उस मिट्टी को अंधे आदमी की आँखों पर लगा दिया (आयत ६)।” यह शिफ़ा देने का और अद्भुत चमत्कार दिखाने का तरीक़ा थोड़ा अलग था।

यीशु मसीह उससे कहता हैं कि वह उस पर भरोसा करे और उसे सिलोह के कुंड में जाकर धोने के लिए कहता हैं।

वह सवाल कर सकता था, शक़ कर सकता था, या वहीं रुक सकता था। लेकिन उस अजीब तरीक़े के बावजूद, फ़रमाबरदारी जताता है और जैसे ही वह अपनी आँखों से मिट्टी धोता है, उसकी नज़र वापस आ जाती है। अपनी ज़िंदगी में पहली बार, वह इस दुनिया को उसके रंगों और ख़ूबसूरती में देख पाता है।

जिसे हम अपनी सबसे बड़ी कमी समझते हैं, वही हमारी सबसे बड़ें बदलाव की वजह बन सकती है। यीशु मसीह पर भरोसा रखें कि जब हालात अजीब और समझ से बाहर लगें, तब भी उसके पास एक योजना है। और जब वह आपको कोई क़दम उठाने के लिए प्रेरित करे, तो उसकी आज्ञा मानने के लिए तैयार रहें।

01/08/2026

क्या आप जानते हैं कि चमत्कार का भी एक दूसरा पहलू होता है?

आप सोचेंगे कि जब कोई चमत्कार होता है, तो हर कोई ख़ुश होता होगा और उसके बारे में सुनकर जश्न मनाता होगा। लेकिन हक़ीक़त में अक्सर ऐसा नहीं होता।

कल हमने उस इंसान के चंगे होने के चमत्कार के बारे में बात की थी, जो जन्म से अंधा था। (आप यह कहानी यूहन्ना ९ में पढ़ सकते हैं)।

जिस पल जन्म से उस अंधे इंसान की आँखें खुलीं और उसने पहली बार दुनिया को देखा, वह पल निश्चय ही अवर्णनीय ख़ुशी और विस्मय से भरा होगा और शायद वह यह चाहता होगा कि जो कोई इस विषय में जाने तो उसके साथ जश्न मनाए…लेकिन मामला कुछ इस तरह नहीं था।

लेकिन इसके बजाय, लोगों ने कहा:
“क्या यह वही आदमी नहीं है जो बैठकर भीख माँगता था?”
“नहीं,’ कुछ लोगों ने कहा, ‘यह बस उसके जैसा दिखता है! यह मुमक़िन नहीं!”

लोगों ने उस पर शक़ किया।
लोगों ने उसे फ़िर नज़रअंदाज़ किया।
लोगों ने उसे बदनाम भी किया।

क्यों? क्योंकि चमत्कार हमारी सोच के हदों को चुनौती देते हैं। वे हमें उस बात पर सवाल करने पर मजबूर करते हैं जिसे हम सच मानते आए थे।

उन्होंने पूछा, *‘तेरी आँखें कैसे खुल गईं?’ उस आदमी ने जवाब दिया “जिसे यीशु कहते हैं, उसने मिट्टी बनाई…” - यूहन्ना ९:११

बस इतना ही। यीशु! मिट्टी! बनाई!

यह दिखावा नहीं था। बिल्कुल तर्क और समझ के हिसाब से सही भी नहीं था। न ही किसी धार्मिक ढाँचे में सही बैठता था। लेकिन यह काम कर गया।

यूहन्ना ९ का बाकी हिस्सा लगभग ऐसा लगता है जैसे कोई मज़ाक चल रहा हो, उस आदमी से ऐसे सवाल-जवाब किए जाते हैं जैसे वो कोई मुजरिम हो। यहाँ तक कि उसके माता-पिता को भी घसीटकर लाया जाता है!

मगर वह अंधा बार-बार यही दोहराता गया... (आयत २५): “एक बात मैं जानता हूँ: मैं अंधा था, लेकिन अब देख सकता हूँ।”

उसने कोई बड़ी डिग्री हासिल नहीं की थी, न ही उसे सारे जवाब मालूम थे। मगर उसके पास उसकी गवाही थी। उसने ख़ुदा के सामर्थ को देखा था और उसी को मज़बूती से थामे रहा।

आपकी भी अपनी एक गवाही है। हो सकता है कि वह जन्म से अंधे इंसान के चंगे होने जितनी बड़ी न लगे, लेकिन ख़ुदा ने आपकी ज़िंदगी में भी यक़ीनन सामर्थी काम किए होंगे। इसलिए यह ज़रूरी है कि आप उन्हें दूसरों के साथ साझा करें, चाहे लोग कैसा भी जवाब दें।

मैं भी आपकी गवाही सुनना चाहूँगा।

01/08/2026

यीशु मसीह के चेले भी कुछ ऐसी ही हालत से गुज़रे, जब वे एक मुश्किल को लेकर उसके पास आए। यीशु मसीह काफ़ी देर से एक बड़ी भीड़ को शिक्षा दे रहा था, लेकिन अब सूरज ढलने लगा था और चेले फिक्रमंद हो गए थें:

*“उन्होंने कहा, ‘यह जगह सुनसान है, और बहुत देर हो चुकी है। लोगों को जाने दें, ताकि वे आस-पास के इलाक़े और गाँवों में जाकर अपने लिए कुछ खाने को ख़रीद सकें। “उन्हें कुछ खाने के लिए दो।” मरकुस ६:३५-३७ HINOVBSI

उनकी आँखों में हैरानी और उलझन साफ़ दिखाई दे रही थी। उनके हाथ में बस पाँच रोटियाँ और दो मछलियाँ थीं। चेलों की नज़र में, जो कुछ उनके पास था, वह बेहद मामूली, कम और लगभग बेकार था। लेकिन यीशु मसीह ने उनसे वही थोड़ी सी चीज़ अपने पास लाने को कहा।

इसलिए उन्होंने वही थोड़ी-सी चीज़ उसके सामने रख दी, जो उन्हें छोटी और नाकाफ़ी लग रही थी। फ़िर यीशु मसीह ने उन पाँच रोटियों और दो मछलियों को अपने हाथों में लिया, आसमान की ओर देखा, शुक्र अदा किया, और रोटी तोड़कर अपने चेलों को देने लगा। टुकड़ा-दर-टुकड़ा, वह उन्हें उनके हाथों में देता गया।

एक चमत्कार हुआ। यीशु मसीह की मदद से चेलों ने ५००० से भी ज़्यादा लोगों की भीड़ को खाना खिलाया।

आपने हाल ही में कौन से सवाल, मुश्किलें या अर्ज़िया ख़ुदा के सामने रखी हैं? क्या आपको लगता है कि शायद उसका जवाब यही हो “तुम ही कुछ करो!”? आपके पास कौन-सी पाँच रोटियाँ और दो मछलियाँ हैं, जिन्हें आप उसके सामने रख सकते हैं?

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