31/01/2026
*पुरश्चरण में स्नानादि विधि - निषेध*
पुरश्चरण से तीन दिन पहले प्रयोजन होने पर क्षौरकार्य करना चाहिये । ब्रह्मचारी, जटी, साधु, पञ्चकेशी, वानप्रस्थी आदि के लिये तथा स्त्री के लिये क्षौरादि का प्रयोजन नहीं है ।
पञ्चगव्य अथवा केवल आमलकी रस- युक्त पवित्रीकृत जल से, स्नानमन्त्र अथवा सङ्कल्प वाक्य से मन्त्र को मन्त्रपूत करके स्नान करना चाहिये । समर्थ होने पर त्रिसन्ध्या में, अभाव होने पर दो सन्ध्या में, उसके अभाव में एक बार ही नित्य स्नान करना चाहिये । उससे भी असमर्थ हो जाने पर मान्त्रिक स्नान तथा मार्जनादि द्वारा देहशुद्धि करनी चाहिये। स्नानान्त में आचमन, तर्पण तथा देव पूजनादि सम्पन्न करना चाहिये । अपवित्र हाथ से, नग्न अथवा अनावृत्त देह से जप - पुरश्चरण नहीं करना चाहिये । इससे सब कर्म विफल होता है ।
जाते समय, शयनकाल में, भोजनकाल में, व्याकुल चित्त से, क्रुद्ध, भ्रान्त तथा क्षुधार्थ होकर, पथ में, अमङ्गल स्थान में, अन्धकार-भरे गृह में, जूता-मोजा द्वारा पैर आवृत की स्थिति में, यज्ञकाष्ठ, पाषाण तथा मृत्तिका में बैठकर, उत्कट आसन अथवा पदद्वय प्रसारित करके जप नहीं करना चाहिये । जपकाल में बिड़ाल, कुक्कुट, बक, कुक्कुर, नीचात्मा, शूद्रादि व्यक्ति, वानर एवं गर्दभ का दर्शन होने पर प्रत्येक बार आचमन कर लेना चाहिये । तथापि निर्दिष्ट जप-पुरश्चरण काल के अतिरिक्त मानस - जपकाल में यह सब नियम पालन करना आवश्यक नहीं है । शुचि - अशुचि, गमन - उपवेशन, शयन- स्वप्न आदि सभी स्थिति में ज्ञानी व्यक्ति को निर्विकार होकर मानस जप करते रहना चाहिये; इसमें दोष नहीं होता ।
जप के समय शब्दोच्चारण नहीं करना चाहिये । यदि असावधानी से शब्दोच्चारण हो जाता है, तब प्रणव-जप कर पुनः जप में प्रवृत्त हो जाना चाहिये । यदि म्लेच्छों का शब्द सुनाई पड़ जाय तब प्राणायाम करके पुनः जप प्रारम्भ कर देना चाहिये । जपकाल में हिचकी आने अथवा अस्पृश्य वस्तु का स्पर्श होने पर आचमनादि करना चाहिये। अन्त्यज तथा पतित के आगमन पर, असत् आलाप-श्रवण करके अथवा अधोवायु निःसृत होने पर जप छोड़कर पुनः आचमन, अङ्गन्यास आदि करके सूर्य-अग्नि, दीप, ब्राह्मण, देवता अथवा इष्टगुरु की प्रतिमूर्ति में से किसी को देखकर पुनः जपारम्भ करना चाहिये ।
यदि मल-मूत्रादि का वेग अनुभूत होने पर जप किया जा रहा हो । तब सब कुछ अपवित्र हो जाता है । मलिन तथा दुर्गन्धयुक्त वस्त्र परिधान धारण करके अथवा केश- मुख अपवित्र रहते अथवा इनके दुर्गन्धमय रहते देवता क्रुद्ध हो जाते हैं । जपकाल में जंभाई, आलस्य, निद्रा, तन्द्रा, हिचकी, थूकना, भय, निम्नाङ्ग-स्पर्श जपकारी को नष्ट कर देता है।
मन्त्रसिद्धि में सहायक द्वादश विधि - (१) भू-शय्या, (२) ब्रह्मचर्य, (३) मौन, (४) गुरु- - आचार्य की सेवा, (५) यथाविधि नित्य स्नान, (६) नित्य पूजा, (७) दान-त्याग, (८) गुरु - इष्ट की स्तुति, (९) नैमित्तिक पूजा, (१०) इष्ट-गुरु में विश्वास, (११) जपयज्ञ में निष्ठा, (१२) क्षुधा, हिचकी, आलस्य आदि क्षुद्रकर्म का परित्याग । ये मन्त्रसिद्धि में सहायक विधान शिव द्वारा कहे गये हैं ।
पुरश्चरण-काल में पवित्र वस्त्र पहन कर कुश - कम्बलादि की शय्या पर निद्रा करनी चाहिये । प्रातः वस्त्र को धोकर शय्या को यथास्थान परिशुद्ध कर लेना चाहिये । एक वस्त्र पहनकर अथवा दो से अधिक वस्त्र पहन कर अथवा नग्न होकर, सङ्गी-साथियों से आवृत होकर, बातें करते हुये जप नहीं करना चाहिये ।
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💐जय माँ भगवती ललिताम्बिका 💐
संकलन : पं.हिरेनभाई त्रिवेदी, Unknown_Realm
श्रीवैदिकब्राह्मणः🚩गुजरात
परमधर्मसंसद १००८